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Chandigarh News: सीएम को अकाल तख्त पर तलब करने पर सवाल, जत्थेदार की दलील को चुनौती
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-सचिवालय श्री अकाल तख़्त का हिस्सा न मानने की दलील पंथक इतिहास और परंपराओं के विरुद्ध: ख्याला
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संवाद न्यूज एजेंसी
अमृतसर। सिख चिंतक और पंजाब भाजपा के प्रवक्ता प्रो. सरचांद सिंह ख्याला ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को तलब किए जाने के मामले में श्री अकाल तख़्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज की ओर से सचिवालय को अकाल तख्त का हिस्सा न मानने की दलील को चुनौती दी है। उन्होंने इसे पंथक परंपराओं और इतिहास के विपरीत बताया।
प्रो. सरचांद ने सवाल उठाया कि यदि सचिवालय अकाल तख्त का अभिन्न हिस्सा नहीं है, तो 2009-10 में प्रो. दर्शन सिंह रागी के विरुद्ध जारी हुक्मनामा किस अधिकार के तहत हुआ। उन्होंने याद दिलाया कि अलग-अलग समय पर जत्थेदार सचिवालय में बैठक कर आदेश जारी करते और लागू करवाते रहे हैं। यदि ज्ञानी गड़गज्ज अपनी दलील पर कायम हैं, तो क्या वे रागी के विरुद्ध जारी ऐतिहासिक हुक्मनामे को रद्द करने का साहस दिखाएंगे?
उन्होंने 328 पावन सरूपों की जांच और संबंधित न्याय-प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा कि कानून को बिना किसी दबाव के अपना काम करने देना चाहिए। सच्चाई सामने लाने के बजाय हाल में राजनीतिक दबाव और पार्टीगत एजेंडे ने श्री अकाल तख्त साहिब की मर्यादा को क्षति पहुंचाई। प्रो. सरचांद ने कहा कि शिरोमणि कमेटी ने 27 अगस्त 2020 को प्रस्ताव संख्या 466 पारित कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का निर्णय लिया था, लेकिन महज एक सप्ताह बाद प्रस्ताव संख्या 493 के जरिये आदेशों को ठुकरा दिया गया। यदि गुरु की गोलक से करोड़ों रुपये का भुगतान लेने वाले सतिंदर सिंह कोहली के कार्यों पर निगरानी रखी जाती और लापता सरूपों की गंभीरता से तलाश होती, तो आज झूठा प्रोपेगेंडा फैलाने की नौबत नहीं आती।
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उन्होंने ज्ञानी गड़गज्ज को सलाह दी कि वे राजनीतिक दबाव और पार्टीगत एजेंडे का साधन न बनें और संगत को दुविधा में न डालें। ख्याला ने चेतावनी दी कि हाल के राजनीतिक निर्णयों और खेल ने जथेदारी के उच्च पद को विवादों का केंद्र बना दिया है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
अमृतसर। सिख चिंतक और पंजाब भाजपा के प्रवक्ता प्रो. सरचांद सिंह ख्याला ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को तलब किए जाने के मामले में श्री अकाल तख़्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज की ओर से सचिवालय को अकाल तख्त का हिस्सा न मानने की दलील को चुनौती दी है। उन्होंने इसे पंथक परंपराओं और इतिहास के विपरीत बताया।
प्रो. सरचांद ने सवाल उठाया कि यदि सचिवालय अकाल तख्त का अभिन्न हिस्सा नहीं है, तो 2009-10 में प्रो. दर्शन सिंह रागी के विरुद्ध जारी हुक्मनामा किस अधिकार के तहत हुआ। उन्होंने याद दिलाया कि अलग-अलग समय पर जत्थेदार सचिवालय में बैठक कर आदेश जारी करते और लागू करवाते रहे हैं। यदि ज्ञानी गड़गज्ज अपनी दलील पर कायम हैं, तो क्या वे रागी के विरुद्ध जारी ऐतिहासिक हुक्मनामे को रद्द करने का साहस दिखाएंगे?
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उन्होंने 328 पावन सरूपों की जांच और संबंधित न्याय-प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा कि कानून को बिना किसी दबाव के अपना काम करने देना चाहिए। सच्चाई सामने लाने के बजाय हाल में राजनीतिक दबाव और पार्टीगत एजेंडे ने श्री अकाल तख्त साहिब की मर्यादा को क्षति पहुंचाई। प्रो. सरचांद ने कहा कि शिरोमणि कमेटी ने 27 अगस्त 2020 को प्रस्ताव संख्या 466 पारित कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का निर्णय लिया था, लेकिन महज एक सप्ताह बाद प्रस्ताव संख्या 493 के जरिये आदेशों को ठुकरा दिया गया। यदि गुरु की गोलक से करोड़ों रुपये का भुगतान लेने वाले सतिंदर सिंह कोहली के कार्यों पर निगरानी रखी जाती और लापता सरूपों की गंभीरता से तलाश होती, तो आज झूठा प्रोपेगेंडा फैलाने की नौबत नहीं आती।
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उन्होंने ज्ञानी गड़गज्ज को सलाह दी कि वे राजनीतिक दबाव और पार्टीगत एजेंडे का साधन न बनें और संगत को दुविधा में न डालें। ख्याला ने चेतावनी दी कि हाल के राजनीतिक निर्णयों और खेल ने जथेदारी के उच्च पद को विवादों का केंद्र बना दिया है।