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पीजीआई के इंडोक्राइनोलॉजी विभाग में बनेगा विश्व स्तरीय आनुवंशिक प्रयोगशाला
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चंडीगढ़। पीजीआई के इंडोक्राइनोलॉजी विभाग में विश्व स्तरीय जेनेटिक एनालेसिस लैब स्थापित की जा रही है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) ने डीएसटी एफआईएसटी (फंड फॉर इंप्रूवमेंट ऑफ एसएंडटी इंफ्रास्ट्रक्चर) लेवल 2 के अंतर्गत चार करोड़ का अनुदान दिया है। लैब स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसकी स्थापना से इंडोक्राइन (हार्मोन) से संबंधित मरीजों के इलाज में आसानी होगी और इस तरह की बीमारियों के कारण व बचाव के उपाय जानने पर भी काम किया जा सकेगा। इतना ही नहीं मंत्रालय ने इस लैब के लिए देशभर के संस्थानों में पीजीआई को वरीयता दी है। इससे पहले पीजीआई के एक्सपरीमेंटल मेडिसिन और इम्युनोलॉजी विभाग को यह ग्रांट मिल चुकी है।
पीजीआई में इंडोक्राइनोलॉजी विभाग में मरीजों की संख्या काफी ज्यादा है। यहां चंडीगढ़ व आसपास के प्रदेशों से ही नहीं बल्कि देशभर से मरीज इलाज कराने आ रहे हैं। ऐसे में लैब बनने से उन मरीजों को भी उच्चस्तरीय इलाज उपलब्ध होगा, साथ ही शोध के क्षेत्र में भी सफलता मिलेगी।
आनुवांशिक बीमारी का पता लगाने के लिए जेनेटिक टेस्ट जरूरी
पीजीआई इंडोक्राइनोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. संजय भडाडा ने बताया कि बीमारियों का पता लगाने के लिए की जाने वाली जांच में से एक जेनेटिक टेस्टिंग भी है। इसके जरिए यह पता लगाया जाता है कि आनुवांशिक बीमारी अगली पीढ़ी में जा सकती है या नहीं। इस टेस्ट को करने के लिए डीएनए का सैंपल लिया जाता है। इसके लिए खून, बाल, त्वचा या टिश्यू के नमूने लिए जाते हैं। टेस्ट रिपोर्ट में डीएनए, प्रोटीन या गुण सूत्रों में मिले परिवर्तन के आधार पर बीमारी के बारे में पता चलता है। जेनेटिक टेस्टिंग सभी बीमारियों में जरूरी नहीं होती। इस जांच का प्रमुख फायदा यह है कि इसकी सहायता से नवजात बच्चों में होने वाले आनुवांशिक समस्याओं के बारे में पता लगाकर समय पर उनका इलाज किया जा सकता है।
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जेनेटिक लैब बेहद महत्वपूर्ण
- इस जांच से अगली पीढ़ी में बीमारी की स्थिति का आकलन किया जा सकता है।
- किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति में इलाज प्रक्रिया को आसान और सटीक बनाया जा सकता है।
- नवजात में समय रहते बीमारी की स्थिति का सही आकलन किया जा सकता है।
- ऐसी बीमारियां जिनके होने का कारण ज्ञात न हो उस संबंध में आकलन किया जा सकता है।
डीएसटी एफआईएसटी लेवल 2 का मिला अनुदान
डीएसटी न केवल अकादमिक संगठनों में अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों के लिए बल्कि स्टार्ट-अप/निर्माण उद्योगों/एमएसएमई की ओर से उपयोग के लिए आरएंडडी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाकर आत्मानिर्भर भारत के लक्ष्य की ओर उन्मुख करने के लिए बेहद सफल एफआईएसटी कार्यक्रम का पुनर्गठन कर रहा है।
कोट-
लैब के लिए पीजीआई को 4 करोड़ का अुनदान मिला है। लैब स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसके स्थापित होने से सिंड्रोम डिजीज के कारणों का पता लगाना आसान होगा। उसकी मदद से इलाज की सफलता दर में भी वृद्धि होगी।
-प्रो. संजय भडाडा, प्रमुख पीजीआई इंडोक्राइनोलॉजी विभाग
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पीजीआई में इंडोक्राइनोलॉजी विभाग में मरीजों की संख्या काफी ज्यादा है। यहां चंडीगढ़ व आसपास के प्रदेशों से ही नहीं बल्कि देशभर से मरीज इलाज कराने आ रहे हैं। ऐसे में लैब बनने से उन मरीजों को भी उच्चस्तरीय इलाज उपलब्ध होगा, साथ ही शोध के क्षेत्र में भी सफलता मिलेगी।
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आनुवांशिक बीमारी का पता लगाने के लिए जेनेटिक टेस्ट जरूरी
पीजीआई इंडोक्राइनोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. संजय भडाडा ने बताया कि बीमारियों का पता लगाने के लिए की जाने वाली जांच में से एक जेनेटिक टेस्टिंग भी है। इसके जरिए यह पता लगाया जाता है कि आनुवांशिक बीमारी अगली पीढ़ी में जा सकती है या नहीं। इस टेस्ट को करने के लिए डीएनए का सैंपल लिया जाता है। इसके लिए खून, बाल, त्वचा या टिश्यू के नमूने लिए जाते हैं। टेस्ट रिपोर्ट में डीएनए, प्रोटीन या गुण सूत्रों में मिले परिवर्तन के आधार पर बीमारी के बारे में पता चलता है। जेनेटिक टेस्टिंग सभी बीमारियों में जरूरी नहीं होती। इस जांच का प्रमुख फायदा यह है कि इसकी सहायता से नवजात बच्चों में होने वाले आनुवांशिक समस्याओं के बारे में पता लगाकर समय पर उनका इलाज किया जा सकता है।
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जेनेटिक लैब बेहद महत्वपूर्ण
- इस जांच से अगली पीढ़ी में बीमारी की स्थिति का आकलन किया जा सकता है।
- किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति में इलाज प्रक्रिया को आसान और सटीक बनाया जा सकता है।
- नवजात में समय रहते बीमारी की स्थिति का सही आकलन किया जा सकता है।
- ऐसी बीमारियां जिनके होने का कारण ज्ञात न हो उस संबंध में आकलन किया जा सकता है।
डीएसटी एफआईएसटी लेवल 2 का मिला अनुदान
डीएसटी न केवल अकादमिक संगठनों में अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों के लिए बल्कि स्टार्ट-अप/निर्माण उद्योगों/एमएसएमई की ओर से उपयोग के लिए आरएंडडी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाकर आत्मानिर्भर भारत के लक्ष्य की ओर उन्मुख करने के लिए बेहद सफल एफआईएसटी कार्यक्रम का पुनर्गठन कर रहा है।
कोट-
लैब के लिए पीजीआई को 4 करोड़ का अुनदान मिला है। लैब स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसके स्थापित होने से सिंड्रोम डिजीज के कारणों का पता लगाना आसान होगा। उसकी मदद से इलाज की सफलता दर में भी वृद्धि होगी।
-प्रो. संजय भडाडा, प्रमुख पीजीआई इंडोक्राइनोलॉजी विभाग