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Chandigarh News: तकनीक का कमाल... सुरक्षित मातृत्व के लिए गर्भ में पल रहे फीटल की सर्जरी संभव

Mon, 23 Dec 2024 01:53 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Mon, 23 Dec 2024 01:53 AM IST
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Wonder of technology... Surgery of fetus in the womb is possible for safe motherhood
चंडीगढ़। चिकित्सा के क्षेत्र में तकनीक के विकास ने सुरक्षित मातृत्व की राह को दिनोंदिन आसान बनाने का काम किया है। तकनीक की ही बदौलत अब मां के गर्भ में पल रहे फीटल (भ्रूण) की सर्जरी संभव हो पा रही है। डिफॉर्मेटिक हर्निया इसका उदाहरण है। मौजूदा समय में दक्षिण भारत में इस तकनीक का उपयोग कर गर्भ में पल रहे शिशु को सुरक्षित जीवन प्रदान किया जा रहा है। यह बातें इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक के सदस्य डॉ. नीरज ने रविवार को ट्राइसिटी पेरिनेटोलॉजी मीट में बतौर वक्ता कहीं। उन्होंने बताया कि पेरिनेटोलॉजी मातृ भ्रूण चिकित्सा की एक विशेष शाखा है, जिसमें गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताओं का प्रबंध किया जाता है। इसके अंतर्गत गर्भवती महिला और उसके भ्रूण के स्वास्थ्य पर अलग-अलग विशेषज्ञ मिलकर काम करते हैं। उन्होंने बताया कि इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य बाल रोग विशेषज्ञ और स्त्री रोग विशेषज्ञों को इससे जुड़ा प्रशिक्षण देकर सुरक्षित मातृत्व को और सरल बनाना है। कार्यक्रम में फीटल मेडिसिन एसोसिएशन की सदस्य डॉ. हरप्रीत नहीं बताया कि अब बाल रोग विशेषज्ञ स्त्री रोग विशेषज्ञों को बच्चों के रिसस्टेशन की जानकारी दे रहे हैं, क्योंकि कई बार डिलीवरी के दौरान ऐसी स्थिति होती है जब बाल रोग विशेषज्ञ मौके पर उपलब्ध नहीं होता और नवजात को रिसस्टेशन देने की जरूरत पड़ती है।
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जेनेटिक टेस्ट से राह हुई आसान
कार्यक्रम में डॉ. हरप्रीत ने बताया कि ऑर्गेनाइजेशन ऑफ रेयर डिजीज इन इंडिया के मुताबिक दुनियाभर में अब तक 7,000 से ज्यादा दुर्लभ बीमारियों का पता लगाया जा चुका है। भारत में हर 20 में से एक व्यक्ति किसी न किसी दुर्लभ बीमारी का शिकार है। इनमें से करीब आधे मरीज बच्चे हैं। 80 फीसदी दुर्लभ बीमारियों की वजह जींस में होने वाली गड़बड़ियां हैं। इनमें से अधिकतर बीमारियों का इलाज बहुत महंगा है। जब तक बीमारी के बारे में पता चलता है, इलाज मुश्किल हो जाता है। पर अब मेडिकल साइंस की मदद से भविष्य में होने वाली बीमारियों का वर्षों पहले पता लग सकता है। जीन टेस्टिंग से 10-15 साल पहले भविष्य में होने वाली बीमारी (डायबिटीज, कैंसर) की जानकारी मिल सकती है। जेनेटिक टेस्ट के जरिए जींस में होने वाले म्यूटेशन यानी बदलाव के बारे में पता लग जाता है। फैमिली शुरू करने से पहले दंपती अपने जींस की टेस्टिंग से ये पता लगा सकते हैं कि भविष्य में उनके होने वाले बच्चे को किन बीमारियों का खतरा है। डॉ. हरप्रीत ने बताया कि कैंसर से लेकर हाइपरटेंशन और डायबिटीज जैसी बीमारियों का खतरा भी 10-15 साल पहले जान सकते हैं।
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तकनीक की जानकारी जरूरी
डॉ. नीरज ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों में ही जेनेटिक्स, फीटल मेडिसिन व हाई रिजॉल्यूशन अल्ट्रासाउंड के बारे में मिलकर मंथन कर सकते हैं। ऑब्सटेट्रिक्स व नियोनेटोलॉजी के क्षेत्र में लेटेस्ट एडवांसमेंट, हाई रिस्क प्रेगनेंसी, प्रीमेच्योर बर्थ व जेनेटिक्स पर मंथन के लिए उत्तर भारत के लगभग 100 स्पेशलिस्ट एकत्र हुए। कार्यक्रम में डॉ. पूनम कुमार, डॉ. हरप्रीत व डॉ. पल्लव गुप्ता, डॉ. सुप्रीत खुराना असिस्टेंट प्रोफेसर जीएमसीएच, डॉ सौरभ कपूर और डॉ. रवनीत कौर ने भी जानकारी दी।
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