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विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: युवावस्था में बढ़ती जिम्मेदारी और सपनों को पूरा करने की चाह बना रही मनोरोगी

Thu, 10 Oct 2024 03:19 PM IST
निवेदिता वर्मा वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Thu, 10 Oct 2024 03:19 PM IST
सार

युवावस्था जिंदगी का वह पड़ाव है, जिसमें व्यक्ति जिंदगी की परिस्थितियों से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। उस समय मानसिक दबाव तेजी से बढ़ता है और वो जाने अनजाने मानसिक समस्या की चपेट में आने लगता है। इसलिए अस्पतालों की ओपीडी में आने वाले मनोरोगियों में युवाओं की संख्या पहले की तुलना में तेजी से बढ़ रही है। 

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World Mental Health Day Increasing responsibility in youth
तनाव - फोटो : फाइल

विस्तार

युवावस्था में बहुत सारी उम्मीदें, आशाएं और जिम्मेदारियां एक साथ मिलती है। इन्हें पूरा करने का भार अकेले कंधों पर होता है। इस दौर में वास्तविक रूप से मानसिक समस्याएं शुरू होने लगती हैं। इसका पता काफी समय बाद चल पाता है। क्योंकि जिम्मेदारियां को पूरा करने और आगे बढ़ने की इच्छा में युवा वर्ग इन समस्याओं को नजर अंदाज करता रहता है। 

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चिंता की बात यह है कि चारों तरफ से घिरा महसूस होने के कारण युवाओं की मानसिक स्थिति बिगड़ने लगती है और वह उस स्थिति में आत्महत्या या खुद को नुकसान पहुंचाना सबसे आसान समझते हैं। यह कहना है पीजीआई के मनोचिकित्सा विभाग के प्रो. शुभ मोहन सिंह का।
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प्रो. शुभ मोहन सिंह ने बताया कि युवावस्था में मानसिक रोगों की चपेट में आने की शुरुआत होने के बावजूद इलाज में की गई देरी स्थिति को बेहद गंभीर बना रही है इसलिए जरूरी है कि युवा अपने निर्णय लेने की क्षमता, तनाव प्रबंधन, काम का दबाव, परिवार की जिम्मेदारियां और व्यक्तिगत रिश्ते जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर निर्णय लेने के दौरान अपना मानसिक आकलन जरूर करें। अगर उस दौरान वह किसी भी बिंदु पर खुद को कमजोर पाएं तो तत्काल अपने करीबी दोस्त, परिवार के सदस्य से उस पर खुलकर बात करें। अगर उस स्थिति में भी सही रास्ता न दिखे तो मनोचिकित्सक की सलाह लें। समय रहते उचित परामर्श लेने से बेहतर कोई भी इलाज नहीं है।

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नकारात्मक निर्णय हमेशा कल पर टालें

प्रो. शुभ मोहन का कहना है कि युवावस्था में नकारात्मक विचार जितने तेजी से आते हैं, उतनी ही तेजी से उस दौरान नकारात्मक निर्णय लेने की होड़ रहती है। ऐसे में युवाओं को सबसे महत्वपूर्ण सलाह दी जाती है कि वे मन में किसी भी तरह का नकारात्मक विचार आने पर उससे संबंधित निर्णय लेने को अगले दिन पर टाल दें। क्योंकि तनाव का कारण जितना पुराना होता है वह उतना ही सामान्य रूप ले लेता है। प्रो. शुभ मोहन का कहना है कि आत्महत्या जैसे मामलों में खास तौर पर युवा तत्काल निर्णय लेने लेने की भूल करते हैं, जिससे बचना मुश्किल हो जाता है। वहीं, मानसिक परेशानी से बचने के लिए सलाह लेने की आदत डालें। अपनों के साथ की गई चर्चा से लाभ न मिले तो बेझिझक विशेषज्ञ से संपर्क करें।

तनाव युवा वर्ग को सबसे ज्यादा कर रहा प्रभावित, हो जाएं सचेत

पीजीआई के मनोचिकित्सक डॉ. राहुल चक्रवर्ती का कहना है कि युवाओं को सचेत होने की जरूरत है क्योंकि यह वर्ग मानसिक तनाव से ज्यादा प्रभावित हो रहा है। ज्यादा पाने की चाह, आगे निकलने की दौड़, दुनिया का डर, समय की कमी, परिवार से दूरी, शौक के लिए समय न होना, तनाव का बढ़ता स्तर, काम का दबाव और कार्यक्षेत्र में तनाव मानसिक रोगी बना रहा है। ऐसे में जरूरी है परिवार के साथ समय बिताएं और शौक विकसित करें। इसके अलावा योग, ध्यान और आहार पर विशेष ध्यान दें। सबसे जरूरी है कि तनाव का स्तर बर्दाश्त से बाहर होने पर नजरअंदाज न करें और तत्काल विशेषज्ञ की सलाह लें।

मन की बात कहने में झिझक है तो टेली मानस है न

मानसिक तनाव पर काबू के लिए 2022 अक्टूबर में लॉन्च की गई मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन टेली मानस की सुविधा अब चंडीगढ़ में 24 घंटे उपलब्ध करा दी गई है। इसके अंतर्गत हेल्पलाइन नंबर 14416 पर कॉल करने वालों की समस्या का समाधान विशेषज्ञ कर रहे हैं। केंद्र के वरिष्ठ परामर्शदाता व पीजीआई के मनोचिकित्सक डॉ. राहुल चक्रवर्ती ने टेली मानस हेल्पलाइन का मुंख्य उद्देश्य समस्या के दौरान तत्काल समाधान उपलब्ध कराना है। क्योंकि लोगों में तनाव का स्तर तेजी से बढ़ रहा है। सही दिशा प्राप्त न होने पर खासतौर पर युवा गलत निर्णय ले रहे हैं इसलिए युवाओं को समस्या के दौरान टेली मानस पर कॉल करने की सलाह दी जा रही है। तनावग्रस्त व्यक्ति को राहत पहुंचाने के लिए इस हेल्प लाइन पर कॉल करने वाले को उसकी भाषा के अनुरूप काउंसलिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।

मानसिक तनाव दूर करना है तो इसे आजमाएं

  • मानसिक तनाव को कम करने के लिए अपनी समस्याओं को परिजनों और दोस्तों से साझा करें।
  • एक्सरसाइज, योग, ध्यान और खानपान पर ध्यान दें।
  • लोगों से मिले और बातें करें।
  • सकारात्मक विचारों को अपनाएं।
  • अच्छी पुस्तकें पढ़ें।
  • नींद पूरी लें, इससे काफी अच्छा असर पड़ेगा।
  • सोशल मीडिया और कंप्यूटर पर काम कम करें।
  • बच्चों के साथ समय बिताएं। उन्हें इनडोर की बजाय आउटडोर गेम खेलने भेजें।
  • यदि समस्या ज्यादा बढ़े तो डॉक्टर से सुझाव लें।
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