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फल और फूलों की खेती को बनाया आर्थिकी का जरिया
Updated Fri, 08 Sep 2017 09:51 PM IST
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कर्णप्रयाग। ब्लाक के ग्राम पंचायत रतूड़ा के देवथापली गांव के राकेश रतूड़ी बागवानी के क्षेत्र में काश्तकारों के लिए प्रेरणास्रोत बने हैं। जंगली जानवरों के आतंक और विषम परिस्थितियों के बावजूद फलोत्पादन और फूलों की खेती कर रतूड़ी 60 हजार से 1 लाख सालाना कमा रहे हैं।
देवथापली गांव में जहां बंदरों और सूअर फसलों को रौंद रहे हैं। वहीं ग्रामीण राकेश रतूड़ी जानवरों के आतंक के बावजूद फलोत्पादन के क्षेत्र में मेहनत कर रहे हैं। रतूड़ी ने अपनी 60 नाली भूमि पर आम, अमरूद, कटहल, पपीता, लीची, आड़ू, केला, संतरे, नींबू, तेजपत्ता, बेड़ा आदि के 300 से अधिक पौधे लगाए हैं। यही नहीं गेंदा, मखमल, गुलाब आदि फूलों की खेती को रोजगार का जरिया बना कर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। राकेश रतूड़ी का कहना है कि यहां सिंचाई नहर तीन सालों से क्षतिग्रस्त है लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था से यहां सिंचाई कर रहे हैं। जानवरों के आतंक से निजात के लिए भी कोई प्रयास विभागीय स्तर पर नहीं हो पा रहे हैं। रातभर जाग कर जानवरों को भगाया जाता है। रतूड़ी का कहना हैयदि संसाधन उपलब्ध हों तो फलों का कारोबार और वृहद तौर पर किया जा सकता है।
देवथापली गांव में जहां बंदरों और सूअर फसलों को रौंद रहे हैं। वहीं ग्रामीण राकेश रतूड़ी जानवरों के आतंक के बावजूद फलोत्पादन के क्षेत्र में मेहनत कर रहे हैं। रतूड़ी ने अपनी 60 नाली भूमि पर आम, अमरूद, कटहल, पपीता, लीची, आड़ू, केला, संतरे, नींबू, तेजपत्ता, बेड़ा आदि के 300 से अधिक पौधे लगाए हैं। यही नहीं गेंदा, मखमल, गुलाब आदि फूलों की खेती को रोजगार का जरिया बना कर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। राकेश रतूड़ी का कहना है कि यहां सिंचाई नहर तीन सालों से क्षतिग्रस्त है लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था से यहां सिंचाई कर रहे हैं। जानवरों के आतंक से निजात के लिए भी कोई प्रयास विभागीय स्तर पर नहीं हो पा रहे हैं। रातभर जाग कर जानवरों को भगाया जाता है। रतूड़ी का कहना हैयदि संसाधन उपलब्ध हों तो फलों का कारोबार और वृहद तौर पर किया जा सकता है।
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