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चंडीगढ़ में अतिक्रमण की भरमार, अफसरों की अनदेखी से पर्यावरण को बढ़ रहा खतरा 

Sat, 20 Feb 2021 01:28 PM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sat, 20 Feb 2021 01:28 PM IST
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Illegal construction in chandigarh also pose threat to environment 
कैंबवाला में सुखना चो के किनारे बनाए गए मकान। - फोटो : अमर उजाला

चंडीगढ़ में अतिक्रमण से बुरा हाल है। पर्यावरण की दृष्टि से खुड्डा अलीशेर, कैंबवाला और किशनगढ़ काफी महत्व रखते हैं। ये गांव सुखना लेक के पास हैं लेकिन पिछले 15 वर्षों में इन्हीं गांवों में सबसे ज्यादा अवैध निर्माण हुए हैं। कैंबवाला का दायरा वर्ष 2006 के बाद बहुत ज्यादा बढ़ गया है। 15 वर्ष पहले जहां सिर्फ खेत थे, आज वहां पक्के मकान बन गए हैं और अब भी निर्माण कार्य जारी है। 

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अमर उजाला टीम ने कैंबवाला का दौरा किया तो हैरान करने वाली तस्वीर नजर आई। सुखना चो से कुछ मीटर की दूरी पर कच्चे मकान बना दिए गए हैं, जहां मजदूर तबके के लोग किराए पर रह रहे हैं। यह सुरक्षा की दृष्टि से भी खतरनाक है, क्योंकि सुखना चो इन कच्चे घरों को छूकर निकल रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये घर ढलान पर बने हुए हैं। ऐसे में तेज बारिश होने पर इनके बहने का भी खतरा है। ये कच्चे घर सुखना चो के रास्ते में अवरोध भी पैदा कर रहे हैं। 
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इसके अलावा कैंबवाला में किराए पर मकान देने के लिए कृषि भूमि पर कई कच्चे घर बना दिए गए हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि इन मकानों में यूपी और बिहार से काम की तलाश में आने वाले मजदूर रहते हैं। चूंकि किराया बेहद कम होता है, इसलिए यह लोग जान की परवाह किए बिना ही इन मकानों में रहते हैं। 

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Illegal construction in chandigarh also pose threat to environment 
आधी बनाई दीवारों पर किया गया पेंट। - फोटो : फाइल फोटो

कैंबवाला में बदला अतिक्रमण का तरीका
कैंबवाला में अतिक्रमण का तरीका बदल गया है। यहां का कुछ इलाका सुखना कैचमेंट में आता है और इसका मामला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में चल रहा है इसलिए यहां पर प्रशासन की सख्ती ज्यादा है। हालांकि लोगों ने इसका भी तोड़ निकाल रखा है। यहां पर कृषि भूमि पर पहले कच्चा निर्माण किया जाता है और चारदीवारी खड़ी कर उस पर टीन की चादर डाल दी जाती है।

सूत्रों ने बताया कि पक्के निर्माण पर प्रशासन की तरफ से तुरंत कार्रवाई की जाती है, इसलिए पहले कच्चा घर बनाया जाता है। इसके बाद मौका देखकर, कच्ची छत को पक्का कर दिया जाता है। इसके अलावा कैंबवाला में भी जमीनों की खरीद-फरोख्त की जा रही है।

मकान को पुराना दिखाने के लिए, पुरानी ईंटों से बनाए जा रहे घर
पेरीफेरी में अब जो भी निर्माण कार्य हो रहे हैं, वह कृषि की भूमि पर ही हो रहे हैं। इनकी रजिस्ट्री तो नहीं है, लेकिन जनरल पावर ऑफ अटार्नी (जीपीए) पर कृषि भूमि को खरीदा और बेचा जा रहा है। कृषि भूमि पर निर्माण करने पर पाबंदी है इसलिए प्रभावशाली लोगों और अधिकारियों के शह पर रातों-रात यहां मकान खड़ा कर दिया जाता है और मकान को पुराना दिखाने के लिए निर्माण में पुरानी ईंटों का इस्तेमाल किया जाता है। मकान को बनाते वक्त ही उस पर सफेदी कराने का भी काम शुरू हो जाता है। खुड्डा अलीशेर कैंबवाला और किशनगढ़ में यह काम धड़ल्ले से हो रहा है। 

निर्माण पूरा हुआ नहीं कि मकान पर हो गई सफेदी 
खुड्डा अलीशेर के जिस हिस्से में हो रहे अवैध निर्माण की फोटो अमर उजाला में प्रकाशित की गई थी, वहां पर मकान की आधी-अधूरी दीवारों को पेंट कर दिया गया है। यह मामला बताता है कि कैसे प्रशासन के अधिकारियों की निष्क्रियता की वजह से कृषि भूमि खत्म हो रही है। साथ ही चंडीगढ़ के पर्यावरण के लिए कितनी तेजी से खतरा पैदा हो रहा है। ऐसा इसलिए किया गया है कि ताकि अगर कोई जांच करने के लिए आए तो उसे लगे कि यह निर्माण पुराना है। शुक्रवार को जब अमर उजाला ने फिर इस इलाके का दौरा किया तो पाया कि मकान बनाने के काम को रोक दिया गया है।

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