Punjab: पंजाब ने धान की पूसा-44 किस्म पर लगाई पाबंदी, अगले साल से खरीद भी नहीं होगी, जानें क्यों लिया ये फैसला
पंजाब में कम अवधि वाली किस्में पीआर-126, पूसा बासमती-1509 और पूसा बासमती-1692 को पंजाब में प्रोत्साहित किया जा रहा है। ये किस्म 120 दिनों में पक जाती हैं लेकिन प्रदेश के कुल 31 लाख हेक्टेयर धान क्षेत्र में से अल्पावधि वाले धान किस्म की बुवाई केवल 5-6 लाख हेक्टेयर में की गई है।
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पंजाब में गिरते भूजल स्तर और पराली जलाने से बढ़ते प्रदूषण के मद्देनजर सरकार ने धान की पूसा-44 किस्म पर पाबंदी लगा दी है। पानी की ज्यादा खपत और अपेक्षाकृत 20 फीसदी ज्यादा पराली पैदा करने वाली धान की इस किस्म की अगले सीजन से बिजार्इ नहीं होगी। हालांकि पूसा-44 धान ज्यादा उत्पादन देने वाली किस्म है लेकिन बेहतर आबोहवा के लिए सरकार अगले साल से इसकी खरीद नहीं करेगी। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने किसानों से पूसा- 44 की बिजाई बंद करने की अपील की और कहा कि पानी की अधिक खपत करने वाली यह किस्म तैयार होने में ज्यादा समय लेने के साथ पराली भी बहुत पैदा करती।
पंजाब में इस साल लगभग 20 मिलियन टन धान की पराली पैदा होने का अनुमान है। इसमें बासमती की पराली मात्र 3.3 टन ही होती है। पूसा-44 धान को पकने में 152 दिन लगते हैं। इस किस्म से पराली भी अन्य किस्मों के मुकाबले 20 प्रतिशत अधिक पैदा होती है। इसके विपरीत पीआर-126 किस्म के धान को पकने में सिर्फ 92 दिन लगते हैं। दोनों किस्मों में दो माह का अंतर है। आईएआरआई ने तीन साल पहले ही पूसा-44 के ब्रीडर बीज उत्पादन को बंद कर दिया था।
दो महीने खेत मिलेंगे खाली
पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (पीएयू) के खेतीबाड़ी विशेषज्ञ डॉ. हरी सिंह बराड़ का कहना है कि दो महीने का यह अंतर खेतों में पराली जलने से होने वाले प्रदूषण को कम करने में मदद कर सकता है, क्योंकि अक्तूबर के बाद चलने वाली हवाएं और ठंडा मौसम ही प्रदूषण को बढ़ाता है। उनका तर्क है कि किसानों को दो माह के लिए खेत भी खाली मिलेंगे, वहां पर सब्जी या कुछ अन्य बिजाई कर पैसा कमा सकते हैं। अल्पावधि धान किस्म उगाने से न केवल किसानों को पराली के प्रबंधन के लिए कम से कम 25 दिन का समय मिलता है, बल्कि सिंचाई के पानी और अन्य लागतों की बचत भी होगी। इसके अलावा गेहूं की फसल बोने से पहले खेत तैयार करने के लिए करीब एक महीने का अतिरिक्त समय भी मिलेगा।
गेहूं की बुआई के लिए किसानों को मिलेगा अधिक वक्त
कम अवधि वाली किस्में पीआर-126, पूसा बासमती-1509 और पूसा बासमती-1692 को पंजाब में प्रोत्साहित किया जा रहा है। ये किस्म 120 दिनों में पक जाती हैं लेकिन प्रदेश के कुल 31 लाख हेक्टेयर धान क्षेत्र में से अल्पावधि वाले धान किस्म की बुवाई केवल 5-6 लाख हेक्टेयर में की गई है।
किसान बोले- उत्पादन कम होगा
हालांकि किसान नेता सुखदेव सिंह कोकरीकलां का कहना है कि इससे वित्तीय नुकसान होगा। उन्होंने तर्क दिया कि पूसा-44 एक एकड़ में 40 क्विंटल तक उपज देता है, जबकि पीआर-126 25-30 क्विंटल उपज देता है, जिससे उन्हें वित्तीय नुकसान होता है। उनका कहना है कि पानी के लिए किसान से ज्यादा उद्योगपति जिम्मेदार हैं।
किसान नेता बलवंत सिंह का कहना है कि हम में से ज्यादातर लोग बीज बोने वाली मशीनों का उपयोग करने में सक्षम नहीं हैं, जो धान के डंठल को साफ किए बिना गेहूं बो सकती हैं। यही कारण है कि हमें पराली जलानी पड़ती है लेकिन पंजाब का किसान बदल रहा है। हम भी पूसा-44 को बंद करने के लिए तैयार हैं। हमें विकल्प चाहिए और सरकार की सुविधाएं भी।