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मरोज के जश्न में डूबा जौनसार बावर
Updated Thu, 11 Jan 2018 01:33 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाला
त्यूनी।
पूरा जौनसार बावर बुधवार को माघ पर्व के रंग में रंगा नजर आया। घर-घर बकरे काटकर लोगों ने देवता से सुख और शांति की कामना की। देर शाम तक गांवों में गीत-संगीत का दौर चलता रहा। लोग हारुल और तांदी नृत्य पर झूमते रहे। महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में जश्न मनाया। खान-पान के साथ ही मनोरंजन के भी विशेष प्रबंध किए गए।
बुधवार को बमठाड़, अटगांव, सिलगांव, पशगांव, बावर, कयलू और बाणाधार खत में पर्व की शुरुआत हो गई। क्षेत्र में हजारों बकरे काटे गए। इससे पहले सुबह लोगों ने मंदिर में जाकर आराधना की। इसके बाद हथियारों की पूजा-अर्चना की गई। देवता को खिचड़ी का भोग लगाया गया। फिर हर घर-परिवार में एक बकरा काटा गया। देर शाम लोगों ने पंचायती आंगन में जमकर हारुल और तांदी नृत्य किया।
बांटा का है विशेष महत्व
मरोज (माघ पर्व) के दौरान काटे जाने वाले बकरे के एक हिस्से को स्थानीय भाषा में बांटा कहा जाता है। उसे विवाहिता बेटी के ससुराल पहुंचाया जाता है। कई बार ऐसा नहीं होने पर रिश्ता टूटने तक की नौबत आ जाती है। वैसे कुछ लोग इस परंपरा को गलत भी मानते हैं।
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यहां नहीं कटता बकरा
त्यूनी। पूरे जौनसार बावर में जहां मरोज पर्व के दौरान बकरे काटने की परंपरा है, वहीं देवघार रेंज के मेघाटू और भगौत में बकरे नहीं काटे जाते। 23 साल पूर्व गांव ने पंचायत कर पर्व पर बकरे नहीं काटने का फैसला लिया था। बताया जाता है कि गांव ने यह फैसला लोगों की आर्थिक स्थिति को देखकर लिया। गांव में रहने वाले लोगों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में गरीब आदमी के लिए बकरा खरीदना आसान नहीं होता है। पंचायत के फैसले के बाद गांव में यह परंपरा बंद कर दी गई है। जो व्यक्ति बकरा काटते हुए पकड़ा जाता है, पंचायत उससे पांच हजार रुपये आर्थिक दंड वसूल सकती है।
बढ़े बकरों के दाम
मरोज पर्व आते ही क्षेत्र में बकरों के दामों में भी उछाल आ गया है। बकरे के लिए लोगों को 15-16 हजार रुपये के हिसाब से चुकाना पड़ रहा है।
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त्यूनी।
पूरा जौनसार बावर बुधवार को माघ पर्व के रंग में रंगा नजर आया। घर-घर बकरे काटकर लोगों ने देवता से सुख और शांति की कामना की। देर शाम तक गांवों में गीत-संगीत का दौर चलता रहा। लोग हारुल और तांदी नृत्य पर झूमते रहे। महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में जश्न मनाया। खान-पान के साथ ही मनोरंजन के भी विशेष प्रबंध किए गए।
बुधवार को बमठाड़, अटगांव, सिलगांव, पशगांव, बावर, कयलू और बाणाधार खत में पर्व की शुरुआत हो गई। क्षेत्र में हजारों बकरे काटे गए। इससे पहले सुबह लोगों ने मंदिर में जाकर आराधना की। इसके बाद हथियारों की पूजा-अर्चना की गई। देवता को खिचड़ी का भोग लगाया गया। फिर हर घर-परिवार में एक बकरा काटा गया। देर शाम लोगों ने पंचायती आंगन में जमकर हारुल और तांदी नृत्य किया।
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बांटा का है विशेष महत्व
मरोज (माघ पर्व) के दौरान काटे जाने वाले बकरे के एक हिस्से को स्थानीय भाषा में बांटा कहा जाता है। उसे विवाहिता बेटी के ससुराल पहुंचाया जाता है। कई बार ऐसा नहीं होने पर रिश्ता टूटने तक की नौबत आ जाती है। वैसे कुछ लोग इस परंपरा को गलत भी मानते हैं।
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यहां नहीं कटता बकरा
त्यूनी। पूरे जौनसार बावर में जहां मरोज पर्व के दौरान बकरे काटने की परंपरा है, वहीं देवघार रेंज के मेघाटू और भगौत में बकरे नहीं काटे जाते। 23 साल पूर्व गांव ने पंचायत कर पर्व पर बकरे नहीं काटने का फैसला लिया था। बताया जाता है कि गांव ने यह फैसला लोगों की आर्थिक स्थिति को देखकर लिया। गांव में रहने वाले लोगों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में गरीब आदमी के लिए बकरा खरीदना आसान नहीं होता है। पंचायत के फैसले के बाद गांव में यह परंपरा बंद कर दी गई है। जो व्यक्ति बकरा काटते हुए पकड़ा जाता है, पंचायत उससे पांच हजार रुपये आर्थिक दंड वसूल सकती है।
बढ़े बकरों के दाम
मरोज पर्व आते ही क्षेत्र में बकरों के दामों में भी उछाल आ गया है। बकरे के लिए लोगों को 15-16 हजार रुपये के हिसाब से चुकाना पड़ रहा है।