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Highcourt: मेजर की पेंशन पर टालमटोल पड़ी भारी, हाईकोर्ट ने रक्षा सचिव-थल सेना प्रमुख पर लगाया जुर्माना
Tue, 05 May 2026 08:27 AM IST
Nivedita
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Tue, 05 May 2026 08:27 AM IST
सार
पुणे निवासी रिटायर्ड मेजर राजदीप दिनकर पांडरे ने याचिका में बताया कि वर्ष 2012 में वह पूरी तरह स्वस्थ अवस्था में सेना में कमीशंड अधिकारी बने थे। उन्होंने लद्दाख स्काउट्स समेत कठिन और संवेदनशील क्षेत्रों में सेवाएं दीं।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने रिटायर्ड मेजर को दिव्यांगता पेंशन से वंचित रखने और न्यायिक आदेशों की अवहेलना पर केंद्र सरकार पर सख्त रुख अपनाया है।
अदालत ने रक्षा सचिव और थल सेना प्रमुख पर संयुक्त रूप से दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। साथ ही निर्देश दिया है कि यह राशि दोनों के वेतन से एक-एक लाख रुपये काटकर डिमांड ड्राफ्ट के माध्यम से याची को दी जाए।
पुणे निवासी रिटायर्ड मेजर राजदीप दिनकर पांडरे ने याचिका में बताया कि वर्ष 2012 में वह पूरी तरह स्वस्थ अवस्था में सेना में कमीशंड अधिकारी बने थे। उन्होंने लद्दाख स्काउट्स समेत कठिन और संवेदनशील क्षेत्रों में सेवाएं दीं। वर्ष 2017 में उन्हें गंभीर बीमारी हुई और समय के साथ 24 सर्जरी करानी पड़ी। बाद में किडनी संबंधी समस्या भी सामने आई।
रिलीज मेडिकल बोर्ड ने उनकी 15 प्रतिशत दिव्यांगता को सेवा से असंबद्ध मानते हुए पेंशन से वंचित कर दिया। इसके बाद उन्होंने सशस्त्र बल अधिकरण का रुख किया। अधिकरण ने अक्टूबर 2024 में दिव्यांगता को सेवा से संबंधित मानते हुए 40 प्रतिशत आंका और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार इसे 50 प्रतिशत तक राउंड ऑफ कर आजीवन पेंशन देने का आदेश दिया।
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केंद्र सरकार की चुनौती को हाईकोर्ट ने जुलाई 2025 में खारिज कर दिया। इसके बावजूद आदेश लागू न होने पर याची को अवमानना याचिका दाखिल करनी पड़ी। अदालत ने पहले भी अनुपालन का मौका दिया था लेकिन पालन नहीं हुआ।
अदालत ने कहा कि न्यायिक आदेश बाध्यकारी होते हैं और उनकी अनदेखी स्वीकार नहीं की जा सकती। साथ ही अंतिम अवसर देते हुए आदेशों के पालन के निर्देश भी जारी किए गए हैं।
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अदालत ने रक्षा सचिव और थल सेना प्रमुख पर संयुक्त रूप से दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। साथ ही निर्देश दिया है कि यह राशि दोनों के वेतन से एक-एक लाख रुपये काटकर डिमांड ड्राफ्ट के माध्यम से याची को दी जाए।
पुणे निवासी रिटायर्ड मेजर राजदीप दिनकर पांडरे ने याचिका में बताया कि वर्ष 2012 में वह पूरी तरह स्वस्थ अवस्था में सेना में कमीशंड अधिकारी बने थे। उन्होंने लद्दाख स्काउट्स समेत कठिन और संवेदनशील क्षेत्रों में सेवाएं दीं। वर्ष 2017 में उन्हें गंभीर बीमारी हुई और समय के साथ 24 सर्जरी करानी पड़ी। बाद में किडनी संबंधी समस्या भी सामने आई।
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रिलीज मेडिकल बोर्ड ने उनकी 15 प्रतिशत दिव्यांगता को सेवा से असंबद्ध मानते हुए पेंशन से वंचित कर दिया। इसके बाद उन्होंने सशस्त्र बल अधिकरण का रुख किया। अधिकरण ने अक्टूबर 2024 में दिव्यांगता को सेवा से संबंधित मानते हुए 40 प्रतिशत आंका और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार इसे 50 प्रतिशत तक राउंड ऑफ कर आजीवन पेंशन देने का आदेश दिया।
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केंद्र सरकार की चुनौती को हाईकोर्ट ने जुलाई 2025 में खारिज कर दिया। इसके बावजूद आदेश लागू न होने पर याची को अवमानना याचिका दाखिल करनी पड़ी। अदालत ने पहले भी अनुपालन का मौका दिया था लेकिन पालन नहीं हुआ।
अदालत ने कहा कि न्यायिक आदेश बाध्यकारी होते हैं और उनकी अनदेखी स्वीकार नहीं की जा सकती। साथ ही अंतिम अवसर देते हुए आदेशों के पालन के निर्देश भी जारी किए गए हैं।