{"_id":"5dba74ed8ebc3e013b287342","slug":"weak-organization-reason-behind-congress-defeation-in-haryana-assembly-elections-2019","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार का बड़ा कारण कमजोर संगठन, एकजुट करना चुनौती","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार का बड़ा कारण कमजोर संगठन, एकजुट करना चुनौती
Thu, 31 Oct 2019 11:15 AM IST
खुशबू गोयल
यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 31 Oct 2019 11:15 AM IST
विज्ञापन
हरियाणा कांग्रेस
- फोटो : amar ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हरियाणा में कांग्रेस की हार का एक बड़ा कारण संगठन का कमजोर होना भी रहा। डॉ. अशोक तंवर पांच साल आठ महीने में कांग्रेस को मजबूत नहीं कर पाए। उनका अधिकांश समय पूर्व सीएम हुड्डा के साथ राजनीतिक लड़ाई लड़ने में ही निकला। कांग्रेस अगर धरातल तक मजबूत होती तो भाजपा को और कड़ी टक्कर देते हुए सत्ता में लौट सकती थी।
चुनाव से एक महीना पहले प्रदेशाध्यक्ष की कुर्सी संभालने वाली कुमारी सैलजा की असली अग्निपरीक्षा भी अब शुरू होगी। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के सभी धड़ों को एकजुट करने की है। उन्हें कार्यकर्ताओं और नेताओं को एकजुटता का पाठ पढ़ाकर नए सिरे से बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना होगा।
चूंकि, 134 साल पुरानी कांग्रेस एकजुट होकर ही विरोधियों से लोहा ले सकती है। सैलजा को पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा, पूर्व मंत्री कैप्टन अजय यादव, पूर्व मंत्री किरण चौधरी, एआईसीसी मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला, विधायक कुलदीप बिश्नोई सरीखे बड़े नेताओं के मतभेद मिटाने होंगे।
विज्ञापन
हुड्डा-सैलजा की जोड़ी साथ मिलकर चली तो यह काम मुश्किल भी नहीं दिखता है, सिर्फ बड़े नेताओं को पार्टी की भलाई के लिए अपने गिले-शिकवे मिटाने होंगे। यह भी जानना होगा कि कांग्रेस के बड़े दिग्गज व लगातार चुनकर आ रहे विधायक क्यों हारे।
विज्ञापन
चुनाव से एक महीना पहले प्रदेशाध्यक्ष की कुर्सी संभालने वाली कुमारी सैलजा की असली अग्निपरीक्षा भी अब शुरू होगी। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के सभी धड़ों को एकजुट करने की है। उन्हें कार्यकर्ताओं और नेताओं को एकजुटता का पाठ पढ़ाकर नए सिरे से बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना होगा।
विज्ञापन
चूंकि, 134 साल पुरानी कांग्रेस एकजुट होकर ही विरोधियों से लोहा ले सकती है। सैलजा को पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा, पूर्व मंत्री कैप्टन अजय यादव, पूर्व मंत्री किरण चौधरी, एआईसीसी मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला, विधायक कुलदीप बिश्नोई सरीखे बड़े नेताओं के मतभेद मिटाने होंगे।
विज्ञापन
हुड्डा-सैलजा की जोड़ी साथ मिलकर चली तो यह काम मुश्किल भी नहीं दिखता है, सिर्फ बड़े नेताओं को पार्टी की भलाई के लिए अपने गिले-शिकवे मिटाने होंगे। यह भी जानना होगा कि कांग्रेस के बड़े दिग्गज व लगातार चुनकर आ रहे विधायक क्यों हारे।
जिला, ब्लॉक अध्यक्षों के साथ बनाने होंगे एआईसीसी सदस्य
हरियाणा में कांग्रेस की स्थिति यह है कि बीते छह साल से जिला व ब्लॉक अध्यक्ष ही नहीं हैं। तंवर अपने कार्यकाल में इनकी नियुक्तियां ही नहीं करा पाए। इसके पीछे बड़ी वजह तंवर का किसी के साथ अच्छा तालमेल न होना भी रहा। जिससे कांग्रेस मजबूत होने के बजाए कमजोर होती गई।
पार्टी हरियाणा से एआईसीसी सदस्य की नियुक्ति भी नहीं करा पाई। सदस्यों की दो अलग-अलग सूचियां जारी हुईं, जिन पर भी तंवर खेमे ने रोक लगवा दी। सूचियों पर रोक लगवाने के लिए तंवर खेमा प्रियंका गांधी के पास जा पहुंचा था। इस खेमे का आरोप था कि सूची में हुड्डा समर्थक नेताओं को अधिक तरजीह दी गई है। सूची रुकने के बाद दोबारा जारी ही नहीं हुई।
तलाशने होंगे बहुमत तक न पहुंचने के कारण
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता वापसी की उम्मीद थी। कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश संगठन में बदलाव भी किया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। हुड्डा को देरी से कमान सौंपने का भी खामियाजा भुगतना पड़ा। पार्टी को हार के कारण भी तलाशने होंगे। भाजपा सरकार के खिलाफ लोगों में रोष के बावजूद कांग्रेस 31 सीटों पर ही कैसे सिमटी इसकी वजह सामने आना भी जरूरी है।
टिकट वितरण में गलतियां कितनी भारी पड़ी, तंवर ने कितना नुकसान पहुंचाया, संगठन मजबूत न होने की कितनी हानि हुई, ये सवाल भी कांग्रेस के सामने खड़े हैं।
पार्टी हरियाणा से एआईसीसी सदस्य की नियुक्ति भी नहीं करा पाई। सदस्यों की दो अलग-अलग सूचियां जारी हुईं, जिन पर भी तंवर खेमे ने रोक लगवा दी। सूचियों पर रोक लगवाने के लिए तंवर खेमा प्रियंका गांधी के पास जा पहुंचा था। इस खेमे का आरोप था कि सूची में हुड्डा समर्थक नेताओं को अधिक तरजीह दी गई है। सूची रुकने के बाद दोबारा जारी ही नहीं हुई।
तलाशने होंगे बहुमत तक न पहुंचने के कारण
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता वापसी की उम्मीद थी। कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश संगठन में बदलाव भी किया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। हुड्डा को देरी से कमान सौंपने का भी खामियाजा भुगतना पड़ा। पार्टी को हार के कारण भी तलाशने होंगे। भाजपा सरकार के खिलाफ लोगों में रोष के बावजूद कांग्रेस 31 सीटों पर ही कैसे सिमटी इसकी वजह सामने आना भी जरूरी है।
टिकट वितरण में गलतियां कितनी भारी पड़ी, तंवर ने कितना नुकसान पहुंचाया, संगठन मजबूत न होने की कितनी हानि हुई, ये सवाल भी कांग्रेस के सामने खड़े हैं।