फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Agra News ›   Sawam ka somvar Ancient Shri Bhimsen Temple story

इस प्राचीन मंदिर में शिव पूजा के साथ होती है मजार पर चादरपोशी, ये है मान्यता

Mon, 30 Jul 2018 10:35 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला मैनपुरी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला मैनपुरी Updated Mon, 30 Jul 2018 10:35 AM IST
विज्ञापन
Sawam ka somvar Ancient Shri Bhimsen Temple story
श्री भीमसेन मंदिर, मैनपुरी
मैनपुरी के श्री भीमसेन मंदिर में महाशिवरात्रि और श्रावण मास के सोमवार में मेले जैसा नजारा होता है। मान्यता के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने भगवान भीमसेन की मंदिर में पूजा की। महर्षि मार्कंडेय ने भी भीमसेन की साधना की थी।
विज्ञापन


यह प्राचीन मंदिर हिंदु-मुस्लिम भाईचारे का भी प्रतीक है। मंदिर परिसर में मुस्लिम संत गुलाब खां की मजार आज भी बनी है। सावन के हर सोमवार को हजारों श्रद्धालु भगवान शिव की पूजा के लिए उमड़ते हैं। मजार पर भी फूल चढ़ाते हैं। 
विज्ञापन


भगवान भीमसेन का वर्तमान मंदिर तो 12वीं शताब्दी में अपने स्वरूप में आया, लेकिन भगवान भीमसेन का विग्रह पौराणिक काल का बताया जाता है। शहर के ईशान कोण में जहां मां शीतला देवी का मंदिर है, वहीं आग्नेय कोण में भगवान भीमसेन विराजमान हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

यह है पौराणिक कहानी

कहा जाता है कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के बीच इस पावन नगरी की रक्षा के लिए शिवा और शिव को विराजमान किया गया है। तीर्थस्थल बटेश्वर की तरह भगवान शिव की प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में ही है। 

विग्रह में बड़े-बड़े जटा जूट से अलंकृत चंद्रकला को मस्तक पर धारण करने वाले एवं बड़ी-बड़ी मूंछों से सुशोभित शिव का रूपांकन किया गया है। मंदिर के बारे में किवदंती है कि अज्ञातवास के दौरान इच्छु नदी (वर्तमान में ईशन) के किनारे-किनारे बिठूर जाते समय पांडव यहां रुके थे। पांडवों ने भगवान भीमसेन की यहां पूजा अर्चना की थी। 

मजार पर चढ़ाते हैं फूल

कहा जाता है कि लगभग 200 साल पहले भीमसेन मंदिर में महाशिवरात्रि पर भंडारा कराया गया था। मंदिर पहुंचे मुस्लिम संत गुलाब खां ने कमंडल में खीर परोसने को कहा। खीर परोसने वाले कमंडल में खीर डालते रहे लेकिन कमंडल नहीं भरा। 

पुजारी नरोत्तमदास को जब पता चला तो वो स्वयं अपने कमंडल से खीर परोसने लगे। न तो गुलाब खां का कमंडल भरा और न ही नरोत्तमदास के कमंडल से खीर की धार टूटी। 

दोनों संत गले मिले और गुलाब खां भीमसेन मंदिर में ही रहने लगे। मंदिर परिसर में गुलाब खां की मजार आज भी बनी है। श्रावण मास के हर सोमवार को श्रद्धालु मजार की भी पूजा करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed