पंजाब में एनपीआर के साथ नहीं होगी जनगणना, फील्ड स्टाफ को इससे जुड़ी नहीं दी जाएगी ट्रेनिंग
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पंजाब सरकार ने राज्य में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को अपडेट करने के उद्देश्य के लिए फील्ड स्टाफ को प्रशिक्षण देने की खबरों को स्पष्ट तौर पर खारिज करते हुए कहा है कि इस मुद्दे पर विधानसभा में पास किए प्रस्ताव के विरुद्ध जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
सरकारी प्रवक्ता ने बताया कि फील्ड स्टाफ को उपरोक्त प्रशिक्षण जनगणना करवाने संबंधी आम प्रक्रिया का हिस्सा है, जो मई-जून में पंजाब में की जानी निर्धारित है। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण का एनपीआर के साथ कोई लेना-देना नहीं है।
प्रवक्ता ने कहा कि स्थानीय निकाय विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव संजय कुमार ने तो इस संबंध में हाल ही में हुई वर्कशॉप के मौके पर डिप्टी कमिश्नरों को बाकयदा हिदायतें जारी की हुई हैं और डिप्टी कमिश्नरों की मुख्यमंत्री के साथ हुई मीटिंग के मौके पर भी यही आदेश दिए गए थे।
उन्होंने कहा कि यहां तक कि डिप्टी कमिश्नरों को इस प्रक्रिया में से एनपीआर के प्रशिक्षण के चैप्टर को निकालने की हिदायतें दी हुई हैं। प्रवक्ता ने बताया कि मुख्यमंत्री अनेक मौकों पर स्पष्ट कर चुके हैं कि पंजाब सरकार प्रत्येक मंच पर पक्षपात वाले नागरिकता संशोधन एक्ट (सीएए) के साथ-साथ राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और एनपीआर के विरुद्ध डटकर लड़ाई लड़ेगी। इस स्टैंड के संदर्भ में ही जनवरी महीने में विधानसभा द्वारा प्रस्ताव पास करके एनपीआर को सिरे से खारिज कर दिया गया था।
विधानसभा में पारित प्रस्ताव
उल्लेखनीय है कि प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया था कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर संबंधी आशंका और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर एनआरसी की एक पेशकश है जो लोगों के एक वर्ग को भारतीय नागरिकता से वंचित रखने और सीएए लागू करने के लिए बनाया गया है। यह सदन संकल्प करता है कि केंद्र सरकार को एनपीआर से संबंधित फार्मों /दस्तावेजों में संशोधन करना चाहिए ताकि लोगों के मन की ऐसी आशंकाओं को दूर किया जा सके और इसके बाद ही एनपीआर के अंतर्गत काम शुरू करे।
सीएए को बताया था पक्षपाती
कैप्टन ने सीएए पर हिटलर की नीति का दिया था हवाला
विधानसभा में सीएए के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव पर अपने विचार रखते हुए मुख्यमंत्री ने इसे एक दुखांत करार देते हुए और कहा था कि यह उनकी बदकिस्मती है कि अपने जीवन में ऐसा दिन देखना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री ने दुख जाहिर करते हुए कहा था कि साल 1930 में जो कुछ हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी में घटा था, वही कुछ अब भारत में घट रहा है। उस समय भी जर्मनी के लोगों ने आवाज नहीं उठाई थी और बाद में उन्हें पछतावा हुआ था। लेकिन हमें अब आवाज़ बुलंद करनी चाहिए, ताकि बाद में पछताना न पड़े। उन्होंने विपक्ष ख़ासकर अकालियों को अडोल्फ हिटलर की ‘मीन कॉफ’ को पढ़ने की अपील की ताकि सीएए के खतरों को समझा जा सके।