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Chandigarh News: पंजाब विश्वविद्यालय में आरक्षण नीति के उल्लंघन का किया विरोध
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चड़ीगढ़। पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ की आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को प्राप्त विश्वविद्यालय के जवाब को विस्तारपूर्वक पढ़ने और गहन विश्लेषण के बाद पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया है।
एसोसिएशन ने आयोग के चेयरमैन को भेजे अपने पत्र में कहा कि यह उत्तर न केवल भारत सरकार और संविधान की ओर से निर्धारित आरक्षण नीतियों का स्पष्ट उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक न्याय के मूल अधिकारों का भी हनन करता है।
विश्वविद्यालय ने अनुसूचित जनजाति को केवल 5 प्रतिशत आरक्षण दिया है। जबकि केंद्र सरकार और संबंधित नियमों के अनुसार न्यूनतम 7.5 प्रतिशत आरक्षण देना अनिवार्य है।
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पत्र के माध्यम से संंगठन ने मांग की कि प्रो. रेनू विग और प्रो. वाईपी वर्मा के विरुद्ध एससी एसटी अधिनियम 1989 के तहत तुरंत मुकदमा दर्ज किया जाए। केंद्र सरकार की आरक्षण नीति को सभी पदों, प्रवेश, शिक्षण, गैर-शिक्षण और प्रशासनिक व शासी निकायों में तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए। विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन कर शासी निकायों में संवैधानिक आरक्षण की वैधानिक गारंटी अनिवार्य की जाए। छात्र नेताओं पर हो रही प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की स्वतंत्र, निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
दमन को नहीं करेंगे बर्दाश्त
आयोग को भेजे गए जवाब में विश्वविद्यालय ने स्वीकार किया है कि एससी और ओबीसी आरक्षण की कटौती की गई है। यह एससी-एसटी एक्ट के तहत आर्थिक और शैक्षणिक अधिकारों से वंचित करने के गंभीर अपराध श्रेणी में आता है। एसोसिएशन ने कहा कि वह किसी भी प्रकार के अन्याय, संवैधानिक उल्लंघन और छात्र नेतृत्व पर हो रहे दमन को बर्दाश्त नहीं करेगी।
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एसोसिएशन ने आयोग के चेयरमैन को भेजे अपने पत्र में कहा कि यह उत्तर न केवल भारत सरकार और संविधान की ओर से निर्धारित आरक्षण नीतियों का स्पष्ट उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक न्याय के मूल अधिकारों का भी हनन करता है।
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विश्वविद्यालय ने अनुसूचित जनजाति को केवल 5 प्रतिशत आरक्षण दिया है। जबकि केंद्र सरकार और संबंधित नियमों के अनुसार न्यूनतम 7.5 प्रतिशत आरक्षण देना अनिवार्य है।
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पत्र के माध्यम से संंगठन ने मांग की कि प्रो. रेनू विग और प्रो. वाईपी वर्मा के विरुद्ध एससी एसटी अधिनियम 1989 के तहत तुरंत मुकदमा दर्ज किया जाए। केंद्र सरकार की आरक्षण नीति को सभी पदों, प्रवेश, शिक्षण, गैर-शिक्षण और प्रशासनिक व शासी निकायों में तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए। विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन कर शासी निकायों में संवैधानिक आरक्षण की वैधानिक गारंटी अनिवार्य की जाए। छात्र नेताओं पर हो रही प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की स्वतंत्र, निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
दमन को नहीं करेंगे बर्दाश्त
आयोग को भेजे गए जवाब में विश्वविद्यालय ने स्वीकार किया है कि एससी और ओबीसी आरक्षण की कटौती की गई है। यह एससी-एसटी एक्ट के तहत आर्थिक और शैक्षणिक अधिकारों से वंचित करने के गंभीर अपराध श्रेणी में आता है। एसोसिएशन ने कहा कि वह किसी भी प्रकार के अन्याय, संवैधानिक उल्लंघन और छात्र नेतृत्व पर हो रहे दमन को बर्दाश्त नहीं करेगी।