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हिंदी दिवस पर विशेष... नार्वे में बढ़ाया हिंदी का मान तो रेलवे फीडर सुरेशचंद्र को मिली नई पहचान
Mon, 14 Sep 2020 10:59 AM IST
खुशबू गोयल
गगन तलवार, करनाल
गगन तलवार, करनाल
Published by: खुशबू गोयल
Updated Mon, 14 Sep 2020 10:59 AM IST
सार
- 15 साल से नार्वे की राजधानी ओस्लो में चला रहे हिंदी स्कूल
- स्कूल में अब तक 500 से ज्यादा विदेशियों को सिखाई हिंदी
- क्रिसमस की तर्ज पर दशहरा में करते हैं रामलीला का भी मंचन
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फीडर सुरेश चंद्र
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हिंदी ही एक भाषा है जो हमारी पहचान बनी है। चाहे हम दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न बैठे हों, यह अपना रंग जरूर दिखाती है। सुरेशचंद्र शुक्ल भी नार्वे में एक ऐसे ही भारतीय हैं, जिन्होंने हिंदी का मान बढ़ाया है। कभी लखनऊ के भारतीय रेलवे के सवारी और माल डिब्बा कारखाना आलमबाग में फीडर के पद पर सेवाएं देते थे। अब मातृभाषा के कारण ही वे 15 सालों से नार्वे की राजधानी ओस्लो में हिंदी स्कूल चला रहे हैं।
सप्ताह में एक दिन लगने वाले इस स्कूल में अब तक उनसे 500 से ज्यादा विदेशी निशुल्क हिंदी सीख चुके हैं। वह हिंदी और भारतीय संस्कृति का प्रचार ही नहीं क्रिसमस की तर्ज पर हिंदी स्कूल में नवरात्र और दशहरा में रामलीला का मंचन भी करते हैं। होली-दिवाली जैसे त्योहार भी स्थानीय लोगों के साथ मनाते हैं। वह करनाल के दयाल सिंह कॉलेज के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ. रणधीर सिंह के साथ कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से हिंदी पर कई शोध कर चुके हैं।
हिंदी और नार्वेजियन भाषा के कई शब्दों के अर्थ और उच्चारण में है समानता
सुरेशचंद्र शुक्ल बताते हैं कि हिंदी और नार्वेजियन भाषा के कई शब्दों के उच्चारण और अर्थ में भी समानता है। जो एक भारतीय को उस पल गर्व की अनुभूति कराते हैं, जब कोई नार्वेजियन उन शब्दों का उच्चारण भी भारतीय की तरह ही करता है। जैसे कि नाम, घी, संबंध, करेला, लांघ और अहिंसा जैसे कई शब्द हैं। उदाहरण देते हुए उन्होंने संबंध, घी और नाम शब्द का हिंदी और नार्वे में इस तरह प्रयोग किया..
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सप्ताह में एक दिन लगने वाले इस स्कूल में अब तक उनसे 500 से ज्यादा विदेशी निशुल्क हिंदी सीख चुके हैं। वह हिंदी और भारतीय संस्कृति का प्रचार ही नहीं क्रिसमस की तर्ज पर हिंदी स्कूल में नवरात्र और दशहरा में रामलीला का मंचन भी करते हैं। होली-दिवाली जैसे त्योहार भी स्थानीय लोगों के साथ मनाते हैं। वह करनाल के दयाल सिंह कॉलेज के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ. रणधीर सिंह के साथ कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से हिंदी पर कई शोध कर चुके हैं।
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हिंदी और नार्वेजियन भाषा के कई शब्दों के अर्थ और उच्चारण में है समानता
सुरेशचंद्र शुक्ल बताते हैं कि हिंदी और नार्वेजियन भाषा के कई शब्दों के उच्चारण और अर्थ में भी समानता है। जो एक भारतीय को उस पल गर्व की अनुभूति कराते हैं, जब कोई नार्वेजियन उन शब्दों का उच्चारण भी भारतीय की तरह ही करता है। जैसे कि नाम, घी, संबंध, करेला, लांघ और अहिंसा जैसे कई शब्द हैं। उदाहरण देते हुए उन्होंने संबंध, घी और नाम शब्द का हिंदी और नार्वे में इस तरह प्रयोग किया..
