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PGI अस्थाई ट्राइज रूम शुरू, इमरजेंसी में गंभीर रोगियों को पहले इलाज
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 27 Aug 2016 01:01 AM IST
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PGI Doctors Strike
- फोटो : Amar ujala
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आखिर रेजिडेंट डॉक्टरों की मांग पर पीजीआई प्रशासन ने इमरजेंसी में अस्थाई ट्राइज रूम (गंभीर रोगियों को पहले चिकित्सा देने की विधि) का निर्माण कर दिया है। इसमें दो रेजिडेंट डॉक्टर व स्टाफ की ड्यूटी भी लगा दी गई है। ट्राइज रूम रेजिडेंट डॉक्टरों की मुख्य मांगों में से एक था। उनका कहना था कि ट्राइज रूम न होने से मरीजों की लगातार भीड़ बढ़ती रहती है। इससे डॉक्टरों और मरीजों के बीच तनाव बढ़ता है और मारपीट की घटनाएं होती हैं। ट्राइज रूम का इस्तेमाल इमरजेंसी की भीड़ को नियंत्रित करने में किया जाता है।
इमरजेंसी में ऐसे काम करेगा ट्राइज सिस्टम
इसका सीधा मतलब है कि इमरजेंसी में आने वाले गंभीर रोगियों का पहले इलाज किया जाए। पहले हर मरीज को ट्राइज रूम में लाया जाएगा। इसमें रेजिडेंट डॉक्टर चेक करेंगे। अगर मरीज गंभीर है तो उसे रेड एरिया यानी हॉल ए में भेजा जाएगा। इसका मतलब यह है कि मरीज को देखाना जरूरी है और डॉक्टर उसके इलाज में जुटेंगे। अगर मरीज थोड़ा कम गंभीर है तो उसे कॉरिडोर में भेज दिया जाएगा और कुछ देर बाद डॉक्टर उसका इलाज करेंगे। अगर कोई ऐसा पेशेंट जाता है, जिसे तत्काल इलाज की जरूरत नहीं है तो उसे हॉल सी में भेज दिया जाएगा।
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इमरजेंसी में ऐसे काम करेगा ट्राइज सिस्टम
इसका सीधा मतलब है कि इमरजेंसी में आने वाले गंभीर रोगियों का पहले इलाज किया जाए। पहले हर मरीज को ट्राइज रूम में लाया जाएगा। इसमें रेजिडेंट डॉक्टर चेक करेंगे। अगर मरीज गंभीर है तो उसे रेड एरिया यानी हॉल ए में भेजा जाएगा। इसका मतलब यह है कि मरीज को देखाना जरूरी है और डॉक्टर उसके इलाज में जुटेंगे। अगर मरीज थोड़ा कम गंभीर है तो उसे कॉरिडोर में भेज दिया जाएगा और कुछ देर बाद डॉक्टर उसका इलाज करेंगे। अगर कोई ऐसा पेशेंट जाता है, जिसे तत्काल इलाज की जरूरत नहीं है तो उसे हॉल सी में भेज दिया जाएगा।
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stike in pgi
- फोटो : file photo
इमरजेंसी में ये दिखा फर्क
ट्राइज रूम बनने से इमरजेंसी में काफी फर्क देखने को मिला है। हॉल ए जो मरीजों से खचाखच भरा रहता था, शुक्रवार को खाली-खाली दिखा। आमतौर पर हाल ए में ट्राली की तीन लाइन होती थी। डॉक्टरों व तीमारदारों को पैर रखने की जगह तक नहीं मिलती थी, लेकिन शुक्रवार को सिर्फदो लाइनें लगीं। इससे डॉक्टरों को भी फायदा हुआ और मरीजों को भी।
डॉक्टरों ने क्यों बताई जरूरत
रेजिडेंट डॉक्टरों का कहना है कि इमरजेंसी में 24 घंटे में 250 से ज्यादा मरीज आते हैं, जबकि डॉक्टर 10 से 12 होते हैं। एक डॉक्टर 30 से 40 मरीजों को देखता है। एक मरीज का इलाज हो नहीं पाता दूसरा मरीज आ जाता। दोपहर बाद तो 10 से 12 मरीज एक साथ आ जाते हैं। डॉक्टरों की संख्या कम होती है। ऐसे में डॉक्टरों के सामने समस्या होती है कि किस मरीज को देखा जाए। इनमें कुछ गंभीर मरीज ऐसी स्थिति में होते हैं, जिनका बाद में इलाज किया जा सकता है। सभी चाहते हैं कि उनका पहला इलाज किया जाए। इस कारण डॉक्टरों की मरीज के साथ अक्सर बहस होती है। डॉक्टरों का मानना है कि इमरजेंसी में करीब 30 प्रतिशत ऐसे मरीज होते हैं, जिनका इलाज जीएमएसएच-16 व जीएमसीएच-32 में हो सकता है।
साल 2009 से थी डिमांड
रेजिडेंट डॉक्टरों ने बताया कि ट्राइज रूम की मांग साल 2009 से उठ रही थी, लेकिन पीजीआई प्रशासन मानने को तैयार नहीं था। 2013 में भी इस मांग को जोर-शोर से उठाया गया। प्रशासन ने आश्वासन भी दिया, लेकिन बात बनी नहीं।
ट्राइज रूम बनने से इमरजेंसी में काफी फर्क देखने को मिला है। हॉल ए जो मरीजों से खचाखच भरा रहता था, शुक्रवार को खाली-खाली दिखा। आमतौर पर हाल ए में ट्राली की तीन लाइन होती थी। डॉक्टरों व तीमारदारों को पैर रखने की जगह तक नहीं मिलती थी, लेकिन शुक्रवार को सिर्फदो लाइनें लगीं। इससे डॉक्टरों को भी फायदा हुआ और मरीजों को भी।
डॉक्टरों ने क्यों बताई जरूरत
रेजिडेंट डॉक्टरों का कहना है कि इमरजेंसी में 24 घंटे में 250 से ज्यादा मरीज आते हैं, जबकि डॉक्टर 10 से 12 होते हैं। एक डॉक्टर 30 से 40 मरीजों को देखता है। एक मरीज का इलाज हो नहीं पाता दूसरा मरीज आ जाता। दोपहर बाद तो 10 से 12 मरीज एक साथ आ जाते हैं। डॉक्टरों की संख्या कम होती है। ऐसे में डॉक्टरों के सामने समस्या होती है कि किस मरीज को देखा जाए। इनमें कुछ गंभीर मरीज ऐसी स्थिति में होते हैं, जिनका बाद में इलाज किया जा सकता है। सभी चाहते हैं कि उनका पहला इलाज किया जाए। इस कारण डॉक्टरों की मरीज के साथ अक्सर बहस होती है। डॉक्टरों का मानना है कि इमरजेंसी में करीब 30 प्रतिशत ऐसे मरीज होते हैं, जिनका इलाज जीएमएसएच-16 व जीएमसीएच-32 में हो सकता है।
साल 2009 से थी डिमांड
रेजिडेंट डॉक्टरों ने बताया कि ट्राइज रूम की मांग साल 2009 से उठ रही थी, लेकिन पीजीआई प्रशासन मानने को तैयार नहीं था। 2013 में भी इस मांग को जोर-शोर से उठाया गया। प्रशासन ने आश्वासन भी दिया, लेकिन बात बनी नहीं।