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Chandigarh News: पंजाब में ट्रॉमा केस ज्यादा पर ट्रॉमा लाइफ सपोर्ट की जानकारी बहुत कम

Sun, 28 Jul 2024 06:02 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Sun, 28 Jul 2024 06:02 AM IST
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Trauma cases are high in Punjab but information about trauma life support is very less
चंडीगढ़। रोड साइड एक्सीडेंट के मामले दिनों दिन बढ़ रहे हैं। पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ से पीजीआई में सबसे ज्यादा ट्रॉमा के रेफर केस पंजाब से आ रहे हैं। चिंता की बात यह है कि पंजाब में रोड साइड ट्रॉमा लाइफ सपोर्ट की जानकारी बेहद कम है। पीजीआई आने वाले ज्यादातर मामलों में घायल को रास्ते में कई अन्य तरह की परेशानी हो जाती है, जिससे उसकी स्थिति और गंभीर हो जाती है। यह जानकारी पीजीआई ट्रॉमा एनेस्थीसिया ग्रुप की प्रो. काजल जैन ने शनिवार को नेहरू अस्पताल में तत्काल ट्रॉमा लाइफ सपोर्ट पर आयोजित कार्यशाला में दी। कार्यशाला में चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा के पुलिसकर्मियों के साथ नर्सिंग अफसरों ने भाग लिया।
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ग्रुप की डॉ. सुमन अरोड़ा ने बताया कि यह कार्यशाला 2018 से आयोजित की जा रही है। ट्रॉमा के केस में इससे काफी लाभ मिल रहा है इसलिए व्यापक रूप देने का प्रयास किया जा रहा है। डॉ. सुमन ने बताया कि इसमें प्री और पोस्ट टेस्ट लिया जाता है ताकि पता चल सके कि दी गई जानकारी कार्यशाला में शामिल पुलिस और पैरामेडिकल को कितनी समझ आई है। प्रो. काजल ने बताया कि इस कार्यशाला से ट्रॉमा के रेफर केस में की जाने वाली गलतियाें पर काबू मिल रहा है। पहले जहां ट्रॉमा सेंटर आने वाले रोड एक्सीडेंट केस में जानकारी के अभाव में घायल को 45 से 50 प्रतिशत तकनुकसान पहुंचता था, वहीं अब यह घटकर 30 से 40 प्रतिशत पर आ गया है।
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टूर्निकेट और सर्वाइकल कॉलर महत्वपूर्ण
कार्यशाला में आईं बीएचयू ट्रॉमा सेंटर की डॉ. मंजरी मिश्रा ने बताया कि रोड साइड एक्सीडेंट के मामले में टूर्निकेट और सर्वाइकल कॉलर दो महत्वपूर्ण चीजें हैं। इसका उपयोग कर पुलिसकर्मी घायल को सही स्थिति में ट्रॉमा सेंटर पहुंचा सकते हैं। डॉ. मंजरी ने बताया कि टूर्निकेट एक उपकरण है, जैसे कपड़े की एक पट्टी या रबर का एक बैंड, जिसे एक पैर या हाथ के चारों ओर कसकर लपेटा जाता है ताकि कुछ समय के लिए बहते खून को रोका जा सके लेकिन इसे बांधने के दौरान भी कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। इसे दो घंटे से पहले निकालना जरूरी होता है क्योंकि दो घंटे से ज्यादा देर तक बंधे रहने पर उससे लिंब ब्लॉक हो सकता है। वहीं, घायल के गर्दन में चोट लगी हो या हेलमेट फंसा हो तो उसे झटके से निकालने की गलती न करें। दो लोग मिलकर हेलमेट निकालें, एक घायल के गर्दन को सपोर्ट दे दूसरा हेलमेट निकाले। उसके बाद सर्वाइकल कॉलर लगा दें। इससे गर्दन की चोट में आराम मिलेगा अन्यथा जरा सी गलती होने पर घायल को लकवा भी हो सकता है। कार्यशाला को सफल बनाने में डॉ. कुमार रजनीकांत, डॉ. अमित शर्मा, डॉ निधि भाटिया, डॉ. जितेन्द्र का सहयोग रहा।
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