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Hindi News ›   Chandigarh ›   High Court order release of 29 year salary and 10 year pension to employee fought legal battle for 43 years

43 साल बाद न्याय: हाईकोर्ट ने बताया दुर्लभ मामला, बैंक को 29 साल का वेतन और 10 साल की पेंशन देने के आदेश

Thu, 23 May 2024 10:52 AM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Thu, 23 May 2024 10:52 AM IST
सार

याची को 1981 में 1300 रुपये के घोटाले में बर्खास्त किया गया था। तब से वह कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। दो साल पहले उनकी मौत हो गई। अब हाईकोर्ट ने उनके हक में फैसला सुनाया है।

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High Court order release of 29 year salary and 10 year pension to employee fought legal battle for 43 years
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अपनी तरह के अनोखे और दुर्लभ मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 43 साल कानूनी लड़ाई लड़ने वाले को 29 साल का वेतन और 10 साल की पेंशन जारी करने का आदेश दिया है। यह फैसला कर्मचारी की मौत के दो साल बाद आया है।
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कर्मचारी को इतने लंबे समय तक वेतन और पेंशन से महरूम रखने को दुर्लभ मामला मानते हुए हाईकोर्ट ने बैंक पर 10 लाख रुपये जुर्माना लगाते हुए कर्मी के कानूनी वारिसों में बराबर बांटने का आदेश दिया है।
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विरेंद्र कुमार 1976 में द हिसार डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल कॉ ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड में सचिव के तौर पर नियुक्त हुए थे। 8 जनवरी 1981 में उन्हें 13000 रुपये के घोटाले में बर्खास्त किया गया था। 1981 से लेकर 2017 तक याची को तीन बार बर्खास्त किया गया और तीनों बार आदेश रद्द हो गया। 
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बैंक ने जांच के दौरान तीनों बार न्याय के सिद्धांत का पालन नहीं किया जिसके चलते आदेश रद्द होते गए। याचिका लंबित रहते 2022 में याची की मौत हो गई। हाईकोर्ट ने अब अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि याचिका लंबित रहते न्याय के सिद्धांत का पालन करते हुए बैंक फैसला सुनाने में नाकाम रहा, अब याची मर चुका है और उसके खिलाफ जांच नहीं हो सकती। 

हाईकोर्ट ने कहा कि यह एक दुर्लभ मामला है जिसमें कर्मचारी को बिना गलती 43 साल तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। इस दौरान वह वेतन और रिटायरमेंट के बाद की पेंशन से महरूम रहा और अपनी जान गंवा दी। इन चालीस साल में केवल बैंक की गलती के कारण मामला लटकता रहा क्योंकि न्याय के सिद्धांत का पालन नहीं हुआ। 


मामला सिविल कोर्ट, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न स्तरों पर लड़ा गया, इस दौरान याची के पास आय का कोई साधन नहीं था। उसने अभाव में जिंदगी बिताई और अपने परिवार को सुख सुविधाएं नहीं दे सका। याची को सम्मानजनक जीवन के अधिकार से वंचित किया गया और ऐसे में बैंक को इसका भुगतान करना होगा। हाईकोर्ट ने बैंक पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए यह राशि याची के कानूनी वारिसों को सौंपने का आदेश दिया है। साथ ही 1983 से 2012 तक का पूरा वेतन और 2012 से 2022 तक की पेंशन की राशि भी आश्रितों को चार माह के भीतर देने का आदेश दिया है।
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