पीजीआई में व्यवस्था बदहाल: जांच रिपोर्ट लेने के लिए महीनों का इंतजार, मरीज-परिजन परेशान
पीजीआई की ओपीडी में जुलाई महीने से मरीजों ने एमआरडी और एचबीवीडीएनए की जांच के लिए नमूना लिए जा रहे हैं। इतना ही नहीं मरीज यह जांच कराने के लिए हजारों रुपए फीस भी जमा कर चुके हैं। उसके बावजूद रिपोर्ट न मिलने से उनका इलाज बाधित हो रहा है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
चंडीगढ़ पीजीआई की ओपीडी में मरीजों से एमआरडी और एचबीवीडीएनए की जांच का नमूना तो लिया जा रहा है लेकिन महीनों गुजरने के बाद भी उन्हें इसकी रिपोर्ट नहीं दी जा रही है।
इससे मरीज तो परेशान है हीं, उनके परिजन भी जांच रिपोर्ट न आने के कारण इलाज में पड़ रही बाधा को लेकर तनाव में हैं। जबकि मानक के अनुसार इन दोनों की जांच की रिपोर्ट 10 से 15 दिनों के अंदर मिल जाती है। वहीं, इस मामले पर पीजीआई प्रशासन का कहना है कि किट की कमी के कारण कभी कभार रिपोर्ट में देरी हो जाती है।
पीजीआई की ओपीडी में जुलाई महीने से मरीजों ने एमआरडी और एचबीवीडीएनए की जांच के लिए नमूना लिए जा रहे हैं। इतना ही नहीं मरीज यह जांच कराने के लिए हजारों रुपए फीस भी जमा कर चुके हैं। उसके बावजूद रिपोर्ट न मिलने से उनका इलाज बाधित हो रहा है। मरीजों व उनके परिजनों का कहना है कि अगर जांच नहीं हो सकती थी तो नमूना लेते वक्त ही बता देते। कम से कम यहां पैसे और वक्त दोनों बर्बाद नहीं होता।
हजारों मरीजों की होती है जांच
पीजीआई की ओपीडी में प्रतिदिन करीब 10 हजार मरीज इलाज के लिए आते हैं। उनमें से लगभग एक से डेढ़ हजार मरीजों को जांच लिखी जाती है। मरीजों की लगभग 6 हजार से 7 हजार तरह की जांच के लिए नमूने लिए जाते हैं। ऐसे में मरीजों के बढ़ते दबाव के कारण भी व्यवस्था पर असर पड़ रहा है।
इसलिए ये टेस्ट हैं महत्वपूर्ण
- एचबीवी एक डीएनए वायरस है जो मुख्य रूप से रक्त के संपर्क और यौन संपर्क के माध्यम से माताओं से उनके बच्चों में फैलता है। टैकमैन आरटी पीसीआर (गुणात्मक) द्वारा एचबीवी डीएनए डिटेक्शन टेस्ट एक अत्यधिक संवेदनशील परीक्षण है जो रक्त में हेपेटाइटिस बी वायरल डीएनए की उपस्थिति की जांच करता है।
- मापनीय या न्यूनतम अवशिष्ट रोग (एमआरडी) परीक्षण का उपयोग यह देखने के लिए किया जाता है कि कैंसर का उपचार काम कर रहा है या नहीं। साथ ही आगे की उपचार योजनाओं का मार्गदर्शन करने के लिए यह किया जाता है। एमआरडी परीक्षण मुख्य रूप से रक्त कैंसर (ल्यूकेमिया, लिम्फोमा और मायलोमा) में उपयोग किया जाता है, लेकिन अन्य कैंसर में इसका अध्ययन किया जा रहा है।
पीजीआई में मरीजों की संख्या अलग-अलग विभागों की ओपीडी में घटती बढ़ती रहती है। ऐसी स्थिति में तय मानक के अनुसार जांच के लिए मंगाए गए कभी कभी कम पड़ जाते हैं। अगर मरीज को नमूना देने के बावजूद तय समय पर जांच रिपोर्ट नहीं मिल पा रहा है तो उसके कारणों की जांच कर तत्काल व्यवस्था ठीक करने का प्रयास किया जाएगा। -प्रो. विपिन कौशल, चिकित्सा अधीक्षक व प्रवक्ता पीजीआई