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नशे की लत से जागा समाज सेवा का जज्बा
पठानकोट ।
Updated Wed, 19 Nov 2014 10:38 PM IST
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कहते हैं जिसकी जैसी सोहबत, उसकी अच्छी-बुरी आदतें भी वैसी ही होती हैं, लेकिन जिले के हलका भोआ निवासी युवक रॉकी मेहरा पर यह बात लागू नहीं होती। रॉकी मेहरा एक ऐसे युवक का नाम है, जिसने दोस्त को नशे के जाल में फंसता देख खुद नशे की गिरफ्त में फंसना मुनासिब नहीं समझा। बल्कि स्कूली मित्र उसके लिए इतना अजीज था कि उसकी बुरी लत ने रॉकी को समाज के लिए कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित किया।
अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि रॉकी ने लोगों को नशा, दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या व नकल सहित समाज में फैली अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूक करने की ठानी और बगैर किसी के सहयोग के ही उसने अपना प्रयास शुरू कर दिया। उसके जागरूकता अभियान से खुश डीसी ने भी रॉकी को सोशल सर्विस एंड ऑल राउंड ऑफ डेवलपमेंट अवार्ड से नवाजा। रॉकी को यह अवार्ड 15 अगस्त 2013 को मिला था। उस दौरान पठानकोट के डीसी रहे सिब्बन सी ने उन्हें पुरस्कृत किया था।
गरीब बच्चों पर दिखाई दरियादिली :
प्रशासन की ओर से सम्मानित होने के बाद आज रॉकी मेहरा के हौसले बुलंद हैं। आज क्षेत्र में उनकी पहचान एक ऐसे शिक्षक के रूप में है, जो गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करने के लिए जाना जाता है। खास तौर से नशे के खिलाफ चलाए गए अभियान के तहत रॉकी ने सार्वजनिक स्थलों, स्कूलों व कालेज में सेमिनार का आयोजन किया। इस प्रकार उसने करीब 12 सेमिनार आयोजित किए।
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रॉकी का कहना है कि उन्होंने करीब 155 सेमिनारों के आयोजन का लक्ष्य निर्धारित किया है। गरीब बच्चों के लिए उसकी ओर से शुरू किए गए कोचिंग सेंटर में आज 153 बच्चे पढ़ने आते हैं। इनमें से 55 बच्चे ऐसे हैं, जो कोचिंग की फीस देने में असमर्थ हैं। रॉकी ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के बावजूद दसवीं और प्लस टू स्तर के विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं।
तंगहाली पर भारी पड़ा हौसला :
रॉकी के परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह पढ़ाई के अलावा समाज सेवा में अपना समय दे सकें। घर में माता-पिता के अलावा एक बड़ी बहन भी है, जिन्होंने कभी उम्मीद नहीं की कि रॉकी कभी पढ़ाई से हटकर सामाजिक गतिविधियों में नाम कमा सकता है।
आर्थिक स्थिति ठीक न होने से पिता उसकी उच्च शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते थे, लेकिन उसके हौसले को देखते हुए प्रिंसीपल रविंद्र शर्मा व गौरव ने उसकी मदद की। रॉकी ने प्लस टू की परीक्षा भी बेहतर अंकोें से पास की। वह एबी कॉलेज पठानकोट में बीए (भाग-1) का छात्र है।
आज उनकी पढ़ाई का पूरा खर्च कालेज के प्रिंसिपल डा. दिनेश शर्मा उठा रहे हैं। रॉकी ने बताया कि उसके घर की आर्थिक हालत कमजोर होने के कारण वह रोजाना अपने घर भोआ से पठानकोट आने के लिए साइकिल की सवारी करते हैं।
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अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि रॉकी ने लोगों को नशा, दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या व नकल सहित समाज में फैली अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूक करने की ठानी और बगैर किसी के सहयोग के ही उसने अपना प्रयास शुरू कर दिया। उसके जागरूकता अभियान से खुश डीसी ने भी रॉकी को सोशल सर्विस एंड ऑल राउंड ऑफ डेवलपमेंट अवार्ड से नवाजा। रॉकी को यह अवार्ड 15 अगस्त 2013 को मिला था। उस दौरान पठानकोट के डीसी रहे सिब्बन सी ने उन्हें पुरस्कृत किया था।
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गरीब बच्चों पर दिखाई दरियादिली :
प्रशासन की ओर से सम्मानित होने के बाद आज रॉकी मेहरा के हौसले बुलंद हैं। आज क्षेत्र में उनकी पहचान एक ऐसे शिक्षक के रूप में है, जो गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करने के लिए जाना जाता है। खास तौर से नशे के खिलाफ चलाए गए अभियान के तहत रॉकी ने सार्वजनिक स्थलों, स्कूलों व कालेज में सेमिनार का आयोजन किया। इस प्रकार उसने करीब 12 सेमिनार आयोजित किए।
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रॉकी का कहना है कि उन्होंने करीब 155 सेमिनारों के आयोजन का लक्ष्य निर्धारित किया है। गरीब बच्चों के लिए उसकी ओर से शुरू किए गए कोचिंग सेंटर में आज 153 बच्चे पढ़ने आते हैं। इनमें से 55 बच्चे ऐसे हैं, जो कोचिंग की फीस देने में असमर्थ हैं। रॉकी ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के बावजूद दसवीं और प्लस टू स्तर के विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं।
तंगहाली पर भारी पड़ा हौसला :
रॉकी के परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह पढ़ाई के अलावा समाज सेवा में अपना समय दे सकें। घर में माता-पिता के अलावा एक बड़ी बहन भी है, जिन्होंने कभी उम्मीद नहीं की कि रॉकी कभी पढ़ाई से हटकर सामाजिक गतिविधियों में नाम कमा सकता है।
आर्थिक स्थिति ठीक न होने से पिता उसकी उच्च शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते थे, लेकिन उसके हौसले को देखते हुए प्रिंसीपल रविंद्र शर्मा व गौरव ने उसकी मदद की। रॉकी ने प्लस टू की परीक्षा भी बेहतर अंकोें से पास की। वह एबी कॉलेज पठानकोट में बीए (भाग-1) का छात्र है।
आज उनकी पढ़ाई का पूरा खर्च कालेज के प्रिंसिपल डा. दिनेश शर्मा उठा रहे हैं। रॉकी ने बताया कि उसके घर की आर्थिक हालत कमजोर होने के कारण वह रोजाना अपने घर भोआ से पठानकोट आने के लिए साइकिल की सवारी करते हैं।