ओमिक्रॉन: चंडीगढ़ पीजीआई ने जीनोम सिक्वेंसिंग जांच से खींचे हाथ, अब उठे पहले के दावे पर सवाल
चंडीगढ़ में दक्षिण अफ्रीका से आए तीन लोगों की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद जांच के नमूने दिल्ली स्थित नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल में भेजे गए हैं। जहां से रिपोर्ट आने में दो हफ्ते लगने की बात कही गई है।
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कोरोना के नए स्ट्रेन ओमिक्रॉन के खतरे के बीच चंडीगढ़ में दक्षिण अफ्रीका से लौटे यात्री समेत तीन लोगों के संक्रमित होने पर एक बार फिर से जीनोम सिक्वेंसिंग लैब की जरूरत महसूस होने लगी है। वहीं पीजीआई ने जांच से अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जांच के लिए रीजेंट उपलब्ध न होने के कारण यह सुविधा पीजीआई में संचालित नहीं की जा सकती। ऐसे में पीजीआई की ओर से बीते 17 अगस्त को वॉर रूम मीटिंग की बैठक में 40 नमूनों के जीनोम सिक्वेंसिंग करने के दावे पर सवाल उठने लगे हैं।
लोगों का कहना है कि जब जरूरत है तब जांच से इनकार कर पीजीआई ने अपनी ही बात का खंडन कर दिया है, क्योंकि सुविधा शुरू होने के बाद उसे जारी रखने की व्यवस्था की जानी चाहिए थी। संदिग्ध मरीज के मिलने पर तत्काल जांच कर स्थिति को साफ करना जरूरी है, लेकिन तमाम प्रयास के बाद भी जांच के स्तर पर मिली सफलता का परिणाम शून्य है। क्योंकि सेक्टर-36 के तीनों संदिग्ध मरीजों की जांच के नमूने दिल्ली स्थित नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल में भेजे गए हैं। जहां से रिपोर्ट आने में दो हफ्ते लगने की बात कही गई है।
दूसरी लहर में महसूस हुई जरूरत
कोरोना की दूसरी लहर के दौरान शहर में डेल्टा प्लस के मरीजों के मिलने पर प्रशासक ने पीजीआई को शीघ्र जीनोम सिक्वेंसिंग लैब स्थापित करने का निर्देश दिया था, क्योंकि तब जो मरीज संक्रमित मिले थे, उनकी रिपोर्ट दिल्ली से आने में डेढ़ महीने का समय लग गया था। ऐसे में रिपोर्ट में देरी से संक्रमण की चेन मजबूत होने का खतरा बढ़ जाता है।
अगस्त में हुई थी 40 जांच
प्रशासक के निर्देश पर दूसरी लहर के दौरान पीजीआई ने जीनोम सिक्वेंसिंग लैब को लेकर काम शुरू किया था। उस दौरान पीजीआई के तत्कालीन निदेशक प्रो. जगतराम ने वॉर रूम की 17 अगस्त को हुई बैठक में प्रशासक को बताया भी था कि लैब में 40 नमूनों की जांच की गई है, लेकिन उसके बाद प्रक्रिया फिर से ठंडे बस्ते में चली गई। नतीजतन अब तक उसे पूरी तरह संचालित करने की व्यवस्था नहीं की जा सकी है।
अलग से कोई लैब स्थापित नहीं की गई है। पीडियाट्रिक सेंटर में उपलब्ध मशीनों से ही ट्रायल किया गया था, लेकिन उस जांच के लिए 12 तरह की अलग-अलग रीजेंट की जरूरत पड़ती है, जिनमें से कुछ भारत में व अन्य विदेशों से मंगानी पड़ती हैं। इसलिए प्रक्रिया सामान्य होने में समय लग रहा है। -प्रो. मिनी पी सिंह, वॉयरोलॉजी विभाग, पीजीआई