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लेखक शेखर सेन ने खोला 'कबीर' को लिखने के पीछे का सच
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़।
Updated Mon, 25 Apr 2016 11:50 AM IST
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शेखर सेन ने बताया कि कबीर की जीवनी पर आधारित 78 किताबें पढ़ने के बाद उन्होंने कबीर नाटक को लिखा।
- फोटो : amarujala
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भारतीय इतिहास में संत कबीर एक ऐसे संत कवि हुए हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वो अनपढ़ थे। लेकिन, यह गौरवशाली बात है कि सबसे ज्यादा शोध उन्हीं पर हुए हैं। करीब चार लाख शोध कबीर पर किए गए हैं। ये बात कही अभिनेता, गीतकार व संगीतकार शेखर सेन ने। वह रविवार को चंडीगढ़ थिएटर फेस्टिवल में कबीर नाटक के मंचन के लिए आए थे।
शेखर सेन ने बताया कि कबीर की जीवनी पर आधारित 78 किताबें पढ़ने के बाद उन्होंने कबीर नाटक को लिखा। इसके बाद उन्होंने 1999 में पहली बार कबीर नाटक का मंचन किया था। इसके बाद से अब तक वह इसे 385 बार मंचन कर चुके हैं। रविवार को उन्होंने 386वीं बार मंचन किया। कई भाषाओं के जानकार सेन ने अपने प्रमुख नाटकों तुलसी और कबीर में अवधी, साहेब में हिंदी व उर्दू, सूरदास में ब्रज और विवेकानंद में हिंदी, अंग्रेजी व उर्दू भाषाओं का प्रयोग किया है।
अपने नाटकों के बारे में शेखर सेन ने कहा कि वह बच्चों और युवाओ के लिए ही नाटक लिखते हैं क्योंकि बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते है उन्हें जिस आकार में ढालेंगे उसी में ढल जाएंगे। कबीर, तुलसी, सूरदार जैसे नाटक करके मैं खुद को भी खुशनसीब मानता हूं कि क्योंकि इससे मुझे संतों के किरदार को जीने का मौका मिलता है।
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उनके नाटकों में संगीत हमेशा होता है इस पर उन्होंने कहा कि संगीत के बिना अभिनय अधूरा है। इसलिए हर नाटक में संगीत का इस्तेमाल करता हूं। हां, एक बात जरूर है कि नाटक में संगीत का इस्तेमाल करते समय इस बात का ध्यान रखता हूं कि संगीत न भावहीन हो और न ही नीरस।
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शेखर सेन ने बताया कि कबीर की जीवनी पर आधारित 78 किताबें पढ़ने के बाद उन्होंने कबीर नाटक को लिखा। इसके बाद उन्होंने 1999 में पहली बार कबीर नाटक का मंचन किया था। इसके बाद से अब तक वह इसे 385 बार मंचन कर चुके हैं। रविवार को उन्होंने 386वीं बार मंचन किया। कई भाषाओं के जानकार सेन ने अपने प्रमुख नाटकों तुलसी और कबीर में अवधी, साहेब में हिंदी व उर्दू, सूरदास में ब्रज और विवेकानंद में हिंदी, अंग्रेजी व उर्दू भाषाओं का प्रयोग किया है।
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अपने नाटकों के बारे में शेखर सेन ने कहा कि वह बच्चों और युवाओ के लिए ही नाटक लिखते हैं क्योंकि बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते है उन्हें जिस आकार में ढालेंगे उसी में ढल जाएंगे। कबीर, तुलसी, सूरदार जैसे नाटक करके मैं खुद को भी खुशनसीब मानता हूं कि क्योंकि इससे मुझे संतों के किरदार को जीने का मौका मिलता है।
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उनके नाटकों में संगीत हमेशा होता है इस पर उन्होंने कहा कि संगीत के बिना अभिनय अधूरा है। इसलिए हर नाटक में संगीत का इस्तेमाल करता हूं। हां, एक बात जरूर है कि नाटक में संगीत का इस्तेमाल करते समय इस बात का ध्यान रखता हूं कि संगीत न भावहीन हो और न ही नीरस।