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गर्भावस्था के दौरान खुजली की समस्या बच्चे की जान डाल सकती है जोखिम में- प्रो. उषा दत्ता

Sun, 03 Oct 2021 01:33 AM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Sun, 03 Oct 2021 01:33 AM IST
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The problem of itching during pregnancy can put the life of the child at risk- Prof. Usha Dutta
चंडीगढ़। गर्भावस्था के दौरान खुजली अगर ज्यादा बढ़ी तो बच्चे के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। ऐसे में कई बार तय समय से पहले सर्जरी कर बच्चे को निकालना पड़ता है। इसमें स्त्रीरोग विशेषज्ञ के साथ गैस्ट्रो विशेषज्ञों का तालमेल बहुत ही जरूरी है, क्योंकि समय सहते सही निर्णय न लेने पर बच्चे की जान खतरे में पड़ सकती है। यह बातें पीजीआई में जीआई इमरजेंसी पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के पहले दिन विशेषज्ञों ने बताईं।
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गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग की ओर से आयोजित पांचवें जीआई इमरजेंसी अपडेट प्रोग्राम का शुभारंभ दिल्ली के बीएलके सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार, पीजीआई निदेशक प्रो. जगतराम, डीएन एकेडमी प्रो. जीडी पुरी व डीडीए कुमार गौरव ने किया। कार्यक्रम में देशभर के चिकित्सा संस्थानों के विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। कोरोना के कारण कार्यक्रम में 200 लोग उपस्थित हुए जबकि 600 प्रशिक्षु डॉक्टर वर्चुअल माध्यम से जुड़ेे।
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पीजीआई के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग की प्रमुख प्रो. उषा दत्ता ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान जैसे-जैसे समय बढ़ता जाता है, गर्भाशय में खिंचाव आता जाता है। इसकी वजह से पेट पर खुजली हो सकती है। अगर समस्या सामान्य हो तो ड्राइनेस का इलाज करने से खुजली कम हो जाती है। हार्मोनल बदलाव खासतौर पर एस्ट्रोजन का स्तर बढ़ने पर भी पेट पर खुजली हो सकती है। कई मामलों में इंट्राहेप्टिक कोलेस्टासिस ऑफ प्रेग्नेंसी (आईसीपी) इसका कारण होता है, जिससे बच्चे की जान जोखिम में पड़ जाती है।
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अक्सर यह समस्या गर्भावस्था के छठे सप्ताह से शुरू होती है। इससे पाइलाइसीस की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। इसके कारण बच्चे को 36 या 38 की बजाय 34 सप्ताह में ही पेट से निकालना पड़ता है। इस स्थिति में कई बार गर्भवती महिला को समस्या की गंभीरता देर से पता चलती है, जिससे इलाज जटिल हो जाता है।
कार्यक्रम के दौरान दिल्ली के विक्रम भाटिया और डॉ. अनिल अरोड़ा ने जीआई ब्लीड यानि पेट में किन्हीं कारणों से हो रहे रक्तस्राव के प्रबंधन से जुड़ी जानकारी दी। एम्स नई दिल्ली के प्रो. प्रमोद गर्ग और प्रो. विनीता आहूजा ने गर्भावस्था में अग्नाशय और आंत्ररोग के सूजन के प्रबंधन पर चर्चा की। दो दिवसीय इस कार्यक्रम में पेट में चोट, संक्रमण, लीवर संबंधी रोग, लीवर की विफलता, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ब्लीड जैसे विषयों पर प्रशिक्षण दिया जाएगा। कार्यक्रम में पीजीआई, एम्स, एसजीपीजीआई, सीएमसी वेल्लोर, मेदांता गुरुग्राम के विशेषज्ञ शामिल हैं।

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कोविड में डायरिया के कारण फेफड़े नहीं हुए ज्यादा क्षतिग्रस्त
गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के डॉ. जयंत ने कोरोना संक्रमित ऐसे 120 मरीजों पर एक अध्ययन किया है, जिससे यह परिणाम सामने आया है कि कोरोना संक्रमण के दौरान जिन मरीजों को पेट संबंधी परेशानी हुई, उनके फेफड़े ज्यादा क्षतिग्रस्त नहीं हुए। वहीं, जिन मरीजों को पहले से लीवर या पैंक्रियाज से जुड़ी परेशानी थी, उनकी स्थिति ज्यादा गंभीर रही। इसके कई कारण हो सकते हैं। मधुमेह पीड़ितों में उस दौरान मधुमेह का स्तर अनियंत्रित होना भी इसका कारण हो सकता है। वहीं इम्यूनोलॉजिकल प्रभाव के कारण डायरिया होने से फे फड़े पर दुष्प्रभाव कम हो सकता है, क्योंकि उस दौरान फेफड़े तक तीव्र संक्रमण नहीं पहुंच पाता है। प्रो. उषा ने बताया कि संक्रमण के बाद पेट संबंधी परेशानी होने पर चिंता करने की बजाय इंतजार करना फायदेमंद रहेगा। काढ़ा या अन्य ऐसी चीजों के ज्यादा सेवन से परेशानी कम होने की बजाय ज्यादा बढ़ा सकती है।
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