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पांच सालों में 42 युवाओं को दे पाया प्रशिक्षण
Updated Tue, 24 Apr 2018 10:40 PM IST
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गैरसैंण। औषधीय एवं सगंध पादप के क्षेत्र में उच्च शिक्षा के उद्देश्य से स्थापित गैरसैंण का हरगढ़ पादप संस्थान अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो पा रहा है। संस्थान में हजारों में औषधीय पादपों की नर्सरी तैयार हो रही हैं, लेकिन इस नर्सरी को तैयार करने के लिए यहां दिया जाने वाला प्रशिक्षण कार्यक्रम तीन सालों से ठप है। यहां संचालित माली के पाठ्यक्रम में तीन सालों से प्रवेश नहीं दिया गया है। संस्थान में न तो पूरा स्टॉफ है और न तैनात कर्मियों को समय पर वेतन मिल रहा है।
वर्ष 2013-14 में गैरसैंण ब्लाक के हरगढ़ (धारापानी) में औषधीय एवं सगंध पादप संस्थान की स्थापना की गई। उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय भरसार के अधीन संचालित इस संस्थान में तब माली का पाठ्यक्रम शुरू किया गया। दो सालों में दो बैच में 42 युवाओं ने प्रवेश के बाद प्रशिक्षण लिया। इसके बाद से यहां माली का पाठ्यक्रम बंद पड़ा है। संस्थान में सिट्रोनेला के 7 हजार, खस के 35 हजार, तगर के 80 हजार, रोजमैरी के 2500, लेमनग्रास के 4 हजार, इजरायली सेब के 160, तीन वर्ष में फल देने वाले अखरोट के 200 के पेड़ नर्सरी में लगे हुए हैं। इन पेड़ों की देखभाल के लिए न तो यहां प्रशिक्षु हैं और न ही पूरा स्टाफ। यहां स्वीकृत 19 पदों में महज 11 ही कर्मी तैनात हैं, जिनमें से 8 उपनल से तैनात हैं। इन्हें सात माह से वेतन नहीं मिला है। गैरसैंण महिला मंच की कृष्णा नेेगी का कहना है कि संस्थान के विकास के प्रयास सरकार नहीं कर रही है। संस्थान के प्रभारी अधिकारी डा. जेएस बुटोला का कहना है कि यहां किसानों को समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है। माली के पाठ्यक्रम का प्रशिक्षण क्यों बंद हुआ, इसकी जानकारी शासन से स्पष्ट नहीं हो पाई है। संस्थान का सीमांकन करने के बाद यहां जड़ी बूटी की नर्सरी की सुरक्षा के लिए अन्य काम किए जाएंगे।
वर्ष 2013-14 में गैरसैंण ब्लाक के हरगढ़ (धारापानी) में औषधीय एवं सगंध पादप संस्थान की स्थापना की गई। उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय भरसार के अधीन संचालित इस संस्थान में तब माली का पाठ्यक्रम शुरू किया गया। दो सालों में दो बैच में 42 युवाओं ने प्रवेश के बाद प्रशिक्षण लिया। इसके बाद से यहां माली का पाठ्यक्रम बंद पड़ा है। संस्थान में सिट्रोनेला के 7 हजार, खस के 35 हजार, तगर के 80 हजार, रोजमैरी के 2500, लेमनग्रास के 4 हजार, इजरायली सेब के 160, तीन वर्ष में फल देने वाले अखरोट के 200 के पेड़ नर्सरी में लगे हुए हैं। इन पेड़ों की देखभाल के लिए न तो यहां प्रशिक्षु हैं और न ही पूरा स्टाफ। यहां स्वीकृत 19 पदों में महज 11 ही कर्मी तैनात हैं, जिनमें से 8 उपनल से तैनात हैं। इन्हें सात माह से वेतन नहीं मिला है। गैरसैंण महिला मंच की कृष्णा नेेगी का कहना है कि संस्थान के विकास के प्रयास सरकार नहीं कर रही है। संस्थान के प्रभारी अधिकारी डा. जेएस बुटोला का कहना है कि यहां किसानों को समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है। माली के पाठ्यक्रम का प्रशिक्षण क्यों बंद हुआ, इसकी जानकारी शासन से स्पष्ट नहीं हो पाई है। संस्थान का सीमांकन करने के बाद यहां जड़ी बूटी की नर्सरी की सुरक्षा के लिए अन्य काम किए जाएंगे।
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