SYL : 2 स्टेट, पानी पर राजनीति, 15 बड़ी वजहें
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हरियाणा के लिए जीवनरेखा बन चुकी एसवाईएल नहर में कब पानी पहुंचेगा, कोई नहीं जानता। हरियाणा जहां केंद्र की मदद से इस परियोजना को पूरा करा लेना चाहता है, वहीं पंजाब पानी नहीं देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को भी दरकिनार करने से नहीं झिझक रहा।
हालात यह हैं कि पंजाब विधानसभा में इस बाबत अधिसूचना को कानून की शक्ल भी दी जा चुकी है। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट से होकर राष्ट्रपति के विचाराधीन पहुंच चुका है। हरियाणा में बंसीलाल के समय से अब तक सभी मुख्यमंत्रियों ने दावा किया है कि प्रदेश को एसवाईएल का पानी दिलाकर रहेंगे।
मुख्यमंत्री चौधरी हुकुम सिंह ने केंद्र से नहर के निर्माण का काम सीमा सुरक्षा संगठन को सौंपने की मांग भी की थी। चौधरी देवीलाल ने एसवाईएल नहर को लेकर न्याय युद्ध चलाया था। वहीं सभी दल एक-दूसरे की आलोचना में भी जुटे हैं। कांग्रेस नहर नहीं बन पाने के लिए भाजपा और इनेलो को जिम्मेदार ठहरा रही है तो भाजपा कांग्रेस पर उंगली उठा रही है।
पंजाब शुरू से ही हरियाणा को उसके हक का पानी देने से कतराता रहा है। जब हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट में केस जीतकर एसवाईएल का पानी मांगा तत्कालीन सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने विधानसभा में सभी जल समझौते रद्द कर दिए। प्रदेश को एसवाईएल का पानी अब तक नहीं मिला। इस बीच पंजाब ने अब सतलुज-ब्यास नदियों के जल पर रायल्टी मांग ली है। पंजाब के सीएम प्रकाश सिंह बादल का तर्क है कि हरियाणा उनके पानी का प्रयोग करता है, इसलिए रायल्टी देनी चाहिए।
हरियाणा-पंजाब फिर कोर्ट में
एसवाईएल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में हरियाणा के पक्ष में फैसला सुनाया था, लेकिन जुलाई 2004 में पंजाब विधानसभा ने इस मामले में बिल पास कर दिया, जिससे हरियाणा को पानी नहीं मिल पाया।
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर पहले ही कह चुके हैं कि वह सुप्रीम कोर्ट में पानी के लिए लड़ाई लड़ेंगे। खट्टर का बयान आया तो पंजाब ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया।
हरियाणा का मानना है कि मुल्लापेरियार मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद यह स्थापित कानून हो गया है कि अंतरराज्यीय नदियों के पानी से जुड़े समझौतों को एकतरफा समाप्त नहीं किया जा सकता।
खट्टर ने कहा है कि पंजाब द्वारा हरियाणा के हक में आए फैसले को लागू करने में देरी करने की एक चाल है। हरियाणा सरकार राष्ट्रपति संदर्भ 2004, जिस पर 2005 के बाद कोई सुनवाई नहीं हुई, पर शीघ्र सुनवाई करने और निर्णय देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में केस दायर करने जा रही है।
हांसी-बुटाना नहर पर भी खिंची हैं तलवारें
इस साल फरवरी में पंजाब ने अंतरराज्यीय नदी जल विवाद निपटारे के लिए योग्य ट्रिब्यूनल के गठन की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पंजाब ने शीर्ष कोर्ट से अपील की है कि इस बात का फैसला किया जाए कि क्या हरियाणा और राजस्थान रिपेरियन राज्य हैं?
