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लोकसभा चुनाव 2019 में नवजोत सिद्धू को सबक सिखाना चाहती है भाजपा, बनाई जा रही रणनीति

Sun, 21 Apr 2019 11:30 AM IST
खुशबू गोयल अशोक नीर, अमर उजाला, अमृतसर(पंजाब)
अशोक नीर, अमर उजाला, अमृतसर(पंजाब) Published by: खुशबू गोयल Updated Sun, 21 Apr 2019 11:30 AM IST
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Lok Sabha Elections 2019, BJP Strategy against Navjot Sidhu of Congress
नवजोत सिद्धू
लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा नवजोत सिद्धू को बड़ा सबक सिखाना चाहती है। इसके लिए पार्टी की ओर से बेहद सख्त रणनीति बनाई जा रही है। कांग्रेस में शामिल होने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पर प्रहार कर रहे मंत्री नवजोत सिद्धू को सशक्त जवाब देने के लिए भाजपा अमृतसर से एक मजबूत प्रत्याशी की तलाश में जुटी है।
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भाजपा एक ऐसे उम्मीदवार की तलाश में है, जो चुनाव जीतने के अलावा नवजोत की शैली में उसके राजनीतिक कटाक्षों का जवाब भी दे सके। भाजपा प्रदेश में अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। वहीं प्रदेश की राजनीति में अकाली दल के साथ राजनीतिक बराबरी करने के लिए भी इस सीट को जीतना भाजपा के लिए जरूरी है।
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यही कारण है कि भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बॉलीवुड अदाकार सन्नी देओल के साथ बैठक कर उनके मन को टटोला है। सन्नी देओल जट्ट सिख हैं। अमृतसर संसदीय हलके में 52 फीसदी से अधिक सिख मतदाता हैं, जिसमें से अधिकतर जट्ट सिख हैं। भाजपा ने पहली बार 2004 में जट्ट सिख नवजोत सिद्धू को चुनाव मैदान में उतारा था।
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सिद्धू ने 2007 के उपचुनाव सहित 2009 का लोकसभा चुनाव भी जीता।

छीना भी जट्ट सिख, लेकिन जिताऊ उम्मीदवार नहीं

नवजोत सिद्धू ने सांसद के तौर पर भाजपा में किसी भी जट्ट सिख नेता को उभरने नहीं दिया। सिद्धू के भाजपा में शामिल होने के बाद कई जट्ट सिख सिद्धू के साथ भाजपा में आए और कुछ को छोड़ कर बाकी उनके साथ ही कांग्रेस में चले गए। भाजपा के पास इस समय राजिंदर मोहन छीना के रूप में एक जट्ट सिख नेता हैं। छीना को भाजपा में लाने में तत्कालीन सांसद नवजोत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। छीना ने 2007 में अमृतसर पश्चिम में ओम प्रकाश सोनी के विरुद्ध पहला चुनाव लड़ा।

सिद्धू ने छीना का चुनाव प्रचार भी किया। इस हार के बावजूद भाजपा ने छीना को अमृतसर नगर सुधार ट्रस्ट का चेयरमैन बनाया, जिसका सिद्धू ने इसका जमकर विरोध किया। सांसद पद से इस्तीफा देने तक की धमकी दी। नाराज सिद्धू लगभग दो महीने तक अपने संसदीय हलके में ही नहीं आए। इसके बाद छीना ने चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में छीना और सिद्धू के बीच इतनी दूरियां पैदा हो गई कि जब तक सिद्धू भाजपा में रहे, छीना के साथ कभी दुआ-सलाम भी नहीं हुई।

उसके बाद छीना ने 2017 का लोकसभा का उपचुनाव भी लड़ा। उस चुनाव में भी वह बुरी तरह हार गए। छीना बीते 12 साल से राजनीति में हैं, लेकिन लोगों के नेता नहीं माने जाते। छीना के जट्ट सिख होने के बावजूद भाजपा अन्य विकल्पों पर विचार कर रही है। बेशक छीना अपने प्रचार में जुटे हुए हैं, लेकिन उनको जट्ट सिखों के साथ साथ शहरी हिंदुओं का वह समर्थन हासिल नहीं है, जो सिद्धू को है।
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