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लोकसभा चुनाव 2019: तीन राज्यों को जोड़ती है अंबाला सीट, दांव पर लगी है दो सांसदों की प्रतिष्ठा
Fri, 03 May 2019 01:01 PM IST
खुशबू गोयल
आलोक सिंह रघुवंशी, अमर उजाला, अंबाला(हरियाणा)
आलोक सिंह रघुवंशी, अमर उजाला, अंबाला(हरियाणा)
Published by: खुशबू गोयल
Updated Fri, 03 May 2019 01:01 PM IST
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Kumari shailja
- फोटो : ANI
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हरियाणा में अंबाला आरक्षित लोकसभा सीट है। अंबाला, पंचकूला के अलावा यमुनानगर के तीन विधानसभा क्षेत्र इसके अंतर्गत आते हैं। चुनाव में सिर्फ दस दिन का समय शेष बचा है। ऐसे में सभी पार्टियां जीत सुनिश्चित करने के लिए जोर लगा रही हैं। हालांकि यहां पर 45 फीसदी अनुसूचित और पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं की संख्या है, इसलिए इन वोटरों को ध्यान में रखते हुए प्रत्याशी तय हुए हैं। मुख्य मुकाबला कांग्रेस उम्मीदवार कुमारी सैलजा और भाजपा उम्मीदवार रतनलाल कटारिया में माना जा रहा है। कटारिया इस लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं और कुमारी सैलजा राज्यसभा सांसद हैं।
दोनों ही इस लोकसभा क्षेत्र से दो-दो बार सांसद चुने जा चुके हैं और दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। पंजाब से अलग होकर हरियाणा के नया राज्य बनने के बाद अंबाला लोकसभा सुरक्षित सीट हमेशा से बेहद खास रही है। इस पर केंद्रीय हाईकमान की भी नजर है। इनेलो, आप और बसपा भी अपने - अपने तरीके से चुनाव में जीत के लिए आगे बढ़ रही हैं। हालांकि इस बार समीकरण कुछ बदले - बदले हैं और मुकाबला भाजपा व कांग्रेस में दिलचस्प होने की उम्मीद है। दो बार अंबाला से सांसद चुनी गई सैलजा बेदाग छवि की रही हैं, जबकि मौजूदा सांसद कटारिया केंद्र सरकार के कार्यों को लेकर इस बार मैदान में उतरे हैं।
1957 से अब तक देखा जाए तो अंबाला सीट पर नौ चुनाव में सात बार कांग्रेस का ही शासन रहा, लेकिन 1996 के बाद से कांग्रेस यहां अपना करिश्मा दिखाने में कमजोर पड़ गई। 11वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में यह सीट भाजपा और 1998 में बसपा के खाते में चली गई। 1999 में रतनलाल कटारिया ने एक बार फिर यह सीट भाजपा की झोली में वापस डाल दी। हालांकि, 2004 और 2009 के चुनाव में उन्हें लगातार दो बार हार का सामना करना पड़ा। लेकिन, 2014 में मोदी लहर के सहारे उन्होंने यहां से एक बार फिर जीत दर्ज की।
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दोनों ही इस लोकसभा क्षेत्र से दो-दो बार सांसद चुने जा चुके हैं और दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। पंजाब से अलग होकर हरियाणा के नया राज्य बनने के बाद अंबाला लोकसभा सुरक्षित सीट हमेशा से बेहद खास रही है। इस पर केंद्रीय हाईकमान की भी नजर है। इनेलो, आप और बसपा भी अपने - अपने तरीके से चुनाव में जीत के लिए आगे बढ़ रही हैं। हालांकि इस बार समीकरण कुछ बदले - बदले हैं और मुकाबला भाजपा व कांग्रेस में दिलचस्प होने की उम्मीद है। दो बार अंबाला से सांसद चुनी गई सैलजा बेदाग छवि की रही हैं, जबकि मौजूदा सांसद कटारिया केंद्र सरकार के कार्यों को लेकर इस बार मैदान में उतरे हैं।