राज्य सरकार ने इससे पहले केंद्र से अनुरोध किया था कि समय बीतने के साथ रावी-ब्यास नदी जल में कमी के मद्देनजर इसके वितरण के बारे में योग्य ट्रिब्यूनल गठित किया जाए। पंजाब का दावा है कि रावी-ब्यास के पानी पर पहला हक पंजाब का है और पंजाब में पानी की कमी है।
हरियाणा ने यमुना बेसिन क्षेत्र में 12 मई 1994 को यमुना समझौता और शारदा यमुना लिंक चैनल का प्रोजेक्ट बनाकर रावी-ब्यास के पानी से अधिकार गंवा दिया है। पंजाब का कहना है कि ब्यास नदी के पानी की यदि यमुना बेसिन क्षेत्र को सप्लाई की जाती है तो इससे पंजाब के फिरोजपुर, फरीदकोट, श्री मुक्तसर साहिब, मोगा, संगरूर, मानसा और बठिंडा में सूखा और बढ़ जाएगा।
इन क्षेत्रों को राज्यों के पुनर्गठन से पहले कानूनी तौर पर पानी का वितरण किया गया था और पांच दशक से ये क्षेत्र रिपेरियन सिद्धांत के अनुसार पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं।
आधे पानी से गुजारा कर रहा हरियाणा
हरियाणा में सिंचाई के मुख्य स्रोतों में यमुना, सतलुज और प्रस्तावित रावी-ब्यास का पानी शामिल है। प्रदेश को सतलुज का पानी भाखड़ा से निकलने वाली मुख्य नहर से मिलता है।
पहले इस नहर की क्षमता 12 हजार क्यूसेक थी जो अब घटकर 7700 क्यूसेक ही रह गई है। क्षमता घटने की मुख्य वजह पंजाब में पड़ने वाले नहर के हिस्से की मरम्मत नहीं किया जाना है।
केंद्र में एनडीए सरकार के रहते देश की प्रमुख नदियों को जोड़ने का विचार आया, लेकिन यह राष्ट्रीय स्तर तक ही सीमित रहा। पंजाब व हरियाणा के अलग होने के बाद जल बंटवारे के लिए सतलुज-यमुना लिंक नहर (एसवाईएल) की योजना बनी, जो आज तक अधूरी है। इसे लेकर दोनों राज्यों में विवाद जारी है।
पानी बाहर नहीं जाने देंगेः चंदूमाजरा
शिरोमणि अकाली दल के राष्ट्रीय महासचिव एवं सांसद प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने कहा कि राज्य के पास पानी की एक भी बूंद किसी भी राज्य को देने के लिए फालतू नहीं है। किसी कीमत पर सूबे के पानी की एक भी बूंद राज्य से बाहर नहीं जाने दी जाएगी। इसके लिए चाहे शिरोमणि अकाली को कितनी बड़ी भी कुर्बानी क्यों ने देनी पडे़।
चंदूमाजरा सोमवार को पूर्व सैनिक विंग के अध्यक्ष गुरजिंदर सिंह सिद्धू की स्थानीय रिहायश पर पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। चंदूमाजरा ने कहा कि इतिहास गवाह है कि आजादी के बाद सत्ता पर विराजमान कांग्रेस पार्टी ने पंजाब के साथ हमेशा पक्षपात किया है। खासकर राज्य के पानी के मामले में कांग्रेस ने हमेशा पंजाबियों के साथ धोखा किया है।
जो रीपेरीयन कमेटी का फैसला है वे उन्हें मंजूर है। उससे आगे और कुछ भी नहीं दिया जाएगा। चंदूमाजरा ने भूमि अधिग्रहण बिल का विरोध करते कहा कि शिरोमणि अकाली दल ने इस बिल संबंधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। शिअद किसानों की जमीन को एक्वायर करवाने के पक्ष में नहीं है।
समझौते हुए, खून बहा, पानी फिर भी नहीं पहुंचा
31 दिसंबर 1981 को पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। बैठक में तय किया गया कि रावी-ब्यास के पानी की 171.50 लाख एकड़ फुट की उपलब्धता में से पंजाब को 42.20 लाख एकड़ फुट, राजस्थान को 36 लाख एकड़ फुट, हरियाणा को 35 लाख एकड़ फुट, जम्मू-कश्मीर को 6.50 लाख एकड़ फुट और दिल्ली को 2 लाख एकड़ फुट पानी दे दिया जाए।
1982 में इंदिरा गांधी ने पंजाब के कपूरी में नहर की खुदाई के काम का उद्घाटन किया। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह ने विशेष उत्साह नहीं दिखाया। पंजाब के इलाके में बनने वाली नहर का काम आज तक पूरा नहीं हो सका। बाद में राजस्थान के इस मामले में पार्टी बन जाने से विवाद और पेचीदा हो गया और हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया।
पंजाब भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष संत हरचंद सिंह लौंगोवाल के बीच ‘राजीव लौंगोवाल समझौता’ हुआ। इस समझौते का उद्देश्य पंजाब व हरियाणा के बीच जल विवाद के अलावा हिंदी भाषी क्षेत्रों का हरियाणा को और चंडीगढ़ का पंजाब को हस्तांतरण था।
समझौते के कुछ दिन बाद संत लौंगोवाल की हत्या कर दी गई। इसके बाद पंजाब के सीएम सुरजीत सिंह बरनाला के समय नहर निर्माण के काम में तेजी तो आई, लेकिन जरनैल सिंह भिंडरवाला, गुरुचरण सिंह टोहड़ा, सिमरनजीत सिंह मान और जगजीत सिंह के भड़काऊ भाषणों से स्थिति बिगड़ी और आतंकवादियों ने नहर निर्माण में लगे इंजीनियरों और मजदूरों की हत्याएं शुरू कर दीं।
