पेयजल किल्लत पर हाईकोर्ट ने केंद्र से मांगा हलफनामा, पूछा- क्या कदम उठाए
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हिमाचल में पेयजल को लेकर मच रहे हाहाकार पर हाईकोर्ट ने अफसरशाही पर गंभीर सवाल उठाए हैं। राज्य की जनता को पेश आ रहीं दुश्वारियों पर हाईकोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए सहायक सॉलिसिटर जनरल को निर्देश दिए कि वह केंद्र सरकार की ओर से हलफनामा दायर कर बताएं कि प्रदेश में पानी की समस्या को दूर करने के लिए जो योजनाएं लंबित हैं, उनके विषय में क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
न्यायालय ने उन योजनाओं के बारे में भी अवगत करवाने को कहा जो वर्तमान में नाबार्ड के तहत लंबित हैं। हाईकोर्ट ने कहा है कि प्रदेश में पानी की कमी नहीं है, लेकिन प्रशासन की अनदेखी के चलते हालात बिगड़े हैं, जिसका खामियाजा राज्य की जनता को भुगतना पड़ रहा है। प्रशासन में सही तरीके से काम करने की इच्छा नहीं है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की खंडपीठ ने पानी से संबंधित केंद्रीय मंत्रालय को निर्देश दिए कि स्वच्छ पेयजल के लिए बनाई जाने वाली योजनाओं के विस्तार के लिए वह धन उपलब्ध कराने के लिए जरूरी कदम उठाए।
इन जिलों में पीने योग्य पेयजल की आपूर्ति अपर्याप्त
कोर्ट ने सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य के मुख्य अभियंता की ओर से दायर शपथ पत्र का अवलोकन करने के बाद यह आदेश पारित किए। मुख्य अभियंता ने शपथपत्र से कोर्ट को बताया कि प्रस्तावित परियोजनाओं पर लगभग 798 करोड़ खर्च आने का अनुमान है। राज्य ने केंद्रीय जल मंत्रालय से वित्तीय सहायता मांगी है।
कोर्ट ने शपथ पत्र का अवलोकन करने के बाद कहा कि तीन जिलों हमीरपुर, कांगड़ा और मंडी के निवासियों को पीने योग्य पेयजल की आपूर्ति अपर्याप्त है। राज्य सरकार के मापदंडों के अनुसार इस तरह के 50 फीसदी आवास भी पूरी तरह से कवर नहीं हो पा रहे हैं।
दूसरे जिलों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि प्रदेश में सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब, पब्बर, चंद्रभागा जैसी नदियों का बहना एक वरदान स्वरूप है। राज्य की आबादी का 90 फीसदी हिस्सा ग्रामीण इलाकों में रहता है, लेकिन उन्हें भी जरूरत के अनुसार पेयजल उपलब्ध नहीं हो पाता।