{"_id":"641350a13444bf3ea10d8383","slug":"two-policemen-sentenced-after-31-years-in-fake-encounter-case-2023-03-16","type":"story","status":"publish","title_hn":"Mohali News: फर्जी मुठभेड़ केस में 31 साल तक तारीख पर तारीख... अब आरोपी दो पुलिसकर्मियों को सजा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Mohali News: फर्जी मुठभेड़ केस में 31 साल तक तारीख पर तारीख... अब आरोपी दो पुलिसकर्मियों को सजा
Thu, 16 Mar 2023 11:29 PM IST
ajay kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मोहाली (पंजाब)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मोहाली (पंजाब)
Published by: ajay kumar
Updated Thu, 16 Mar 2023 11:29 PM IST
सार
सीबीआई और शिकायतकर्ता सतनाम सिंह के वकील ने अदालत से मांग की है कि मृतक कुलदीप सिंह का एक ही बेटा है जो पोलियो के कारण दिव्यांग है। ऐसे में अदालत को परिवार की मदद के लिए मुआवजा देना चाहिए क्योंकि परिवार 31 साल से अदालत के सामने न्याय की उम्मीद लगाए बैठा है।
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
31 साल पुराने फर्जी मुठभेड़ मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने दो पुलिसकर्मियों को सजा सुनाई है। इस मामले में अदालत ने आरोपी झिरमल सिंह तत्कालीन इंस्पेक्टर को पांच साल और सूबा सिंह को तीन साल की सजा सुनाई है। बता दें कि 15 मार्च 1993 को एक फर्जी मुठभेड़ की गई थी। पुलिस ने इसमें पीड़ित परिवार के कुलदीप सिंह समेत पांच आरोपियों के मारे जाने की घोषणा की थी।
विज्ञापन
जानकारी के मुताबिक एडीजीपी (अपराध) के आदेश पर सिविल लाइन अमृतसर पुलिस स्टेशन में एक मामला दर्ज हुआ था। इस मामले में शिकायत सतनाम सिंह ने दी थी। बाद में अप्रैल 2001 को सरकार ने यह मामला सीबीआई को सौंप दिया था। सीबीआई ने इस मामले में गुरदेव सिंह, झिरमल सिंह और सूबा सिंह को आरोपी बनाया था। इस मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य आरोपी तत्कालीन सीआईए प्रभारी (तरनतारन) गुरदेव सिंह की मौत हो गई थी। दूसरे आरोपी झिरमल सिंह (53) ने अदालत में दलील दी है कि उसके खिलाफ यह पहला आरोप है। इसके अलावा कोई भी आपराधिक मामला कहीं दर्ज नहीं है। वह पहले ही 15 साल का लंबा ट्रायल सहन कर चुका है।
विज्ञापन
वहीं, सूबा सिंह (82) के वकील ने दलील दी है कि उनकी उम्र काफी ज्यादा हो गई है। 15 साल से वह ट्रायल झेल रहे हैं। उनके परिवार में पत्नी और बच्चे हैं। ऐसे में उन्हें रिहा किया जाना चाहिए। वहीं, सीबीआई और शिकायतकर्ता सतनाम सिंह के वकील ने दलील दी है कि पीड़ित कुलदीप सिंह का भी परिवार है और उसका भी एक बच्चा है। यह पूरा परिवार 31 साल से न्याय की उम्मीद लगाए अदालत के चक्कर काट रहा है। अगर आरोपियों को बरी किया जाता है तो समाज में लोगों का न्याय से विश्वास उठ जाएगा। अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद सजा का फैसला सुना दिया।
विज्ञापन
पीड़ित के वकील ने अदालत से पोलियो ग्रस्त बेटे के लिए मांगा मुआवजा
आरोपियों के खिलाफ अदालत में फैसला सुनाए जाने के बाद सीबीआई और शिकायतकर्ता सतनाम सिंह के वकील ने अदालत से मांग की है कि मृतक कुलदीप सिंह का एक ही बेटा है जो पोलियो के कारण दिव्यांग है। ऐसे में अदालत को परिवार की मदद के लिए मुआवजा देना चाहिए क्योंकि परिवार 31 साल से अदालत के सामने न्याय की उम्मीद लगाए बैठा है। इस पर मानयोग अदालत ने जिला न्याय सेवा प्राधिकरण को कहा है कि परिवार के हालात के हिसाब से वह जो भी मदद हो सके, वह उन्हें करनी चाहिए। आदेश की एक कॉपी विभाग को भेज दी गई है।
यह था पूरा मामला
मई, 1992 को सीआईए तरनतारन के इंस्पेक्टर गुरदेव सिंह ने शिकायतकर्ता सतनाम सिंह और मृतक कुलदीप सिंह को उनके दोस्त के अमृतसर स्थित घर से उठाया था। कुलदीप सिंह अमृतसर केंद्रीय सहकारी बैंक में क्लर्क था। सूत्रों से पता चला था कि एसएचओ वेरोवाल की ओर से मार्च 1992 में कुलदीप सिंह को समन भेजा गया था और मई 1992 में पुलिस उनके घर पर भी आई थी। सीआईए द्वारा उन्हें पकड़ने के करीब 20 दिन बाद सतनाम सिंह को सीआईए ने छोड़ दिया था लेकिन कुलदीप सिंह अभी भी उनकी हिरासत में था।
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि चार जुलाई, 1992 तक मृतक कुलदीप सिंह सीआईए की हिरासत में था लेकिन छह जुलाई 1992 को साजिश के तहत पुलिस ने कुलदीप के बड़े भाई कुलवंत सिंह (अमृतसर के सहकारी केंद्रीय बैंक में मैनेजर थे) को अवैध रूप से हिरासत में ले लिया। वहीं परिवार के सामने शर्त रखी थी की कि कुलवंत सिंह को तभी छोड़ा जाएगा, जब वह कुलदीप सिंह को उनके सामने पेश करेंगे। पुलिस ने कुलवंत सिंह को 10 दिन बाद अपनी अवैध हिरासत से छोड़ दिया था। परिवार ने जून 1994 में इसकी शिकायत मानव अधिकार आयोग को दी थी। पुलिस ने मामला छिपाने के लिए 15 मार्च 1993 को एक फर्जी मुठभेड़ की। इसमें पुलिस ने कुलदीप सिंह समेत अन्य पांच आरोपियों के मुठभेड़ में मारने का दावा किया।