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माह-ए-रमजान की तैयारियां शुरू, कल दिख सकता है चांद

Thu, 31 Mar 2022 09:00 PM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Thu, 31 Mar 2022 09:00 PM IST
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Preparations for the month-e-Ramadan begin, the moon can be seen tomorrow
चंडीगढ़/मनीमाजरा। कोरोना की सभी पाबंदियां हटने के बाद इस बार रमजान में रौनक दिखेगी। मस्जिदों में नमाज और इफ्तार के वक्त बड़ी संख्या में रोजेदार मौजूद रहेंगे। इबादत, रहमत और बरकत का यह मुकद्दस महीना इस्लामी कैलेंडर में नौवां महीना है। इस्लामिक कैलेंडर में चांद के अनुसार महीने के दिन गिने जाते हैं, जो 30 या 29 दिन के होते हैं। इस शनिवार अगर चांद दिख गया तो रमजान का पवित्र महीना रविवार (3 अप्रैल) से शुरू हो जाएगा। चांद नहीं दिखाई दिया तो सोमवार को पहला रोजा होगा। मुस्लिम समुदाय में रमजान की तैयारियां शुरू हो गईं हैं।
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सेक्टर-26 के नूरानी मस्जिद के इमाम मुफ्ती मोहम्मद अनस कासमी का कहना है कि रमजान का मुकद्दस महीना रोजा (उपवास) इबादत, दुआओं और हर तरह की बुराइयों से बचने के साथ आत्मनिरीक्षण का महीना है। इस महीने में इबादत का सवाब 70 गुना बढ़ जाता है। अल्लाह रोजेदारों के गुनाह माफ करते हैं और उनकी दुआएं कुबूल की जाती हैं।
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मनीमाजरा की शाही मस्जिद के मौलाना इमरान कहते हैं कि इस्लाम में रमजान का महीना सबसे पाक महीना है। इस्लाम के मूल पांच स्तंभों शहादा (विश्वास की गवाही), सलात (पांचों वक्त की नमाज), सवाम (रोजा), जकात (गरीबों को अनिवार्य दान) और हज में रमजान का रोजा भी है। रोजा हर बालिग मुस्लिम मर्द और औरत पर फर्ज (अनिवार्य) है। बीमार, यात्री, गर्भवती महिला, बच्चे को दूध पिलाने वाली मां और बहुत अधिक वृद्ध को ही इससे छूट है। पांच वक्त की नमाज के साथ रमजान में रोजेदार तरावीह की विशेष नमाज भी पढ़ते हैं। इसमें पूरे रमजान पवित्र ग्रंथ कुरान शरीफ पढ़कर मुकम्मल किया जाता है। हर व्यक्ति रमजान में अपनी कमाई में से ढाई प्रतिशत निकालकर गरीबों को दान करता है, जिसे जकात कहते हैं।
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रमजान के महीने को तीन अशरों में बांटा गया है
रमजान के महीने को तीन अशरों (दस-दस दिन) में बांटा गया है। पहला अशरा अल्लाह की रहमत यानी कृपा का होता है। दूसरा अशरा मगफिरत यानी माफी का और आखिरी अशरा जहन्नुम की आग से खुद को बचाने का होता है। आखिरी अशरे की पांच रातों (21, 23, 25 ,27 और 29) में से एक रात शब-ए-कद्र की होती है, जो हजार महीनों से भी अफजल होती है।

इमाम मुफ्ती मोहम्मद अनस कासमी ने बताया कि रमजान के मुकद्दस महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग सच्चाई और अच्छाई के मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं। रोजा हमें आत्मसंयम, बलिदान, आपस में प्रेम और भाईचारा, धर्म से ऊपर उठकर मानवता की सेवा, गरीबों या जरूरतमंदों के लिए दान, सहानुभूति ,सांसारिक चीजों से अलगाव और अल्लाह से निकटता आदि का पाठ पढ़ाता है।
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