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'आज के गानों में सिर्फ शोर-शराबा, मतलब की कोई बात नहीं होती'
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 18 Sep 2016 12:55 PM IST
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चंडीगढ़ में एक कार्यक्रम के दौरान प्ले बैक सिंगर ऊषा तिमोथी
- फोटो : फाइल फोटो
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आज के गीतों में वह बात नहीं, जो पुराने गीतों में थी। आज के गीतों में सिर्फ शोर-शराबा होता है। ये कहना है प्ले बैक सिंगर उषा तिमोथी का। वह शनिवार को एक कार्यक्रम के सिलसिले में सिटी ब्यूटीफुल पहुंचीं। यहां उन्होंने कहा कि शास्त्रीय संगीत के जरिए ही अच्छे गीत गाए जा सकते हैं।
पुरानी और नई गायकी पर बात करते हुए उन्होंने कि पहले के गीत अर्थपूर्ण होते थे। लेकिन आज के गीतों में वह बात नहीं। आज तो ऐसी गायकी का चलन अधिक बढ़ गया है जिसमें शोर शराबे के अलावा और कुछ नहीं होता। पुराने गायक काफी मेहनत भी करते थे जबकि आज के गायक शॉर्टकट से काम चलाना चाहते हैं। जिसके चलते गायकी के स्तर में दिन प्रतिदिन गिरावट आ रही है।
उषा तिमोथी ने बताया कि उन्होंने तीन साल की उम्र में क्लासिकल संगीत सीखना शुरू किया। उनके बड़े भाई आल इंडिया रेडियो में स्टॉफर हुआ करते थे। 11 साल की उम्र में उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो पर कैद में है बुलबुल.. गीत गाया। उसके बाद लेखक गुलशन बावरा का गीत मजबूर होकर तेरे महफिल में आए हम.. गीत गाया। उषा तिमुथी पंजाबी, बंगाली, हिंदी, मलयालम, मराठी, भोजपुरी फिल्मों में गीत गा चुकी हैं।
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पुरानी और नई गायकी पर बात करते हुए उन्होंने कि पहले के गीत अर्थपूर्ण होते थे। लेकिन आज के गीतों में वह बात नहीं। आज तो ऐसी गायकी का चलन अधिक बढ़ गया है जिसमें शोर शराबे के अलावा और कुछ नहीं होता। पुराने गायक काफी मेहनत भी करते थे जबकि आज के गायक शॉर्टकट से काम चलाना चाहते हैं। जिसके चलते गायकी के स्तर में दिन प्रतिदिन गिरावट आ रही है।
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उषा तिमोथी ने बताया कि उन्होंने तीन साल की उम्र में क्लासिकल संगीत सीखना शुरू किया। उनके बड़े भाई आल इंडिया रेडियो में स्टॉफर हुआ करते थे। 11 साल की उम्र में उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो पर कैद में है बुलबुल.. गीत गाया। उसके बाद लेखक गुलशन बावरा का गीत मजबूर होकर तेरे महफिल में आए हम.. गीत गाया। उषा तिमुथी पंजाबी, बंगाली, हिंदी, मलयालम, मराठी, भोजपुरी फिल्मों में गीत गा चुकी हैं।
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