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Chandigarh News: इंडियन ऑयल-अडानी गैस पर एक लाख रुपये जुर्माना
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चंडीगढ़। राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने इंडियन ऑयल अडानी गैस पर एक लाख रुपये जुर्माना लगाया है। इसके साथ आयोग ने 20 हजार रुपये बतौर हर्जाना भी देने के आदेश दिए है। उपभोक्ता की ओर से गैस इस्तेमाल न करने पर भी उसके बिल में मिनिमम चार्जेज जोड़ने के मामले में कंपनी के खिलाफ जिला उपभोक्ता आयोग में याचिका दायर की गई थी। इस पर सुनवाई करते हुए आयोग ने उपभोक्ता के पक्ष में फैसला सुनाया था। जिला उपभोक्ता आयोग की ओर से 6 माह पहले उपभोक्ता के पक्ष में सनुाए गए फैसले के खिलाफ कंपनी ने राज्य उपभोक्ता आयोग में याचिका दायर की लेकिन राज्य उपभोक्ता आयोग ने कंपनी की अपील को खारिज कर दिया।
क्या था मामला..
सेक्टर-42 की रहने वाली मंजूशा रानी ने शिकायत दी थी कि उनके पास गैस के दो कनेक्शन हैं। इसमें से एक कनेक्शन ग्राउंड फ्लोर पर जहां वे खुद रहती हैं और दूसरा कनेक्शन पहली मंजिल के लिए लिया गया था, जहां उनका दफ्तर बना हुआ था। कोरोना के चलते काम ने होने से उनका दफ्तर 31 सितंबर से 31 अक्तूबर तक बंद था। दफ्तर बंद रहा तो गैस का भी इस्तेमाल नहीं हुआ। इसके बावजूद कंपनी की ओर से उन्हें 236 रुपये का बिल भेज दिया गया। उन्हें मिले बिल में 75 रुपये महीने के हिसाब से मिनिमम चार्जेज शामिल थे और बाकी टैक्स जोड़ दिया। याचिकाकर्ता के मुताबिक गैस कनेक्शन लेते वक्त कंपनी की ओर से एग्रीमेंट में कहीं भी मिनिमम चार्जेज का जिक्र नहीं था। उन्होंने पहले तो कंपनी को मिनिमम चार्जेस के बारे में अवगत कराया, लेकिन कंपनी की ओर से समस्या का हल न किए जाने पर उन्होंने कनेक्शन ही कटवा दिया। उपभोक्ता का आरोप था कि कंपनी ने कनेक्शन काटने पर भी 1180 रुपये चार्ज कर दिए। इसके बाद उन्होंने कंपनी के खिलाफ जिला उपभोक्ता आयोग में याचिका दायर कर दी। मामले में कंपनी की ओर से दलील देते हुए कहा गया कि अगर कस्टमर तय सीमा से कम खपत करता है तो उससे मिनिमम चार्जेस लिए जा सकते हैं। इसके अलावा मीटर को परमानेंट डिस्कनेक्ट करवाने का भी शुल्क तय है। इसका जिक्र पब्लिक डोमेन पर कंपनी के टैरिफ कार्ड में भी कर रखा गया है इसलिए उन्होंने बिल में जो चार्ज लगाए थे वे गलत नहीं थे। उनके खिलाफ जिला उपभोक्ता आयोग ने गलत फैसला सुनाया था, जिसे कंपनी ने खारिज किए जाने की मांग की, लेकिन कंपनी की इन दलीलों को राज्य उपभोक्ता आयोग ने नहीं माना और कहा कि कंपनी के एग्रीमेंट में कहीं भी मिनिमम चार्जेस का जिक्र नहीं है इस लिए जिला उपभोक्ता आयोग का फैसना पूरी तरह सही है। इस फैसने को बदला नहीं जा सकता इसलिए कंपनी की ओर से दायर की अपील को खारिज किया जाता है।
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क्या था मामला..
सेक्टर-42 की रहने वाली मंजूशा रानी ने शिकायत दी थी कि उनके पास गैस के दो कनेक्शन हैं। इसमें से एक कनेक्शन ग्राउंड फ्लोर पर जहां वे खुद रहती हैं और दूसरा कनेक्शन पहली मंजिल के लिए लिया गया था, जहां उनका दफ्तर बना हुआ था। कोरोना के चलते काम ने होने से उनका दफ्तर 31 सितंबर से 31 अक्तूबर तक बंद था। दफ्तर बंद रहा तो गैस का भी इस्तेमाल नहीं हुआ। इसके बावजूद कंपनी की ओर से उन्हें 236 रुपये का बिल भेज दिया गया। उन्हें मिले बिल में 75 रुपये महीने के हिसाब से मिनिमम चार्जेज शामिल थे और बाकी टैक्स जोड़ दिया। याचिकाकर्ता के मुताबिक गैस कनेक्शन लेते वक्त कंपनी की ओर से एग्रीमेंट में कहीं भी मिनिमम चार्जेज का जिक्र नहीं था। उन्होंने पहले तो कंपनी को मिनिमम चार्जेस के बारे में अवगत कराया, लेकिन कंपनी की ओर से समस्या का हल न किए जाने पर उन्होंने कनेक्शन ही कटवा दिया। उपभोक्ता का आरोप था कि कंपनी ने कनेक्शन काटने पर भी 1180 रुपये चार्ज कर दिए। इसके बाद उन्होंने कंपनी के खिलाफ जिला उपभोक्ता आयोग में याचिका दायर कर दी। मामले में कंपनी की ओर से दलील देते हुए कहा गया कि अगर कस्टमर तय सीमा से कम खपत करता है तो उससे मिनिमम चार्जेस लिए जा सकते हैं। इसके अलावा मीटर को परमानेंट डिस्कनेक्ट करवाने का भी शुल्क तय है। इसका जिक्र पब्लिक डोमेन पर कंपनी के टैरिफ कार्ड में भी कर रखा गया है इसलिए उन्होंने बिल में जो चार्ज लगाए थे वे गलत नहीं थे। उनके खिलाफ जिला उपभोक्ता आयोग ने गलत फैसला सुनाया था, जिसे कंपनी ने खारिज किए जाने की मांग की, लेकिन कंपनी की इन दलीलों को राज्य उपभोक्ता आयोग ने नहीं माना और कहा कि कंपनी के एग्रीमेंट में कहीं भी मिनिमम चार्जेस का जिक्र नहीं है इस लिए जिला उपभोक्ता आयोग का फैसना पूरी तरह सही है। इस फैसने को बदला नहीं जा सकता इसलिए कंपनी की ओर से दायर की अपील को खारिज किया जाता है।
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