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स्मार्ट घड़ियां उतार दी जाएं, इसके किराए में अतिरिक्त कर्मचारी आ सकते हैं
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चंडीगढ़। स्मार्ट घड़ियों के लिए बनाई कमेटी ने अपनी रिपोर्ट दे दी है। कमेटी ने रिपोर्ट में कहा है कि सफाई कर्मचारियों को घड़ियां पहनने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। घड़ियों के किराए में खर्च होने वाली राशि से 150 अतिरिक्त कर्मचारियों को रखा जा सकता है। यह रिपोर्ट 28 अप्रैल को सदन की बैठक में आएगी। वहीं, इसका अंतिम निर्णय होगा।
पिछले साल स्मार्ट घड़ियों पर सवाल उठने के बाद सफाई कर्मचारी हड़ताल पर चले गए थे। उनके बाद तत्कालीन मेयर राजबाला मलिक ने एक कमेटी का गठन किया था। लगभग सात माह बाद कमेटी ने अपनी रिपोर्ट निगम को दे दी है। कमेटी के सदस्य पार्षद आशा जसवाल, राजेश कालिया, मनोनीत पार्षद सचिन लोहटिया, अतिरिक्त आयुक्त अनिल गर्ग, संयुक्त आयुक्त सौरभ अरोड़ा, एमओएच डॉ. अमृत पाल वडिंग ने तय किया कि स्मार्ट घड़ियां निगम कर्मचारियों को नहीं बांधनी चाहिए। निगम जो हर माह 17 लाख रुपये घड़ियों पर खर्च कर रहा है, उसमें लगभग 150 नए कर्मचारी काम पर रखे जा सकते हैं। राजेश कालिया ने कहा कि निगम अपने-अपने कार्यस्थल पर काम न करने वाले कर्मचारियों की पहचान के लिए यह घड़ियां लेकर आया था, अब इन कर्मचारियों की पहचान हो गई है। फिर इन घड़ियों के पहनने का क्या मतलब है। कमेटी के निर्णय पर सदन फैसला लेगा।
घड़ियां पहनने के बाद बढ़ गई थी कार्य क्षमता
स्मार्ट घड़ी पहनने के बाद चंडीगढ़ नगर निगम के कर्मचारियों की कार्यक्षमता में 67 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई थी। निगम और सूक्ष्मजीव प्रौद्योगिकी संस्थान (इमटेक) के सामूहिक सर्वे में सामने आया था कि हर छह घंटे बाद कर्मचारियों की कार्यक्षमता क्षेत्रवार पहले की तुलना में बढ़ गई है। घड़ियों को लेकर सफाई कर्मचारियों के विरोध के बाद निगम ने बीते साल अगस्त, सितंबर और अक्तूबर में सर्वे किया था। सर्वे टीम में निगम के एमओएच डॉ. अमृतपाल वडिंग और रवि सहोता शामिल थे, जबकि इमटेक की तरफ से अमित कुमार धीमान, अजय चंदेल, मोहित कुमार व प्रोजेक्ट मैनेजर पूजा ग्रोवर शामिल थीं।
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अनुबंध खत्म हुआ तो कौन लौटाएगा कंपनी को राशि
इस समय नगर निगम ने अपने चार हजार कर्मचारियों को यह घड़ियां दी हैं। सफाई कर्मचारी यूनियन का मानना है कि घड़ियां पहनने से बंधुआ मजदूर की भावना आती है। साथ ही, स्वास्थ्य भी खराब हो रहा है। अधिकारियों का मानना है कि अगर यह प्रोजेक्ट खारिज किया जाता है तो कंपनियों को तीन करोड़ से ज्यादा की राशि लौटानी पड़ेगी। एक घड़ी की कीमत आठ हजार रुपये है। इस समय नगर निगम इन घड़ियों का हर माह 17 लाख रुपये किराया दे रहा है। यह राशि कौन लौटाएगा, सदन में यह बड़ा मुद्दा होगा।
क्या कहते हैं अधिकारी
