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पठानकोट आतंकी हमले के शहीदों को मिले ग्रांट, याचिका दायर
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Mon, 11 Jan 2016 08:04 PM IST
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पठानकोट आतंकवादी हमले में शहीद, घायल और शारीरिक तौर पर अयोग्य जवानों के लिए एक करोड़ की ग्रांट देने की मांग को लेकर सेवानिवृत्त कर्नल ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। कर्नल ने पिछले साल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्रालय को मांग पत्र देकर एक करोड़ रुपये की ग्रांट देने की मांग की थी। अब हाईकोर्ट ने कहा है कि इस मांग पत्र पर पैरवी केंद्र सरकार के समक्ष करें।
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हाईकोर्ट कीइस ऑब्जर्वेशन पर याचिका वापस ले ली गई। यह मुद्दा अब सरकार के समक्ष दोबारा उठाया जाएगा। मोहाली के गांव चहड़ माजरा निवासी सेवानिवृत्त कर्नल सीएस सिद्धू ने एडवोकेट जगमोहन सिंह भट्टी के माध्यम से दायर याचिका में कहा है कि दीनानगर आतंकी हमले के बाद पंजाब सरकार ने शहीद पुलिसकर्मियों, घायलों, होमगार्ड जवानों और अन्य को वित्तीय ग्रांट देने के अलावा आश्रितों को नौकरियां देने की बात कही थी।
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उधर, केंद्र सरकार ने अभी तक सेना के जवानों के लिए ऐसी सुविधाओं का कोई प्रावधान नहीं बनाया। इसे लेकर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्रालय को मांग पत्र देकर आतंकी हमले में शहीद होने वाले सेना के जवानों को एक करोड़ की ग्रांट व आश्रितों को सेना में नौकरी की मांग की गई थी, लेकिन अभी तक इस पर केंद्र सरकार ने कोई गौर नहीं किया।
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केंद्र को दिए मांग पत्र में यह भी कहा था कि विकट स्थिति व बहादुरी के लिए सैनिकों को वित्तीय सहायता यदि कोई दी भी जाती है तो इसके लिए उन्हें आखिर अदालत ही आना पड़ता है, क्योंकि यह मदद समय रहते नहीं मिलती। ऐसे मामलों में आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (एएफटी) की बजाय सेना के किसी बड़े अधिकारी की जिम्मेवारी लगाने की मांग भी केंद्र से की गई थी।
केंद्र को दिए मांग पत्र के हवाले से हाईकोर्ट से मांग की गई थी केंद्र सरकार को पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले में शहीद जवानों के आश्रितों, शारीरिक तौर पर अयोग्य हुए सैनिकों को एक-एक करोड़ रुपये व आश्रितों को सेना में नौकरियां देने का निर्देश दिया जाए। हाईकोर्ट के समक्ष सुप्रीम कोर्ट के एक केस में फैसले का हवाला भी पेश किया गया। इसमें स्वयं सीएस सिद्धू को डिसएब्लड पेंशन जारी करने के हाईकोर्ट के फैसले को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा था। मार्च 2010 में जस्टिस मारकंडेय काटजू व जस्टिस एके पटनायक की खंडपीठ ने सरकार की अपील खारिज करते हुए अपने फैसले में कहा था कि बेंच को खेद है कि आर्मी ऑफिसर्स और सैनिकों से हमारे देश में भद्दा व्यवहार किया जाता है।
सिद्धू के मामले में ही सामने आया कि उन्होंने विकट स्थिति में सेना में ड्यूटी निभाई और इस दौरान गंभीर हादसे का शिकार हो गए, लेकिन इसके बावजूद उन्हें डिसएब्लड पेंशन का लाभ कम सेवाकाल का दिया गया। खंडपीठ ने कहा था कि यदि सैनिकों से इस तरीके से पेश आया जाता है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण बात है। अपनी जान की परवाह न करते हुए देश को सुरक्षा प्रदान कराने वालों के प्रति सरकारों का रवैया अच्छा होना चाहिए।