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हाईकोर्ट का अहम फैसला, पुनर्विवाह के बाद भी विधवा पहले पति की कानूनी वारिस

Sun, 21 Jan 2018 09:33 AM IST
विवेक शर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
विवेक शर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sun, 21 Jan 2018 09:33 AM IST
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Punjab and Haryana High Court's important decision
court - फोटो : Demo Pics
विधवा यदि पुनर्विवाह कर ले तो भी वह मृतक पति की कानूनी वारिस की परिभाषा में आती है। वह पहले पति की मौत हो जाने पर क्लेम करने के लिए कानूनी तौर पर दावेदार है। यदि बीमा कंपनी की विधवा के पुनर्विवाह के बाद कानूनी दावेदार न होने की दलील मानी जाए तो यह विधवा के पुनर्विवाह के अधिकार में अड़चन साबित होगी जो न तो जनहित में होगा न समाज हित में। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस सुधीर मित्तल ने यह व्यवस्था बीमा कंपनी द्वारा दाखिल मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई करते हुए दी है।
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बीमा कंपनी ने याचिका दाखिल करते हुए मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती दी थी। इसमें मृतक  की पत्नी के दोबारा शादी होने से जुड़ी रिपोर्ट को सबूत के तौर पर पेश किया गया था। बीमा कंपनी ने कहा कि दोबारा शादी करने के चलते महिला आश्रित और कानूनी वारिस की परिभाषा से बाहर हो गई है। हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों पर विचार के बाद बीमा कंपनी की अपील को खारिज कर दिया। 
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 हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि समाज की भलाई के लिए बनाए गए कानून की व्याख्या इस प्रकार होनी चाहिए कि कानून को बनाने के उद्देश्य को पूरा किया जा सके। मोटर व्हीकल एक्ट के सेक्शन 166 में विधवा के पुनर्विवाह और कानूनी वारिस होने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। ऐसे में इसे निर्धारित करना जरूरी है। विधवा पति की मौत के बाद उसकी कानूनी वारिस होती है और उसका ऐसा हिस्सा होती है जो दोबारा शादी के बाद भी अलग नहीं हो सकती।
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यह था मामला

Punjab and Haryana High Court's important decision
कोर्ट - फोटो : amar ujala
जनहित और समाजहित में हो कानून की परिभाषा 
इसके साथ ही कानून को परिभाषित करते हुए यह देखना सबसे जरूरी होता है कि यह जनहित और समाज के हित में हो। यदि बीमा कंपनी की दलील मान विधवा के पुनर्विवाह करने के चलते उसके मृतक पति के कानूनी वारिस होने का दर्जा खत्म किया जाता है तो यह न तो समाज के हित में होगा न जन साधारण के। हाईकोर्ट ने ऐसे में विधवा को पुनर्विवाह के बाद भी मृतक पति का कानूनी वारिस माना।

यह था मामला
संजय गोयल 13 अक्तूबर 2000 को लाडवा से पिपली जा रहे थे। मथाना के पास एक ट्रैक्टर ने उनकी गाड़ी को टक्कर मार दी। हादसे में उनकी मौत हो गई। मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने 8 फरवरी 2002 को उनकी पत्नी को 12,89, 500 रुपये मुआवजा जारी कर दिया। बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए एक जांच रिपोर्ट पेश की जिसमें बताया गया कि मृतक की पत्नी ने मौत के 3 माह बाद पुनर्विवाह कर लिया था और अब वह देहरादून में रहती है। 
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