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1957 से अब तक देखा जाए तो अंबाला सीट पर नौ चुनाव में सात बार कांग्रेस का ही शासन रहा, लेकिन 1996 के बाद से कांग्रेस यहां अपना करिश्मा दिखाने में कमजोर पड़ गई। 11वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में यह सीट भाजपा और 1998 में बसपा के खाते में चली गई। 1999 में रतनलाल कटारिया ने एक बार फिर यह सीट भाजपा की झोली में वापस डाल दी। हालांकि, 2004 और 2009 के चुनाव में उन्हें लगातार दो बार हार का सामना करना पड़ा। लेकिन, 2014 में मोदी लहर के सहारे उन्होंने यहां से एक बार फिर जीत दर्ज की।
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एक चौथाई अनुसूचित जाति के वोटरों पर सभी की नजर
जातिगत आंकड़ों की बात करें तो करीब 45 फीसदी अनुसूचित और पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं के अलावा पंजाबी, सिख, राजपूत, जाट, ब्राह्मण, महाजन व अन्य स्वर्ण जाति के मतदाताओं की तादाद करीब 45 फीसदी है। अनुसूचित जाति के मतदाता करीब 25 फीसदी हैं, जिनमें वाल्मीकि, रामदासिया व अन्य जातियां शामिल हैं। सिखों की भी चुनाव में बड़ी भूमिका होती है। अल्पसंख्यक व अन्य जातियों की तादाद भी 5 से 7 फीसदी है।
अंबाला क्षेत्र में हलके
अंबाला संसदीय क्षेत्र में 9 हलके कालका, पंचकूला, अंबाला शहर, अंबाला छावनी, नारायणगढ़, मुलाना, साढौरा, यमुनानगर, जगाधरी, आते हैं।
अंबाला लोकसभा में मतदाता
कुल मतदाता : 18,53,577
पुरुष : 990603
महिला : 862944
ट्रांसजेंडर : 30
वर्ष 2014 में यह रही स्थिति
उम्मीदवार पार्टी वोट मिले
रतनलाल कटारिया भाजपा 612121
राजकुमार वाल्मीकि कांग्रेस 272047
डा. कुसुम शेरवाल इनेलो 129571
डा. कपूर सिंह बसपा 1022627
अंबाला क्षेत्र में हलके
अंबाला संसदीय क्षेत्र में 9 हलके कालका, पंचकूला, अंबाला शहर, अंबाला छावनी, नारायणगढ़, मुलाना, साढौरा, यमुनानगर, जगाधरी, आते हैं।
अंबाला लोकसभा में मतदाता
कुल मतदाता : 18,53,577
पुरुष : 990603
महिला : 862944
ट्रांसजेंडर : 30
वर्ष 2014 में यह रही स्थिति
उम्मीदवार पार्टी वोट मिले
रतनलाल कटारिया भाजपा 612121
राजकुमार वाल्मीकि कांग्रेस 272047
डा. कुसुम शेरवाल इनेलो 129571
डा. कपूर सिंह बसपा 1022627
कौन कहां मजबूत, किसकी क्या कमजोर कड़ी
कांग्रेस : कुमारी सैलजा
मजबूती : राष्ट्रीय स्तर की नेता। इस सीट से कांग्रेस से कुमारी सैलजा लगातार वर्ष 2004 व 2009 में दो बार सांसद रह चुकी हैं। उन्होंने विरोधी प्रत्याशी भाजपा के रतनलाल कटारिया को ही दोनों बार हराया है। यही नहीं कटारिया के हो रहे विरोध का उनको फायदा मिल सकता है।
कमजोरी : मोदी फैक्टर का डर। शहरी क्षेत्र में पकड़ ढीली। वहीं वाल्मीकि वोटर इनेलो प्रत्याशी के वाल्मीकि होने से उसमें बंटने की संभावना।
भाजपा : रतनलाल कटारिया की मजबूती
मजबूती : पीएम नरेंद्र मोदी के प्रति बने माहौल। पार्टी में ही कटारिया के विरोधी रहे अंबाला कैंट के विधायक अनिल विज द्वारा पुरजोर समर्थन देना। धीरे - धीरे नाखुश कार्यकर्ताओं द्वारा भी चुनाव प्रचार में जुटना।
कमजोरी : सांसद बनने के बाद चुनाव में किए गए कुछ वादों को पूरा करने में नाकामी। यमुनानगर जिले के विधानसभा क्षेत्रों में उनके खिलाफ व्यापक नाराजगी का आलम।
इनेलो : रामपाल वाल्मीकि
