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बाबा नानक महल का गुरु नानक से कोई कनेक्शन नहीं, पाकिस्तानी इतिहासकार ने किए खुलासे, पढ़िए
Thu, 30 May 2019 03:50 PM IST
खुशबू गोयल
अशोक नीर, अमर उजाला, अमृतसर(पंजाब)
अशोक नीर, अमर उजाला, अमृतसर(पंजाब)
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 30 May 2019 03:50 PM IST
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बाबा नानक महल
- फोटो : फाइल फोटो
ऐतिहासिक बाबा नानक महल का श्री गुरु नानक देव जी से कोई कनेक्शन नहीं है। पाकिस्तानी इतिहासकार ने हवेली को लेकर कई चौंकाने वाले और बड़े खुलासे किए हैं। इतिहासकार शाहिद शब्बीर बीते एक दशक से पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा साहिब व अन्य ऐतिहासिक धरोहरों पर निरंतर डोक्यूमेंट्री फिल्म बनाकर उसके धार्मिक व एतिहासिक महत्व की जानकारी दे रहे हैं।
उनके अनुसार ‘बाबा नानक महल’ का इतिहास इतना ही है कि इसके चर्चे सुन शेरे-ए-पंजाब महाराजा रंजीत सिंह इस हवेली को देखने के लिए दो बार आए तो दोनों बार रात्रि विश्राम किया था। नारोवाल डिप्टी कमिश्नर ने इस हवेली की तरफ जाने वाले रास्ते को सील कर दिया है। इमारत की लकड़ी व अन्य समान को बेचा नहीं गया है।
डीसी नारोवाल ने हवेली को सील कर वहां 20 मई 2019 की तारीख लिख दी है, चूंकि हवेली दो सौ वर्ष पुरानी थी, उसका रख रखाव नहीं हो रहा था। कोई जानी नुकसान न हो, इसलिए गिरा दी गई। शब्बीर ने ‘सियालकोट के गजट’ व पाकिस्तान के ऐतिहासिक स्रोत ‘नगर-नगर’ की किताबों का फेसबुक पर हवाला देते हुए कहा कि दोनों किताबों में इस हवेली का कहीं कोई उल्लेख नहीं है।
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अगर यह बाबा नानक का महल होता तो इन किताबों में इसका जिक्र होता। बाबा नानक की किसी भी सिखी में इस महल का कोई भी उल्लेख नहीं है।
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उनके अनुसार ‘बाबा नानक महल’ का इतिहास इतना ही है कि इसके चर्चे सुन शेरे-ए-पंजाब महाराजा रंजीत सिंह इस हवेली को देखने के लिए दो बार आए तो दोनों बार रात्रि विश्राम किया था। नारोवाल डिप्टी कमिश्नर ने इस हवेली की तरफ जाने वाले रास्ते को सील कर दिया है। इमारत की लकड़ी व अन्य समान को बेचा नहीं गया है।
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डीसी नारोवाल ने हवेली को सील कर वहां 20 मई 2019 की तारीख लिख दी है, चूंकि हवेली दो सौ वर्ष पुरानी थी, उसका रख रखाव नहीं हो रहा था। कोई जानी नुकसान न हो, इसलिए गिरा दी गई। शब्बीर ने ‘सियालकोट के गजट’ व पाकिस्तान के ऐतिहासिक स्रोत ‘नगर-नगर’ की किताबों का फेसबुक पर हवाला देते हुए कहा कि दोनों किताबों में इस हवेली का कहीं कोई उल्लेख नहीं है।
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अगर यह बाबा नानक का महल होता तो इन किताबों में इसका जिक्र होता। बाबा नानक की किसी भी सिखी में इस महल का कोई भी उल्लेख नहीं है।
सरकार के पास इसका कोई रिकॉर्ड नहीं
शब्बीर का मानना है कि गिराई गई हवेली 180 से दो सौ वर्ष पुरानी है। यह इमारत खालसा राज के समय की है, इसमें कोई संदेह नहीं है। हवेली प्राइवेट मालिकाना हक की थी, इसलिए सरकार के पास इसका कोई भी रिकॉर्ड नहीं था। पाकिस्तान के गांवों में अब भी कई हवेलियां हैं, जहां विभाजन से पहले बड़े-बड़े परिवार रहते थे।
उन्होंने पाकिस्तान के एक इतिहासकार इरफान मसूद का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने इस हवेली के बारे में एक छोटा सा लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने जिक्र किया था कि हवेली में महाराजा रंजीत सिंह दो बार रात्रि विश्राम के लिए ठहरे थे, इस हवेली की यही महत्ता है। इसके अलावा इसका कोई धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व नहीं है।
देश विभाजन से पहले यह गांव बाठा जिला गुरदासपुर का हिस्सा था। विभाजन के बाद यह गांव सियालकोट व बाद में नारोवाल जिले का हिस्सा बना। यह संपत्ति रांझा गुज्जर नामक व्यक्ति की है। शब्बीर ने दावा किया कि जब भी डीसी नारोवाल इस हवेली की सील को खोलेंगे, वह हवेली के बारे में एक डोक्यूमेंट्री फिल्म बनाकर सारी स्थिति स्पष्ट कर देंगे। यह इमारत मिट्टी व चूने की बनी थी।
उन्होंने पाकिस्तान के एक इतिहासकार इरफान मसूद का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने इस हवेली के बारे में एक छोटा सा लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने जिक्र किया था कि हवेली में महाराजा रंजीत सिंह दो बार रात्रि विश्राम के लिए ठहरे थे, इस हवेली की यही महत्ता है। इसके अलावा इसका कोई धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व नहीं है।
देश विभाजन से पहले यह गांव बाठा जिला गुरदासपुर का हिस्सा था। विभाजन के बाद यह गांव सियालकोट व बाद में नारोवाल जिले का हिस्सा बना। यह संपत्ति रांझा गुज्जर नामक व्यक्ति की है। शब्बीर ने दावा किया कि जब भी डीसी नारोवाल इस हवेली की सील को खोलेंगे, वह हवेली के बारे में एक डोक्यूमेंट्री फिल्म बनाकर सारी स्थिति स्पष्ट कर देंगे। यह इमारत मिट्टी व चूने की बनी थी।