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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला: जाओ जाकर मर जाओ कहना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं, 22 साल पुराने मामले सजा रद
Sun, 08 Mar 2026 08:31 AM IST
Naveen
अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Naveen
Updated Sun, 08 Mar 2026 08:31 AM IST
सार
12 जुलाई 2003 को शिकायत दर्ज कराई गई और पुलिस ने मामला दर्ज किया। ट्रायल कोर्ट ने अक्टूबर 2004 में पिता और सौतेली मां दोनों को दोषी ठहराते हुए सात-सात साल की सजा सुनाई थी हालांकि अपील लंबित रहने के दौरान अगस्त 2022 में पिता की मृत्यु हो गई।
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 22 साल पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी विवाद के दौरान जाओ जाकर मर जाओ जैसे शब्द कह देना आत्महत्या के लिए उकसावे का अपराध नहीं बनता जब तक इसके पीछे स्पष्ट मंशा और आत्महत्या से सीधा संबंध साबित न हो। हाईकोर्ट ने किशोरी की मौत के मामले में दोषी ठहराई गई उसकी सौतेली मां को बरी करते हुए यह टिप्पणी की।
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जस्टिस रुपिंदरजीत चहल की एकल पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए वर्ष 2004 में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहा कि किशोरी की मौत वास्तव में आत्महत्या थी या उसमें सौतेली मां की कोई भूमिका थी। यह मामला हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के एक गांव से जुड़ा है। किशोरी अपनी मां की मृत्यु के बाद राजस्थान में अपने ननिहाल में रह रही थी।
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बाद में वह अपने पिता और सौतेली मां के साथ रहने लगी। अभियोजन के अनुसार, 6 जुलाई 2003 को किशोरी ने अपने मामा को फोन कर बताया था कि उसके पिता उसके साथ गलत व्यवहार कर रहे हैं और उसे अपनी जान का खतरा महसूस हो रहा है।अगले दिन जब उसका मामा गांव पहुंचा तो उसे पता चला कि किशोरी की मौत हो चुकी है और उसका अंतिम संस्कार भी कर दिया गया है।
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इसके बाद 12 जुलाई 2003 को शिकायत दर्ज कराई गई और पुलिस ने मामला दर्ज किया। ट्रायल कोर्ट ने अक्टूबर 2004 में पिता और सौतेली मां दोनों को दोषी ठहराते हुए सात-सात साल की सजा सुनाई थी हालांकि अपील लंबित रहने के दौरान अगस्त 2022 में पिता की मृत्यु हो गई और केवल सौतेली मां की अपील पर सुनवाई जारी रही। हाईकोर्ट ने कहा कि किशोरी का पोस्टमार्टम तक नहीं कराया गया।