मजबूती : भाजपा व कांग्रेस का यमुनानगर में ज्यादा प्रभाव न होने व लोकल होने का मिल सकता है फायदा। कोई वाल्मीकि प्रत्याशी न होने पर वोटरों पर भी हो सकती है पकड़।
कमजोरी : यमुनानगर में डिप्टी मेयर के दौरान महिला द्वारा छेड़खानी का आरोप। वहीं लोकसभा चुनाव लड़ने का अनुभव नहीं।
बसपा - लोसुपा : नरेश सारन
मजबूती : बसपा में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। 30 साल से बसपा से जुड़े होने का फायदा। पहले भी रादौर से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं, हालांकि हार का सामना करना पड़ा था। लोकसभा के लिए पहली बार टिकट मिला है, पर राजनीति का पुराना अनुभव।
कमजोरी : धीरे-धीरे घटता बसपा का ग्राफ। लोगों में व्यक्तिगत अधिक पकड़ नहीं। लोसुपा के सहारे सैनी वोटरों की आस।
आप - जजपा : पृथ्वीराज सिंह
मजबूती : पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा पांच सालों में तैयार की गई जमीन व प्रचार। जजपा से गठबंधन का लाभ। पूर्व डीजीपी होने पर पढ़ा - लिखा प्रत्याशी का तमगा।
कमजोरी : बाहरी प्रत्याशी को लाने पर कार्यकर्ताओं में निराशा। चुनाव लड़ने का अनुभव नहीं।
मजबूती : राष्ट्रीय स्तर की नेता। इस सीट से कांग्रेस से कुमारी सैलजा लगातार वर्ष 2004 व 2009 में दो बार सांसद रह चुकी हैं। उन्होंने विरोधी प्रत्याशी भाजपा के रतनलाल कटारिया को ही दोनों बार हराया है। यही नहीं कटारिया के हो रहे विरोध का उनको फायदा मिल सकता है।
कमजोरी : मोदी फैक्टर का डर। शहरी क्षेत्र में पकड़ ढीली। वहीं वाल्मीकि वोटर इनेलो प्रत्याशी के वाल्मीकि होने से उसमें बंटने की संभावना।
भाजपा : रतनलाल कटारिया की मजबूती
मजबूती : पीएम नरेंद्र मोदी के प्रति बने माहौल। पार्टी में ही कटारिया के विरोधी रहे अंबाला कैंट के विधायक अनिल विज द्वारा पुरजोर समर्थन देना। धीरे - धीरे नाखुश कार्यकर्ताओं द्वारा भी चुनाव प्रचार में जुटना।
कमजोरी : सांसद बनने के बाद चुनाव में किए गए कुछ वादों को पूरा करने में नाकामी। यमुनानगर जिले के विधानसभा क्षेत्रों में उनके खिलाफ व्यापक नाराजगी का आलम।
इनेलो : रामपाल वाल्मीकि
मजबूती : भाजपा व कांग्रेस का यमुनानगर में ज्यादा प्रभाव न होने व लोकल होने का मिल सकता है फायदा। कोई वाल्मीकि प्रत्याशी न होने पर वोटरों पर भी हो सकती है पकड़।
कमजोरी : यमुनानगर में डिप्टी मेयर के दौरान महिला द्वारा छेड़खानी का आरोप। वहीं लोकसभा चुनाव लड़ने का अनुभव नहीं।
बसपा - लोसुपा : नरेश सारन
मजबूती : बसपा में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। 30 साल से बसपा से जुड़े होने का फायदा। पहले भी रादौर से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं, हालांकि हार का सामना करना पड़ा था। लोकसभा के लिए पहली बार टिकट मिला है, पर राजनीति का पुराना अनुभव।
कमजोरी : धीरे-धीरे घटता बसपा का ग्राफ। लोगों में व्यक्तिगत अधिक पकड़ नहीं। लोसुपा के सहारे सैनी वोटरों की आस।
आप - जजपा : पृथ्वीराज सिंह
मजबूती : पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा पांच सालों में तैयार की गई जमीन व प्रचार। जजपा से गठबंधन का लाभ। पूर्व डीजीपी होने पर पढ़ा - लिखा प्रत्याशी का तमगा।
कमजोरी : बाहरी प्रत्याशी को लाने पर कार्यकर्ताओं में निराशा। चुनाव लड़ने का अनुभव नहीं।