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Chandigarh News: तनाव में दोबारा जल सकते हैं मरीज

Tue, 16 Sep 2025 02:49 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Tue, 16 Sep 2025 02:49 AM IST
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Patients may burn again due to stress
मानसिक बीमारी बनी दूसरी बार जलने की वजह, डॉक्टरों ने की मेंटल स्क्रीनिंग की सिफारिश
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पीजीआई के शोध में खुलासा, बर्न पीड़ितों की मानसिक जांच जरूरी, तभी थमेगा हादसों का सिलसिला
माई सिटी रिपोर्टर
चंडीगढ़। पीजीआई चंडीगढ़ के डॉक्टरों ने बर्न (जलने) के मरीजों पर एक चौंकाने वाला शोध किया है। रिपोर्ट में सामने आया है कि ऐसे कई मरीज जो आग की चपेट में आए वे पहले से मानसिक तनाव या मनोरोग से जूझ रहे थे। और हैरानी की बात ये कि कई लोग पहले भी एक बार जल चुके थे। शोध में साफ कहा गया है कि यदि समय रहते इनकी मानसिक स्क्रीनिंग की जाती तो दोबारा हादसे टाले जा सकते थे। डॉक्टरों ने देशभर के अस्पतालों में बर्न पीड़ितों की साइकेट्रिक जांच को अनिवार्य करने की सिफारिश की है।

डॉक्टरों की टीम ने खोले हालात के परदे
यह महत्वपूर्ण शोध पीजीआई के मनोचिकित्सा और प्लास्टिक सर्जरी विभाग ने मिलकर किया। इस टीम में डॉ. स्वप्नजीत साहू, डॉ. गरिमा पटेल,
डॉ. संदीप ग्रोवर, डॉ. सत्यस्वरूप त्रिपाठी शामिल थे। इन्होंने चंडीगढ़ और आसपास के क्षेत्रों से 104 बर्न पीड़ितों की मानसिक स्थिति का मूल्यांकन किया। पता चला कि अधिकतर मरीज तनाव, अवसाद या साइकोसिस जैसी मानसिक समस्याओं से जूझ रहे थे। कई ने स्वीकार किया कि एकाग्रता की कमी से हादसे हुए। इन मरीजों को इलाज के दौरान केवल ड्रेसिंग और दवाएं नहीं बल्कि काउंसलिंग और मनोरोग चिकित्सा भी दी गई जिससे उनकी रिकवरी तेज हुई।
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शोध के चौंकाने वाले आंकड़े
आंकड़ा
विवरण
कुल मरीज
104
महिलाएं
74%
स्लम से
85%
एक्सीडेंटल बर्न
60%
मानसिक तनाव से बर्न
40%
इनमें मनोरोगी 20%

शोध को मिला राष्ट्रीय सम्मान
इस बेहद जरूरी रिसर्च को इंडियन एसोसिएशन फॉर सोशल साइकेट्री ने बीबी सेठी अवाॅर्ड से नवाजा है। डॉक्टरों का कहना है कि देशभर के अस्पतालों में अब यह मॉडल अपनाया जाना चाहिए।
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हर बर्न यूनिट में हो मनोरोग विशेषज्ञ
शोधकर्ताओं की टीम की स्पष्ट सिफारिश है कि हर बर्न यूनिट में साइकेट्रिक स्क्रीनिंग अनिवार्य की जाए। मेंटल हेल्थ और तनाव को इलाज का हिस्सा बनाया जाए। मरीजों की काउंसलिंग को नियमित प्रक्रिया बनाया जाए।


नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी
शोध बताता है कि जलने के पीछे कई बार सिर्फ हादसा नहीं बल्कि दबी हुई मानसिक समस्या भी होती है। ऐसे में इलाज केवल पट्टी और मरहम से नहीं मन से शुरू होना चाहिए।

कोट
अब तक बर्न केस में सिर्फ शारीरिक इलाज पर फोकस किया जाता था लेकिन अगर हम मानसिक पक्ष को अनदेखा करेंगे तो मरीज दोबारा हादसे का शिकार हो सकते हैं।
-डॉ. स्वप्नजीत साहू
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