अपने लिए पानी नहीं, दूसरों को कहां से दें
सतलुज-यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर के मसले पर बरसों खून की होली का खेल देख चुके पंजाब के सामने यह मुद्दा फिर से सिर उठाने लगा है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से लेकर लोकसभा में कांग्रेस पक्ष के नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह तक बयान दे चुके हैं कि पंजाब के पास अन्य राज्यों को देने के लिए अब एक भी बूंद और पानी नहीं है। जब एसवाईएल का निर्माण शुरू हुआ था, तब भी ऐसे ही बयानों ने आग में घी का काम किया था।
इस बार बात शुरू हुई है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देशभर की नदियों को जोड़कर (इंटरलिंकिंग) पानी की समस्या को हल करने के बयान से। मोदी ने यह बयान 23 मार्च को हुसैनीवाला में शहीदी दिवस पर आयोजित जनसभा में दिया था। उसके बाद तो नदी जल विवाद पर बयानों की होड़ लग गई। पंजाब के हर नेता ने एसवाईएल के खिलाफ बयानबाजी की।
सबने कहा कि यहां अपनी ही मांग को पूरा करने के लिए पानी नहीं तो औरों को कहां से दिया जाए। एक तरह से इस मुद्दे पर पंजाब-हरियाणा के साथ केंद्र के भी परस्पर विरोधी स्वर सुनाई पड़े। नदी जल बंटवारे का मुद्दा पंजाब, हरियाणा और केंद्र के बीच सियासी जंग की बिसात बिछा चुका है।
प्रकाश सिंह बादल बोले, इंटरलिंकिंग के हक में नहीं
मुख्यमंत्री का कहना है कि पंजाब नदियों की इंटरलिंकिंग के हक में बिलकुल भी नहीं है। सूबे के पास एक बूंद भी फालतू पानी नहीं हैं। हमारे पास जितना पानी है, उससे हमारी अपनी मांग ही मुश्किल से पूरी होती है।
केंद्र से टकराव
इस मसले पर शिअद का शुरू से ही केंद्र के साथ टकराव रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले केंद्र में कांग्रेस सरकार होती थी और अब भाजपा की है।
मोर्चे लगे, हथियार उठे और हुईं हत्याएं
पंजाब के राजनेता शुरू से ही एकसुर में एसवाईएल का विरोध करते आ रहे हैं। पानी के मसले पर जहां अकालियों ने 70 और 80 के दशक में मोर्चे लगाए, वहीं युवाओं ने हथियार उठा लिए। 1985 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर एसवाईएल आदि के मसलों के हल के लिए राजीव-लौंगोवल समझौता हुआ। इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ।
रिपेरियन सिद्धांत के अनुसार बांट की मांग
पंजाब हमेशा से मांग करता आया है कि नदी जल की बांट रिपेरियन सिद्धांत के अनुसार होनी चाहिए। इसके अनुसार जो नदी जिस राज्य से गुजरती है, उस पर केवल उसी का हक होता है। अगर यह एक से अधिक राज्यों से गुजरती है तो उसके पानी को उन प्रदेशों के बीच बांटा जाता है।
फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंची पंजाब सरकार
इस मसले पर पंजाब सरकार एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंची है। सरकार ने कोर्ट में कहा है कि प्रदेश में पानी उपलब्धता घटती जा रही है। इसलिए नदियों के पानी की बांट का अनुपात नए सिरे से निर्धारित किया जाए।
याचिका में कहा गया है कि इस वक्त प्रदेश के पास 13.38 मिलियन एकड़ फुट पानी रह गया है, जो मांग से कम है। 1981-2002 की फ्लो सीरीज में यह 17.17 से कम होकर 14.37 एमएएफ रह गया था और 1981-2013 में 13.38 पर पहुंच गया है। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार 138 में से 110 डेवलपमेंट ब्लॉक्स में पानी के अत्यधिक उपयोग से इसकी कमी आ रही है।
विधानसभा में हर बार गूंजती है एसवाईएल के खिलाफ आवाज
पंजाब लगातार एसवाईएल का विरोध करता आ रहा है और इसके खिलाफ विधानसभा के हर सेशन में आवाज गूंजती है। हाल ही में समाप्त हुए बजट सत्र में भी नदी जल विवाद राज्यपाल के अभिभाषण का हिस्सा था।
ऐसी है एसवाईएल नहर
सतलुज और यमुना नदियों को जोड़ने वाली यह लिंक नहर पंजाब से होते हुए हरियाणा के अंबाला में प्रवेश करती है और करनाल में मूनक हेड के पास पश्चिमी यमुना नहर से जुड़ जाती है। अंबाला, कुरुक्षेत्र और करनाल में यह नहर भाखड़ा नहर की नरवाना ब्रांच के साथ-साथ बनाई गई है।
हालांकि, अब तक पानी नहीं आने के कारण इसकी हालत बहुत जर्जर हो चुकी है। इस नहर में तीन दशक से पानी का इंतजार है। अगर अब तक पानी आ गया होता तो आज हरियाणा की तस्वीर कुछ और होती।