हमने निगम को रिपोर्ट दे दी है। रिपोर्ट में कर्मचारियों को घड़ियां न देने की बात कही गई है। घड़ी के किराए के रूप में निजी कंपनी को इतनी बड़ी राशि देने से अच्छा है, नए कर्मचारी रखकर शहर की सफाई व्यवस्था मजबूत की जाए। -राजेश कालिया, पार्षद व कमेटी सदस्य
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पिछले साल स्मार्ट घड़ियों पर सवाल उठने के बाद सफाई कर्मचारी हड़ताल पर चले गए थे। उनके बाद तत्कालीन मेयर राजबाला मलिक ने एक कमेटी का गठन किया था। लगभग सात माह बाद कमेटी ने अपनी रिपोर्ट निगम को दे दी है। कमेटी के सदस्य पार्षद आशा जसवाल, राजेश कालिया, मनोनीत पार्षद सचिन लोहटिया, अतिरिक्त आयुक्त अनिल गर्ग, संयुक्त आयुक्त सौरभ अरोड़ा, एमओएच डॉ. अमृत पाल वडिंग ने तय किया कि स्मार्ट घड़ियां निगम कर्मचारियों को नहीं बांधनी चाहिए। निगम जो हर माह 17 लाख रुपये घड़ियों पर खर्च कर रहा है, उसमें लगभग 150 नए कर्मचारी काम पर रखे जा सकते हैं। राजेश कालिया ने कहा कि निगम अपने-अपने कार्यस्थल पर काम न करने वाले कर्मचारियों की पहचान के लिए यह घड़ियां लेकर आया था, अब इन कर्मचारियों की पहचान हो गई है। फिर इन घड़ियों के पहनने का क्या मतलब है। कमेटी के निर्णय पर सदन फैसला लेगा।
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घड़ियां पहनने के बाद बढ़ गई थी कार्य क्षमता
स्मार्ट घड़ी पहनने के बाद चंडीगढ़ नगर निगम के कर्मचारियों की कार्यक्षमता में 67 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई थी। निगम और सूक्ष्मजीव प्रौद्योगिकी संस्थान (इमटेक) के सामूहिक सर्वे में सामने आया था कि हर छह घंटे बाद कर्मचारियों की कार्यक्षमता क्षेत्रवार पहले की तुलना में बढ़ गई है। घड़ियों को लेकर सफाई कर्मचारियों के विरोध के बाद निगम ने बीते साल अगस्त, सितंबर और अक्तूबर में सर्वे किया था। सर्वे टीम में निगम के एमओएच डॉ. अमृतपाल वडिंग और रवि सहोता शामिल थे, जबकि इमटेक की तरफ से अमित कुमार धीमान, अजय चंदेल, मोहित कुमार व प्रोजेक्ट मैनेजर पूजा ग्रोवर शामिल थीं।
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अनुबंध खत्म हुआ तो कौन लौटाएगा कंपनी को राशि
इस समय नगर निगम ने अपने चार हजार कर्मचारियों को यह घड़ियां दी हैं। सफाई कर्मचारी यूनियन का मानना है कि घड़ियां पहनने से बंधुआ मजदूर की भावना आती है। साथ ही, स्वास्थ्य भी खराब हो रहा है। अधिकारियों का मानना है कि अगर यह प्रोजेक्ट खारिज किया जाता है तो कंपनियों को तीन करोड़ से ज्यादा की राशि लौटानी पड़ेगी। एक घड़ी की कीमत आठ हजार रुपये है। इस समय नगर निगम इन घड़ियों का हर माह 17 लाख रुपये किराया दे रहा है। यह राशि कौन लौटाएगा, सदन में यह बड़ा मुद्दा होगा।
क्या कहते हैं अधिकारी
हमने निगम को रिपोर्ट दे दी है। रिपोर्ट में कर्मचारियों को घड़ियां न देने की बात कही गई है। घड़ी के किराए के रूप में निजी कंपनी को इतनी बड़ी राशि देने से अच्छा है, नए कर्मचारी रखकर शहर की सफाई व्यवस्था मजबूत की जाए। -राजेश कालिया, पार्षद व कमेटी सदस्य