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हाईकोर्ट का आदेश- प्रीमेच्योर सजा माफी की नीति में तीन महीने में सुधार करे हरियाणा सरकार
Wed, 13 May 2020 12:16 PM IST
खुशबू गोयल
अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Wed, 13 May 2020 12:16 PM IST
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
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हरियाणा सरकार की दोषियों की प्रीमेच्योर सजा माफी को लेकर बनाई नीतियों पर पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने सवाल उठाए हैं। हाईकोर्ट ने कहा है कि यह नीतियां अस्पष्ट हैं, राज्य सरकार तीन महीने में इन नीतियों में सुधार कर नए सिरे से तैयार करे। हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि यह सरकार का अधिकार है कि वह यह तय करे कि प्रीमेच्योर सजा माफी की क्या नीति हो, लेकिन नीतियां ऐसी हों कि उन पर सवाल न उठें और उनमें एकरूपता बनी रहे।
जस्टिस गुरविंदर सिंह गिल ने यह आदेश हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए गए गुरुग्राम निवासी राज कुमार उर्फ बिटटू द्वारा अपनी सजा माफी की मांग को लेकर दायर याचिका का निपटारा करते हुए दिया। याचिका में बताया गया था कि 19 सितंबर 2006 को उसके खिलाफ हत्या और आर्म्स एक्ट की कई धाराओं के तहत गुरुग्राम में एफआईआर दर्ज की गई थी। इस मामले में मार्च 2010 में गुरुग्राम की जिला अदालत ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। वह 13 वर्ष की सजा काट चुका है।
हरियाणा सरकार की 2002 की नीति के तहत उसे प्रीमेच्योर सजा माफी दी जाए। लेकिन हरियाणा सरकार ने उसकी मांग खारिज करते हए तर्क दिया कि 2008 में नई नीति आ चुकी है और वह 2010 में दोषी करार दिया गया है। लिहाजा उस पर 2008 की नीति के तहत ही गौर किया जा सकता है। याचिकाकर्ता के एडवोकेट विजय जिंदल ने कहा कि 2002 की नीति राज्यपाल द्वारा संविधान के अनुच्छेद 161 द्वारा प्रदत्त शक्तियों के तहत लाई गई थी और 2008 की नीति सीआरपीसी की धारा 432 और 433 के तहत बनाई गई है। ऐसे में बाद की नीति पूर्व की नीति पर हावी नहीं हो सकती है।
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जस्टिस गुरविंदर सिंह गिल ने यह आदेश हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए गए गुरुग्राम निवासी राज कुमार उर्फ बिटटू द्वारा अपनी सजा माफी की मांग को लेकर दायर याचिका का निपटारा करते हुए दिया। याचिका में बताया गया था कि 19 सितंबर 2006 को उसके खिलाफ हत्या और आर्म्स एक्ट की कई धाराओं के तहत गुरुग्राम में एफआईआर दर्ज की गई थी। इस मामले में मार्च 2010 में गुरुग्राम की जिला अदालत ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। वह 13 वर्ष की सजा काट चुका है।
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हरियाणा सरकार की 2002 की नीति के तहत उसे प्रीमेच्योर सजा माफी दी जाए। लेकिन हरियाणा सरकार ने उसकी मांग खारिज करते हए तर्क दिया कि 2008 में नई नीति आ चुकी है और वह 2010 में दोषी करार दिया गया है। लिहाजा उस पर 2008 की नीति के तहत ही गौर किया जा सकता है। याचिकाकर्ता के एडवोकेट विजय जिंदल ने कहा कि 2002 की नीति राज्यपाल द्वारा संविधान के अनुच्छेद 161 द्वारा प्रदत्त शक्तियों के तहत लाई गई थी और 2008 की नीति सीआरपीसी की धारा 432 और 433 के तहत बनाई गई है। ऐसे में बाद की नीति पूर्व की नीति पर हावी नहीं हो सकती है।
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वहीं, सरकार ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि यह राज्य सरकार मौजूदा परिस्थितियों के आधार पर नीति तय करती है। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि चाहे 2008 की नीति सीआरपीसी की धारा 432 और 433 के तहत लाई गई है, लेकिन यह नीति राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 161 के तहत लाई गई नीति को सुपरसीड कर सकती है। इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं किया गया है और कोई दिशा निर्देश भी तय नहीं किए गए हैं।
प्रीमेच्योर सजा माफी पर सरकार का आधार
हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों पर गौर करने के बाद कहा कि नीतियां ऐसी हों जो स्पष्ट हों नीतियों की अस्पष्टता के कारण सवाल खड़े होते हैं । ऐसे में बेहतर होगा की सरकार इन नीतियों पर दोबारा गौर कर 3 महीनों में इसमें सुधार कर नई नीति तैयार करे। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि प्रीमेच्योर सजा माफी किसी का अधिकार नहीं है।
यह सरकार का अधिकार है कि वह इसको लेकर नीति बनाए लेकिन नीति स्पष्ट हो उसमें एकरूपता होनी बेहद जरूरी है और जब तक नई नीति नहीं बनती है, तब तक सरकार चाहे तो अनुच्छेद 161 के तहत दोषियों की प्रीमेच्योर सजा माफी पर केस के आधार पर गौर कर सकती है।
प्रीमेच्योर सजा माफी पर सरकार का आधार
हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों पर गौर करने के बाद कहा कि नीतियां ऐसी हों जो स्पष्ट हों नीतियों की अस्पष्टता के कारण सवाल खड़े होते हैं । ऐसे में बेहतर होगा की सरकार इन नीतियों पर दोबारा गौर कर 3 महीनों में इसमें सुधार कर नई नीति तैयार करे। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि प्रीमेच्योर सजा माफी किसी का अधिकार नहीं है।
यह सरकार का अधिकार है कि वह इसको लेकर नीति बनाए लेकिन नीति स्पष्ट हो उसमें एकरूपता होनी बेहद जरूरी है और जब तक नई नीति नहीं बनती है, तब तक सरकार चाहे तो अनुच्छेद 161 के तहत दोषियों की प्रीमेच्योर सजा माफी पर केस के आधार पर गौर कर सकती है।