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आयुर्वेद विवि कुलसचिव पर कोर्ट के आदेश पर मुकदमा
Updated Sun, 01 Jul 2018 02:12 AM IST
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मृत्युंजय मिश्रा पर कोर्ट के आदेश पर होगा मुकदमा
ब्यूरो/अमर उजाला
देहरादून। विवि के लिए फर्नीचर-उपकरण मंगवाकर भुगतान न करने के आरोप में उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलसचिव, उनके पीए और स्टोर कीपर के खिलाफ कोर्ट के आदेश से मुकदमा दर्ज करने के आदेश हुए हैं। उस वक्त डॉ. मृत्युंजय मिश्रा कुलसचिव थे। यह परिवाद भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156/3 के तहत सीजेएम कोर्ट में आपूर्तिकर्ता सुधीर पांडेय ने दाखिल किया था।
उन्होंने आरोप लगाया है कि कुलसचिव के कहने पर उन्होंने 65 लाख रुपये कीमत के फर्नीचर-उपकरण उपलब्ध कराए, लेकिन अभी तक उसका भुगतान नहीं किया जा रहा है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पुलिस को मामले में मुकदमा दर्ज कर जांच के आदेश दिए हैं।
परिवाद के मुताबिक अप्रैल वर्ष 2016 में आपूर्तिकर्ता को विवि के कुलसचिव का फोन आया था, जिसमें बताया गया कि विवि को चिकित्सा से संबंधित फर्नीचर, उपकरणों की तुरंत आवश्यकता है। बताया गया कि विवि में सीसीआईएम की टीम को निरीक्षण के लिए आना है। उन्होंने जब निविदा आदि औपचारिकता के लिए कहा तो कुलसचिव ने आश्वासन दिया कि 15 दिन के भीतर यह सामान विवि को सौंप दें, उन्हें भुगतान कर दिया जाएगा। आपूर्तिकर्ता ने कुलसचिव की बातों पर भरोसा कर 18 मई से 21 जून तक करीब 65 लाख रुपये के फर्नीचर व उपकरण विवि को उपलब्ध कराए, जिसकी कुलसचिव के निजी सहायक ने जांच कर स्टोरकीपर को सौंप दिया। बाद में उन्हें पता चला कि जो सामान उन्होंने विवि में उपलब्ध कराया है, उसकी निविदा कुलसचिव की ओर से खुद ही डाली गई थी। सामान उनसे लेकर विवि को उपलब्ध करा दिया गया और जब उन्होंने भुगतान की मांग की तो आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला।
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उन्होंने आरोप लगाया है कि यह सामान उनसे धोखाधड़ी कर हड़प लिया गया है। इस संबंध में पुलिस को शिकायत की लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। जिसके बाद उन्हें कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। ए मामले में तत्कालीन कुलसचिव डॉ. मृत्युंजय मिश्रा का कहना है कि विवि में अस्पताल पीपीपी मोड में संचालित होता है। इस बारे में वही बता सकते हैं कि जो पीपीपी मोड में अस्पताल का संचालन कर रहे हैं। पुलिस जांच करेगी तो सब कुछ साफ हो जाएगा।
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ब्यूरो/अमर उजाला
देहरादून। विवि के लिए फर्नीचर-उपकरण मंगवाकर भुगतान न करने के आरोप में उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलसचिव, उनके पीए और स्टोर कीपर के खिलाफ कोर्ट के आदेश से मुकदमा दर्ज करने के आदेश हुए हैं। उस वक्त डॉ. मृत्युंजय मिश्रा कुलसचिव थे। यह परिवाद भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156/3 के तहत सीजेएम कोर्ट में आपूर्तिकर्ता सुधीर पांडेय ने दाखिल किया था।
उन्होंने आरोप लगाया है कि कुलसचिव के कहने पर उन्होंने 65 लाख रुपये कीमत के फर्नीचर-उपकरण उपलब्ध कराए, लेकिन अभी तक उसका भुगतान नहीं किया जा रहा है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पुलिस को मामले में मुकदमा दर्ज कर जांच के आदेश दिए हैं।
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परिवाद के मुताबिक अप्रैल वर्ष 2016 में आपूर्तिकर्ता को विवि के कुलसचिव का फोन आया था, जिसमें बताया गया कि विवि को चिकित्सा से संबंधित फर्नीचर, उपकरणों की तुरंत आवश्यकता है। बताया गया कि विवि में सीसीआईएम की टीम को निरीक्षण के लिए आना है। उन्होंने जब निविदा आदि औपचारिकता के लिए कहा तो कुलसचिव ने आश्वासन दिया कि 15 दिन के भीतर यह सामान विवि को सौंप दें, उन्हें भुगतान कर दिया जाएगा। आपूर्तिकर्ता ने कुलसचिव की बातों पर भरोसा कर 18 मई से 21 जून तक करीब 65 लाख रुपये के फर्नीचर व उपकरण विवि को उपलब्ध कराए, जिसकी कुलसचिव के निजी सहायक ने जांच कर स्टोरकीपर को सौंप दिया। बाद में उन्हें पता चला कि जो सामान उन्होंने विवि में उपलब्ध कराया है, उसकी निविदा कुलसचिव की ओर से खुद ही डाली गई थी। सामान उनसे लेकर विवि को उपलब्ध करा दिया गया और जब उन्होंने भुगतान की मांग की तो आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला।
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उन्होंने आरोप लगाया है कि यह सामान उनसे धोखाधड़ी कर हड़प लिया गया है। इस संबंध में पुलिस को शिकायत की लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। जिसके बाद उन्हें कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। ए मामले में तत्कालीन कुलसचिव डॉ. मृत्युंजय मिश्रा का कहना है कि विवि में अस्पताल पीपीपी मोड में संचालित होता है। इस बारे में वही बता सकते हैं कि जो पीपीपी मोड में अस्पताल का संचालन कर रहे हैं। पुलिस जांच करेगी तो सब कुछ साफ हो जाएगा।