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जाट आंदोलन के दौरान उपद्रव और हिंसा पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

Wed, 02 Mar 2016 11:13 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Wed, 02 Mar 2016 11:13 AM IST
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punjab haryana highcourt statement on jat protest and voilence

प्रदेश में जाट आरक्षण की मांग के नाम पर उपद्रव को समय रहते भांपने में चूक को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने इसे सूबे के अधिकारियों की नाकामी करार दिया है।

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जस्टिस राजेश बिंदल की एकल बेंच ने हाईकोर्ट की ओर से पूर्व में जारी आदेश का पालन न होने पर प्रदेश के अतिरिक्त गृह सचिव और डीजीपी को अवमानना नोटिस जारी कर पूछा है कि इस मामले में क्यों न उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए।
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वर्ष 2010 में जाट आंदोलन के बाद सरकार ने हाईकोर्ट को भरोसा दिलाया था कि भविष्य में ऐसे हालातों से निपटने के लिए व्यवस्था स्थापित कर ली गई है।

लुधियाना की आल इंडिया एंटी करप्शन फेडरेशन के वैभव जैन ने एडवोकेट सुमन जैन के माध्यम से दायर अवमानना याचिका में कहा है कि साल 2010 में भी जाट आरक्षण समिति की ओर से 13 सितंबर को बंद का आह्वान किया गया था। उस दौरान भी हिंसा की घटनाएं हुई थीं और भारी नुकसान हुआ था।
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उल्लेखनीय है कि इस दौरान मिर्चपुर में जींद के सेशन जज को गाड़ी से बाहर निकालकर गाड़ी फूंकने की घटना भी हुई। ऐसी स्थिति को लेकर नुकसान के मुआवजे और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई।

याची ने उस वक्त कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के नुकसान के एक मामले में राज्यों को केटी थॉमस और एफसी नारीमन कमेटियों की सिफारशें लागू करने को कहा था। थामस कमेटी के दिशा निर्देश के अनुसार उपद्रव नियंत्रण के मापदंड तय होने थे। वहीं नारीमन कमेटी की सिफारिश के दिशा निर्देश के मुताबिक मुआवजे के मापदंड तय किए जाने थे।

अतिरिक्त गृह सचिव व डीजीपी को हाईकोर्ट से अवमानना नोटिस

punjab haryana highcourt statement on jat protest and voilence

हाईकोर्ट ने इस दलील पर उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के इस दिशा निर्देश के बारे पूछा था और अतिरिक्त गृह सचिव ने उस वक्त हाईकोर्ट को बताया था कि केटी थामस कमेटी की सिफारिशें लागू करने के लिए डीजीपी को दिशा निर्देश दिए जा चुके हैं। जबकि नारीमन कमेटी की सिफारिश लागू करने के लिए हरियाणा में पहले से मौजूद क्लेम कमिश्नर आरसी बंसल (रिटायर्ड सेशन जज) का दायरा बढ़ाकर जाट आंदोलन के मुआवजे के लिए भी कर दिया गया है।

अब अवमानना याचिका में फेडरेशन ने आरोप लगाया है कि सरकार ने उस वक्त झूठ बोला। आरोप है कि न तो साल 2010 के आंदोलन के दौरान दोषियों को सजा मिली और न ही संपत्ति के नुकसान का मुआवजा मिला। दलील दी कि यदि सरकार ने दोनों कमेटियों की सिफारिश के मुताबिक रोड मैप बनाया होता तो, इस बार के आंदोलन में इतना बड़ा नुकसान न होता।

मांग की गई है कि हाईकोर्ट के आदेश की अवमानना पर दोनों अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने एक अप्रैल तक सुनवाई स्थगित करते हुए जवाब मांग लिया है।

थॉमस कमेटी ने रिपोर्ट में ये सिफारिशें की

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थामस कमेटी के अनुसार यदि कोई संघर्ष करता है, तो इसके लिए संस्था या व्यक्ति को अनुमति लेनी होगी। प्रदर्शन के दौरान कोई हथियार नहीं होना चाहिए। पुलिस प्रदर्शन पर लगातार नजर रखे और यदि स्थिति हाथ से निकलती दिखे तो पास के थाना या जिलों से पुलिस बुलाई जानी चाहिए।

सिफारिश के मुताबिक रोडमैप तैयार किया जाना है, जिसमें प्रदर्शन की स्थिति को भांपते हुए इंटेलिजेंस को रिपोर्ट लेते हुए सरकार को अवगत कराना है। इसी प्रकार, नारीमन क मेटी की सिफारिश के मुताबिक क्लेम कमीशन बनना चाहिए। नुकसान का आकलन करने के लिए मौजूदा सरकारी संसाधनों के अलावा क्लेम कमीशन निजी वैल्युएटर की मदद भी ले सकता है।

मुआवजा नुकसान की कीमत से दोगुने से अधिक नहीं होना चाहिए। इसकी भरपाई किससे की जानी है, इसके लिए भी उचित दिशा निर्देश का उल्लेख भी सिफारिश में है।

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