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पर्यावरण एवं विकास में संतुलन पर गोष्ठी आयोजित
Updated Thu, 07 Dec 2017 10:42 PM IST
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श्रीनगर। गढ़वाल विवि कें समाजशास्त्र विभाग व पर्वतीय शोधकेंद्र की ओर से वनों का मानव जीवन पर प्रभाव, पर्यावरण तथा विकास में संतुलन विषय पर गोष्ठी आयोजित की गई। वक्ताओं ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचा कर किए जा रहे विकास पर चिंता जताई है। इस मौके पर गढ़वाल विवि के डीएसडब्लू प्रो. जेपी पचौरी को विभिन्न संगठनों की ओर से सम्मानित किया गया।
बृहस्पतिवार को गढ़वाल विवि के समाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभाग में पर्यावरण एवं विकास में संतुलन विषय पर आयोजित गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि मध्य हिमालयी क्षेत्र के विकास का नया प्रारूप पर्यावरण, परिस्थितिकीय और जन जीवन पर भारी पड़ रहा है। सड़कों का निर्माण, चौड़ीकरण, सुरंगों का निर्माण व जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण मध्य हिमालय की अस्थिरता को बढ़ा रहे हैं। साथ ही स्थानीय जन जीवन पर भी भारी पड़ रहा है। मुख्य अतिथि राष्ट्रीय गांधी शांति प्रतिष्ठान की पूर्व अध्यक्ष राधा बहन ने कहा कि उत्तराखंड में वनों की व्यावसायिक कटाई की जा रही है। सड़क, बांध, पर्यटन, रेलवे लाइन आदि के लिए दो वर्षों में करीब पांच लाख से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। कहा कि असंतुलित निर्माण आपदाओं का कारण बन सकते हैं, जो वर्ष 2013 की आपदा का मुख्य कारण रहा है। मुख्य वक्ता नदी बचाओ अभियान के संयोजक सुरेश भाई ने कहा कि सड़कों व रेल लाइन का निर्माण जरूरत के अनुरूप होना चाहिए। कहा कि ऑलवेदर रोड निर्माण का टनों मलबा जहां आपदा का कारण बन सकता है वही पेड़ों का कटान पर्यावरण के लिए भी हानि कारक है। सामाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभागाध्यक्ष प्रो. जेपी पचौरी ने कहा कि विकास की प्रक्रिया सतत होनी चाहिए। जिससे पर्यावरण भी संतुलित रहे और लोगों को स्वच्छ हवा, पानी भी मिल सके। साथ ही सभी योजनाओं का निर्माण जनता की सलाह से किया जाना चाहिए। गोष्ठी में पूर्व पंचायतीराज मंत्री मोहन सिंह रावत गांववासी ने पौध रोपण के लिए टास्क फोर्स के गठन की सलाह दी। कहा कि पर्यावरण संरक्षण के लिए विदेशी तकनीक को अपना जरूरी है। कार्यक्रम के संचालक पर्वतीय शोध केंद्र के नोडल अधिकारी डा. अरविंद दरमोड़ा ने भूकंप की दृष्टि से अति संवेदनशील पहाड़ों में रेल मार्ग की सुरंगों व जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण खतरा बताया। इस मौके पर भूपाल सिंह चौधरी, प्रो. मोहन सिंह पंवार, डा. जेपी भट्ट, प्रो. किरन डंगवाल, डा. उमा बहुगुणा ने भी विचार रखे।
बृहस्पतिवार को गढ़वाल विवि के समाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभाग में पर्यावरण एवं विकास में संतुलन विषय पर आयोजित गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि मध्य हिमालयी क्षेत्र के विकास का नया प्रारूप पर्यावरण, परिस्थितिकीय और जन जीवन पर भारी पड़ रहा है। सड़कों का निर्माण, चौड़ीकरण, सुरंगों का निर्माण व जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण मध्य हिमालय की अस्थिरता को बढ़ा रहे हैं। साथ ही स्थानीय जन जीवन पर भी भारी पड़ रहा है। मुख्य अतिथि राष्ट्रीय गांधी शांति प्रतिष्ठान की पूर्व अध्यक्ष राधा बहन ने कहा कि उत्तराखंड में वनों की व्यावसायिक कटाई की जा रही है। सड़क, बांध, पर्यटन, रेलवे लाइन आदि के लिए दो वर्षों में करीब पांच लाख से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। कहा कि असंतुलित निर्माण आपदाओं का कारण बन सकते हैं, जो वर्ष 2013 की आपदा का मुख्य कारण रहा है। मुख्य वक्ता नदी बचाओ अभियान के संयोजक सुरेश भाई ने कहा कि सड़कों व रेल लाइन का निर्माण जरूरत के अनुरूप होना चाहिए। कहा कि ऑलवेदर रोड निर्माण का टनों मलबा जहां आपदा का कारण बन सकता है वही पेड़ों का कटान पर्यावरण के लिए भी हानि कारक है। सामाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभागाध्यक्ष प्रो. जेपी पचौरी ने कहा कि विकास की प्रक्रिया सतत होनी चाहिए। जिससे पर्यावरण भी संतुलित रहे और लोगों को स्वच्छ हवा, पानी भी मिल सके। साथ ही सभी योजनाओं का निर्माण जनता की सलाह से किया जाना चाहिए। गोष्ठी में पूर्व पंचायतीराज मंत्री मोहन सिंह रावत गांववासी ने पौध रोपण के लिए टास्क फोर्स के गठन की सलाह दी। कहा कि पर्यावरण संरक्षण के लिए विदेशी तकनीक को अपना जरूरी है। कार्यक्रम के संचालक पर्वतीय शोध केंद्र के नोडल अधिकारी डा. अरविंद दरमोड़ा ने भूकंप की दृष्टि से अति संवेदनशील पहाड़ों में रेल मार्ग की सुरंगों व जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण खतरा बताया। इस मौके पर भूपाल सिंह चौधरी, प्रो. मोहन सिंह पंवार, डा. जेपी भट्ट, प्रो. किरन डंगवाल, डा. उमा बहुगुणा ने भी विचार रखे।
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