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टिहरी बांध बन सकता है भूकंप का कारण
Updated Thu, 07 Dec 2017 10:42 PM IST
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श्रीनगर। टिहरी बांध भूकंप के लिए उत्प्रेरक साबित हो सकता है। बांध की झील (रिजर्व वायर) में पानी भरने पर आमने-सामने की पहाड़ियां नजदीक आ रही हैं, जबकि जल स्तर घटने पर पहाड़ियां फिर अपने मूल स्थान पर लौट रही हैं। ऐसी परिस्थितियां पैदा हो रही हैं कि मानों पहाड़ियां सांस ले रही हों। वैज्ञानिकों का मत है कि इससे भूगर्भीय हलचल होना देर-सवेर भूकंप का कारण बन सकती हैं। साथ ही इससे भूकंप की तीव्रता बढ़ने की संभावना है।
भारत के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय भूकंप अध्ययन केंद्र और केंद्रीय गढ़वाल विवि श्रीनगर के भूविज्ञान विभाग की संयुक्त टीम ने पांच साल के सर्वेक्षण और डाटा अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। टीम ने टिहरी बांध का जीपीएस (ग्लोबल डाटा सिस्टम) और सार (सिंथेटिक अपरचर रडार) डाटा के आधार पर रिजर्व वायर कोरिलेटेड डैमेज (जलाशय से होना वाला नुकसान) स्टडी की।
रिपोर्ट के अनुसार, मानसूनकाल में टिहरी डैम का रिजर्व वायर जब पानी से लबालब रहता है, तो इसकी आमने-सामने की पहाड़ियां नजदीक आ जाती हैं, जबकि शीतकाल में पानी कम होने पर पुन: पहाड़ियां दूर हो जाती हैं। पहाड़ियां अपने स्थान से लगभग चार मिलीमीटर हिल रही हैं। टीम में शामिल गढ़वाल विवि के भूविज्ञानी डा. एसपी सती के अनुसार, पानी भरने पर पहाड़ियां पानी की थैली के समान व्यवहार कर रही हैं। जैसे पानी भरने पर दबाव और भार से थैली के दोनों भाग नजदीक आने लगते हैं, उसी प्रकार टिहरी में आमने-सामने की पहाड़ियां नजदीक आ रही हैं।
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उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र के कोयना बांध का रिजर्व वायर इनड्यूस्ड सिस्मेसिटी (जलाशय प्रेरित भूकंप) अध्ययन किया गया था, इसमें भी यह सामने आया कि बांध बनने के बाद से भूगर्भीय हलचलें बढ़ी हैं। हिमालय में अभी ऐसा अध्ययन नहीं हुआ है, लेकिन टिहरी बांध के जलाशय से होने वाले नुकसान का भूविज्ञानियों ने अध्ययन किया है। इसी रिपोर्ट के आधार पर जाना जा सकता है कि जलाशय वाले बांधों से क्या खतरा है? डा. सती ने बताया कि उत्तराखंड भूकंप के प्रति संवेदनशील हैं। भूकंप आते रहेंगे, ऐसे में बांध परियोजनाओं को बनाने से पूर्व टिहरी बांध से हो रहे नुकसान से सबक लेना चाहिए।
भारत के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय भूकंप अध्ययन केंद्र और केंद्रीय गढ़वाल विवि श्रीनगर के भूविज्ञान विभाग की संयुक्त टीम ने पांच साल के सर्वेक्षण और डाटा अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। टीम ने टिहरी बांध का जीपीएस (ग्लोबल डाटा सिस्टम) और सार (सिंथेटिक अपरचर रडार) डाटा के आधार पर रिजर्व वायर कोरिलेटेड डैमेज (जलाशय से होना वाला नुकसान) स्टडी की।
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रिपोर्ट के अनुसार, मानसूनकाल में टिहरी डैम का रिजर्व वायर जब पानी से लबालब रहता है, तो इसकी आमने-सामने की पहाड़ियां नजदीक आ जाती हैं, जबकि शीतकाल में पानी कम होने पर पुन: पहाड़ियां दूर हो जाती हैं। पहाड़ियां अपने स्थान से लगभग चार मिलीमीटर हिल रही हैं। टीम में शामिल गढ़वाल विवि के भूविज्ञानी डा. एसपी सती के अनुसार, पानी भरने पर पहाड़ियां पानी की थैली के समान व्यवहार कर रही हैं। जैसे पानी भरने पर दबाव और भार से थैली के दोनों भाग नजदीक आने लगते हैं, उसी प्रकार टिहरी में आमने-सामने की पहाड़ियां नजदीक आ रही हैं।
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उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र के कोयना बांध का रिजर्व वायर इनड्यूस्ड सिस्मेसिटी (जलाशय प्रेरित भूकंप) अध्ययन किया गया था, इसमें भी यह सामने आया कि बांध बनने के बाद से भूगर्भीय हलचलें बढ़ी हैं। हिमालय में अभी ऐसा अध्ययन नहीं हुआ है, लेकिन टिहरी बांध के जलाशय से होने वाले नुकसान का भूविज्ञानियों ने अध्ययन किया है। इसी रिपोर्ट के आधार पर जाना जा सकता है कि जलाशय वाले बांधों से क्या खतरा है? डा. सती ने बताया कि उत्तराखंड भूकंप के प्रति संवेदनशील हैं। भूकंप आते रहेंगे, ऐसे में बांध परियोजनाओं को बनाने से पूर्व टिहरी बांध से हो रहे नुकसान से सबक लेना चाहिए।