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बड़ा खुलासा: डार्क वेब पर दी गई थी आतंकी हरदीप निज्जर की हत्या की सुपारी, शार्प शूटरों का हुआ इस्तेमाल

Thu, 22 Jun 2023 10:17 AM IST
निवेदिता वर्मा सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब) Published by: निवेदिता वर्मा Updated Thu, 22 Jun 2023 10:17 AM IST
सार

डार्क वेब पर ड्रग्स, हथियार, पासवर्ड, चाइल्ड पॉर्न, सुपारी किलिंग आदि वे तमाम बातें होती हैं, जिन तक पहुंचना आसान नहीं होता है। दरअसल, डार्क वेब ओनियन राउटिंग टेक्नोलॉजी पर काम करता है। यह यूजर्स को ट्रैकिंग और सर्विलांस से बचाता है और उनकी गोपनीयता बरकरार रखने के लिए सैकड़ों जगह रूट और री-रूट करता है।

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New Revelation in murder of terrorist Hardeep Nijjar in Canada
खालिस्तान समर्थक हरदीप निज्जर की हत्या। - फोटो : फाइल

विस्तार

कनाडा के सरी में गुरु नानक गुरुद्वारा के प्रधान और भारत में घोषित आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के लिए शार्प शूटरों का इस्तेमाल किया गया। हत्या के लिए वैसे ही शूटर थे, जैसे परमजीत सिंह पंजवड़ व हरमीत सिंह पीएचडी के लिए पाकिस्तान में इस्तेमाल हुए थे। ऐसे ही शूटरों का इस्तेमाल कनिष्क विमान विस्फोट के आरोपी रिपुदमन सिंह की हत्या के लिए भी इस्तेमाल किया गया था। 
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कनाडा की आरसीएमपी इस बात को लेकर जांच कर रही है कि निज्जर की हत्या कांट्रेक्ट किलिंग के जरिए की गई है और इसके लिए डार्क वेब का इस्तेमाल किया गया। कनाडा के सूत्रों के मुताबिक कनाडा पुलिस ने निज्जर को आगाह भी किया था कि उसकी हत्या को लेकर डार्क वेब पर कोडिंग की गई है। अपनी हत्या की आशंका हरदीप निज्जर ने गुरुद्वारा की संगत को संबोधित करते हुए व्यक्त भी की थी। आरसीएमपी की जांच इस बात को लेकर भी चल रही है कि रिपुदमन सिंह की हत्या का आरोप हरदीप निज्जर पर लगा था, कहीं उस वारदात का बदला तो नहीं लिया गया है? कनाडा पुलिस के लिए डार्क वेब को डिकोड करना भी आसान नहीं है।
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क्या होता है डार्क वेब...
डार्क वेब इंटरनेट का वो हिस्सा है, जहां वैध और अवैध दोनों तरीके के कार्यों को अंजाम दिया जाता है। इंटरनेट का 96 फीसद हिस्सा डीप वेब और डार्क वेब के अंदर आता है। हम इंटरनेट कंटेंट के केवल 4% हिस्से का इस्तेमाल करते हैं, जिसे सरफेस वेब कहा जाता है। डीप वेब पर मौजूद कंटेंट को एक्सेस करने के लिए पासवर्ड की जरूरत होती है जिसमें ई-मेल, नेट बैंकिंग आते हैं। डार्क वेब को खोलने के लिए टॉर ब्राउजर का इस्तेमाल किया जाता है।


डार्क वेब पर ड्रग्स, हथियार, पासवर्ड, चाइल्ड पॉर्न, सुपारी किलिंग आदि वे तमाम बातें होती हैं, जिन तक पहुंचना आसान नहीं होता है। दरअसल, डार्क वेब ओनियन राउटिंग टेक्नोलॉजी पर काम करता है। यह यूजर्स को ट्रैकिंग और सर्विलांस से बचाता है और उनकी गोपनीयता बरकरार रखने के लिए सैकड़ों जगह रूट और री-रूट करता है। आसान शब्दों में कहा जाए तो डार्क वेब ढेर सारी आईपी एड्रेस से कनेक्ट और डिस्कनेक्ट होता है, जिससे इसको ट्रैक कर पाना असंभव हो जाता है। यूजर की इन्फॉर्मेशन इंक्रिप्टेड होती है, जिसे डिकोड करना नाममुकिन है। डार्क वेब पर डील करने के लिए वर्चुअल करेंसी जैसे बिटकॉइन का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसा इसलिए होता है, ताकि ट्रांजेक्शन को ट्रेस न किया जा सके।

डार्क वेब की तरफ इशारा
हत्या की कड़ी डार्क वेब की तरफ है, जहां पर निज्जर की सुपारी दी गई थी। आरसीएमपी की जांच भी डार्क वेब पर चल रही है लेकिन इसकी मंजिल तक पहुंचना नामुमकिन है। निज्जर की हत्या को अंजाम बिलकुल वैसे दिया गया है, जैसे पाकिस्तान में हरमीत सिंह पीएचडी व परमजीत सिंह पंजवड की हत्या की गई थी। वैंकुवर के सरी में ही रिपुदमन सिंह की हत्या भी शूटरों ने की थी, इन हत्याओं में कोई सुराग नहीं लगा है। - गुरप्रीत सिंह, वरिष्ठ लेखक व पत्रकार, कनाडा

 
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