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चाबहार से हटना भारत के लिए घातक, चीन-पाकिस्तान को होगा सीधा फायदा: रक्षा विशेषज्ञ
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-भारत को दिखानी होगी अब कूटनीतिक ताकत झुकना देश हित में नहीं
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कंवरपाल
हलवारा। ईरान के चाबहार बंदरगाह पर भारत का नियंत्रण कमजोर होना देश के दीर्घकालिक सामरिक और आर्थिक हितों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। भारतीय सेना के रिटायर्ड कैप्टन और रक्षा विशेषज्ञ राजिंदर सिंह लिट्ट का कहना है कि यदि भारत दबाव में आकर चाबहार से कदम पीछे खींचता है, तो इसका सबसे बड़ा लाभ पाकिस्तान और उसके रणनीतिक साझेदार चीन को मिलेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत को किसी भी बाहरी दबाव में झुके बिना कड़े और स्पष्ट कूटनीतिक फैसले लेने की जरूरत है।
चाबहार भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान तक सीधा व्यापार और पारगमन मार्ग देता है। पाकिस्तान द्वारा भूमि मार्ग बंद होने की स्थिति में यह भारत के लिए एकमात्र व्यावहारिक विकल्प है। इसके माध्यम से भारत मध्य एशिया के देशों—उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान तक पहुंच सकता है। चाबहार अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे से जुड़कर स्वेज नहर के मुकाबले छोटा और प्रभावी मार्ग भी उपलब्ध कराता है।
रणनीतिक संतुलन और चीन-पाकिस्तान
चाबहार, चीन की बेल्ट एंड रोड पहल और पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के मुकाबले भारत के लिए अहम भू-राजनीतिक संतुलन है। ग्वादर से केवल 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चाबहार पर भारत की पकड़ कमजोर होने पर अरब सागर, होर्मुज जलडमरूमध्य और फारस की खाड़ी में उसकी रणनीतिक मौजूदगी प्रभावित होगी।
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कमजोर स्थिति और चुनौतियां
अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए प्रतिबंधों ने भारतीय निवेश और वित्तपोषण प्रभावित किया। भारत की परियोजनाओं में देरी, नौकरशाही अड़चनें और चाबहार-जाहेदान रेल परियोजना की धीमी गति ने स्थिति और कमजोर की। वहीं, चीन ने दीर्घकालिक रणनीतिक और ऊर्जा समझौतों के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ा ली। यदि भारत चाबहार में नियंत्रण खो देता है, तो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच समाप्त हो जाएगी। चीन और पाकिस्तान को खाड़ी और मध्य एशियाई क्षेत्र में मजबूत बढ़त मिलेगी। भारत वैकल्पिक रूप से ओमान या यूएई के बंदरगाहों पर निर्भर होगा।
महाद्वीपीय रणनीति की रीढ़
कैप्टन लिट्ट के अनुसार भारत अभी भी कदम उठा सकता है। विशेष प्रतिबंध-छूट के लिए अमेरिका से कूटनीतिक वार्ता, बंदरगाह और रेल अवसंरचना में तेजी से निवेश, मध्य एशियाई देशों के साथ सीधे पारगमन समझौते और रूस-ईरान के साथ त्रिपक्षीय समन्वय। चाबहार केवल वाणिज्यिक बंदरगाह नहीं, बल्कि भारत की महाद्वीपीय रणनीति की रीढ़ है। आने वाले वर्षों में तय होगा कि यह भारत का रणनीतिक प्रवेश द्वार बना रहेगा या चीन के प्रभाव वाला केंद्र बन जाएगा।
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कंवरपाल
हलवारा। ईरान के चाबहार बंदरगाह पर भारत का नियंत्रण कमजोर होना देश के दीर्घकालिक सामरिक और आर्थिक हितों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। भारतीय सेना के रिटायर्ड कैप्टन और रक्षा विशेषज्ञ राजिंदर सिंह लिट्ट का कहना है कि यदि भारत दबाव में आकर चाबहार से कदम पीछे खींचता है, तो इसका सबसे बड़ा लाभ पाकिस्तान और उसके रणनीतिक साझेदार चीन को मिलेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत को किसी भी बाहरी दबाव में झुके बिना कड़े और स्पष्ट कूटनीतिक फैसले लेने की जरूरत है।
चाबहार भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान तक सीधा व्यापार और पारगमन मार्ग देता है। पाकिस्तान द्वारा भूमि मार्ग बंद होने की स्थिति में यह भारत के लिए एकमात्र व्यावहारिक विकल्प है। इसके माध्यम से भारत मध्य एशिया के देशों—उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान तक पहुंच सकता है। चाबहार अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे से जुड़कर स्वेज नहर के मुकाबले छोटा और प्रभावी मार्ग भी उपलब्ध कराता है।
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रणनीतिक संतुलन और चीन-पाकिस्तान
चाबहार, चीन की बेल्ट एंड रोड पहल और पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के मुकाबले भारत के लिए अहम भू-राजनीतिक संतुलन है। ग्वादर से केवल 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चाबहार पर भारत की पकड़ कमजोर होने पर अरब सागर, होर्मुज जलडमरूमध्य और फारस की खाड़ी में उसकी रणनीतिक मौजूदगी प्रभावित होगी।
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कमजोर स्थिति और चुनौतियां
अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए प्रतिबंधों ने भारतीय निवेश और वित्तपोषण प्रभावित किया। भारत की परियोजनाओं में देरी, नौकरशाही अड़चनें और चाबहार-जाहेदान रेल परियोजना की धीमी गति ने स्थिति और कमजोर की। वहीं, चीन ने दीर्घकालिक रणनीतिक और ऊर्जा समझौतों के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ा ली। यदि भारत चाबहार में नियंत्रण खो देता है, तो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच समाप्त हो जाएगी। चीन और पाकिस्तान को खाड़ी और मध्य एशियाई क्षेत्र में मजबूत बढ़त मिलेगी। भारत वैकल्पिक रूप से ओमान या यूएई के बंदरगाहों पर निर्भर होगा।
महाद्वीपीय रणनीति की रीढ़
कैप्टन लिट्ट के अनुसार भारत अभी भी कदम उठा सकता है। विशेष प्रतिबंध-छूट के लिए अमेरिका से कूटनीतिक वार्ता, बंदरगाह और रेल अवसंरचना में तेजी से निवेश, मध्य एशियाई देशों के साथ सीधे पारगमन समझौते और रूस-ईरान के साथ त्रिपक्षीय समन्वय। चाबहार केवल वाणिज्यिक बंदरगाह नहीं, बल्कि भारत की महाद्वीपीय रणनीति की रीढ़ है। आने वाले वर्षों में तय होगा कि यह भारत का रणनीतिक प्रवेश द्वार बना रहेगा या चीन के प्रभाव वाला केंद्र बन जाएगा।