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शब्द : संबंध
हिंदी : भारत और नार्वे का संबंध है।
नार्वे : इंडिया ओग नोर्गे हार स्तर्क संबंध
शब्द : धी
हिंदी : भारतीय घी नार्वेजन घी से बेहतर है।
नार्वे : इन्दिस्क घी अर बेद्रे एन नोर्श्क घी
शब्द : नाम
हिंदी : मेरा नाम राम है...।
नार्वे : मित नाम आर राम..।
हिंदी : भारत और नार्वे का संबंध है।
नार्वे : इंडिया ओग नोर्गे हार स्तर्क संबंध
शब्द : धी
हिंदी : भारतीय घी नार्वेजन घी से बेहतर है।
नार्वे : इन्दिस्क घी अर बेद्रे एन नोर्श्क घी
शब्द : नाम
हिंदी : मेरा नाम राम है...।
नार्वे : मित नाम आर राम..।
पिता के हिंदी स्कूल में बेटी संगीता प्रिंसिपल, योग भी सिखा रहीं
सुरेशचंद्र के हिंदी स्कूल के नार्वे सोशल डिपार्टमेंट में नौकरी करने वाली बेटी संगीता प्रिंसिपल हैं। जो पढ़ाई के साथ-साथ योग भी सिखा रही हैं। 1980 से नार्वे में रह रहे सुरेशचंद्र का कहना है कि बच्चों में अभिव्यक्ति की आदत होनी चाहिए। विदेश में कई बच्चे इस कारण पिछड़ जाते हैं, क्योंकि वे न तो अपनी भाषा में बोल पाते हैं और न ही वे वहां की भाषा। इसी दृष्टि से हिंदी का प्रचार करने के लिए नार्वे में हिंदी स्कूल भी खोला। जहां अब प्रवासी भारतीयों से ज्यादा वहीं के लोग हिंदी सीखते हैं।
संपर्क में आए लोग भी बोलने लगे- श्री राम चंद्र कृपालु भजमन
सुरेशचंद्र बताते हैं कि बचपन में उनकी मां किशोरी घर में चरखा कातते हुए रामायण भी पढ़ा करती थीं। पांचवीं की पढ़ाई के बाद तो उन्हें भी खाना तब मिलता था, जब रामायाण पढ़ते थे। ऐसे में कई चौपाई उन्हें याद हो गई। अब वे नार्वे में भी अपने संपर्क में आने वालों को रामायण की चौपाई श्री राम चंद्र कृपालु भजमन... का नार्वेजियन में अनुवाद कर सुनाते हैं, लोग भी शौक से सीख रहे हैं।
पत्रकारिता की शिक्षा के पहले भारतीय का है खिताब
नार्वे जाने के बाद सुरेशचंद्र ने नार्वेजियन साहित्य के साथ पत्रकारिता की पढ़ाई भी की। 1985 से वर्किंग जर्नलिस्ट के सदस्य हैं। वहां की पहली हिंदी पत्रिका परिचय में भी उन्हें काम करने का मौका मिला और 32 सालों से वहां के सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा सराही स्पाइल दर्पण हिंदी पत्रिका भी वे निकालते हैं। वे वहां की सरकार से वियरके ओस्लो कल्चर पुरस्कार भी प्राप्त कर चुके हैं। ओस्लो नगर पार्लियामेंट के सदस्य भी रहे हैं।
संपर्क में आए लोग भी बोलने लगे- श्री राम चंद्र कृपालु भजमन
सुरेशचंद्र बताते हैं कि बचपन में उनकी मां किशोरी घर में चरखा कातते हुए रामायण भी पढ़ा करती थीं। पांचवीं की पढ़ाई के बाद तो उन्हें भी खाना तब मिलता था, जब रामायाण पढ़ते थे। ऐसे में कई चौपाई उन्हें याद हो गई। अब वे नार्वे में भी अपने संपर्क में आने वालों को रामायण की चौपाई श्री राम चंद्र कृपालु भजमन... का नार्वेजियन में अनुवाद कर सुनाते हैं, लोग भी शौक से सीख रहे हैं।
पत्रकारिता की शिक्षा के पहले भारतीय का है खिताब
नार्वे जाने के बाद सुरेशचंद्र ने नार्वेजियन साहित्य के साथ पत्रकारिता की पढ़ाई भी की। 1985 से वर्किंग जर्नलिस्ट के सदस्य हैं। वहां की पहली हिंदी पत्रिका परिचय में भी उन्हें काम करने का मौका मिला और 32 सालों से वहां के सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा सराही स्पाइल दर्पण हिंदी पत्रिका भी वे निकालते हैं। वे वहां की सरकार से वियरके ओस्लो कल्चर पुरस्कार भी प्राप्त कर चुके हैं। ओस्लो नगर पार्लियामेंट के सदस्य भी रहे हैं।