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आ रहे हैं राम: मंदिर संघर्ष में शामिल थे हरियाणा विस अध्यक्ष ज्ञानचंद गुप्ता, कहा-550 साल का इंतजार खत्म
Wed, 10 Jan 2024 11:20 AM IST
निवेदिता वर्मा
नीरज कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
नीरज कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Wed, 10 Jan 2024 11:20 AM IST
सार
ज्ञानचंद गुप्ता ने बताया कि लगभग 32 वर्ष के पश्चात रामलला के आने का सपना साकार होने जा रहा है। वैसे तो ये 550 सालों का संघर्ष था। उसी का परिणाम है कि रामलला के मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ और 22 जनवरी को रामलला विराजमान होंगे।
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ज्ञानचंद गुप्ता
- फोटो : संवाद
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विस्तार
अयोध्या में 22 जनवरी को रामलला विराजमान होंगे। इस दौरान प्रधानमंत्री सहित कई हस्तियां भी मौजूद रहेंगी। लेकिन आंदोलन को इस मुकाम तक पहुंचाने के पीछे एक बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी गई।
इतिहास में 30 साल पीछे जाएं यानी 1992 में... देशभर से कारसेवकों का हुजूम अयोध्या की तरफ जा रहा था। हर जगह पुलिस का कड़ा पहरा था। कारसेवकों को जाने से रोका जा रहा था। उन्हीं कार सेवकों में हरियाणा विधानसभा के अध्यक्ष ज्ञानचंद गुप्ता भी शामिल थे।
किस तरह से राम मंदिर की लड़ाई लड़ी गई और क्या-क्या हुआ। अमर उजाला से खास बातचीत में ज्ञानचंद गुप्ता ने उस संघर्ष की पूरी कहानी बयान की।
लाखों रामभक्तों के संघर्ष का परिणाम है
ज्ञानचंद गुप्ता ने बताया कि अयोध्या में लाखों रामभक्तों के संघर्ष का परिणाम है कि 22 जनवरी को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हो रही है और मंदिर के गर्भगृह में रामलला विराजमान होंगे। देश के प्रधानमंत्री को धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने एक ऐसा कार्य किया जिसने 550 साल पुराने एक कलंक को धोया है।
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जहां तक 1992 की बात है तो राम आंदोलन में मुझे भी जाने का मौका मिला। 1990 में चंडीगढ़ से लगभग 100 रामसेवक अयोध्या गए थे, लेकिन सभी अपनी मंजिल तक पहुंच नहीं पाए थे। टूंडला जोकि यूपी में हैं वहां पुलिस ने हमें गिरफ्तार कर लिया था। वे हमें वहां से आगरा लेकर गए।
उन्होंने कहा कि 6-7 दिनों तक हमें आगरा जेल में रखा गया। जेल के अंदर कठिनाइयां थीं। जेल के अंदर खाना खाने योग्य नहीं था, लेकिन जय श्री राम के नारे के साथ हमने जेल में अपना समय बिताया। उसके बाद आदेश हुआ तो हमें छोड़ा गया। फिर दिल्ली आकर भाजपा के कार्यालय गए। लेकिन हमें फिर से अयोध्या राम लाला के दर्शन के लिए जाना था। हमें वहां आदेश हुआ कि जब संदेश आएगा तब फिर जाना है।
वर्ष 1992 में फिर जाने का मौका मिला। 2 से 3 दिन रुके और जिस दिन कारसेवा थी और जिस दिन ढांचा गिरा हम बसों में आ रहे थे। हमें ये आदेश हुआ बसों में जो कार्यकर्ता आए हैं, रामसेवक आएं हैं वो सबसे आगे रहेंगे। लेकिन जिस प्रकार का वातावरण था जय श्री राम का उदघोष गुंजायमान हो रहा था और लोगों में उत्साह था। कुछ ही घंटों के अंदर वो ढांचा गिरा दिया गया। रात को जब तीनों गुंबद गिर गए। ये भी आदेश हुआ कि जब तक रामलला फिर से विराजमान नहीं हो जाते कोई भी कारसेवक यहां से नहीं जाएगा। लगभग 10 बजे वहां से चलने का समय हुआ।
फैजाबाद में लंगर खाया और उस वक्त कर्फ्यू लगा हुआ था। साथ ही खतरा भी था क्योंकि रास्ते में कुछ दूसरे पक्ष के लोग पत्थरबाजी कर रहे थे, लेकिन भगवान की कृपा से हम यमुनानगर से हरियाणा में एंटर हुए और हमें लगा कि रामलला के विराजमान होने का सपना साकार होगा। आज वो लगभग 32 वर्ष के पश्चात ये सपना साकार होने जा रहा है। वैसे तो ये 550 सालों का संघर्ष था। उसी का परिणाम है कि रामलला के मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ और 22 जनवरी को रामलला विराजमान होंगे।
बेटा बेहोश हो गया था...
घर वालों को भी चिंता थी, हालांकि घर वालों को बता कर गए थे। वर्ष 1992 को जब यहां सूचना मिली कि अयोध्या में गोली चली है। तब मेरे छोटे बेटे को सदमा लगा और कई घंटों तक बेहोश रहा। लेकिन उसके बाद जब यहां आए तो कुशल क्षेम का पता चला। परिवार वाले चिंतित थे कि अयोध्या में गोलियां चल रही हैं और मैं कहां हूं और किस हाल में। लेकिन रामलला की कृपा से मैं सुरक्षित था। आज ये मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि हम उस पल के साक्षी बनने जा रहे हैं, जिसका हमें 550 सालों से इंतजार था।
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इतिहास में 30 साल पीछे जाएं यानी 1992 में... देशभर से कारसेवकों का हुजूम अयोध्या की तरफ जा रहा था। हर जगह पुलिस का कड़ा पहरा था। कारसेवकों को जाने से रोका जा रहा था। उन्हीं कार सेवकों में हरियाणा विधानसभा के अध्यक्ष ज्ञानचंद गुप्ता भी शामिल थे।
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किस तरह से राम मंदिर की लड़ाई लड़ी गई और क्या-क्या हुआ। अमर उजाला से खास बातचीत में ज्ञानचंद गुप्ता ने उस संघर्ष की पूरी कहानी बयान की।
लाखों रामभक्तों के संघर्ष का परिणाम है
ज्ञानचंद गुप्ता ने बताया कि अयोध्या में लाखों रामभक्तों के संघर्ष का परिणाम है कि 22 जनवरी को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हो रही है और मंदिर के गर्भगृह में रामलला विराजमान होंगे। देश के प्रधानमंत्री को धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने एक ऐसा कार्य किया जिसने 550 साल पुराने एक कलंक को धोया है।
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जहां तक 1992 की बात है तो राम आंदोलन में मुझे भी जाने का मौका मिला। 1990 में चंडीगढ़ से लगभग 100 रामसेवक अयोध्या गए थे, लेकिन सभी अपनी मंजिल तक पहुंच नहीं पाए थे। टूंडला जोकि यूपी में हैं वहां पुलिस ने हमें गिरफ्तार कर लिया था। वे हमें वहां से आगरा लेकर गए।
उन्होंने कहा कि 6-7 दिनों तक हमें आगरा जेल में रखा गया। जेल के अंदर कठिनाइयां थीं। जेल के अंदर खाना खाने योग्य नहीं था, लेकिन जय श्री राम के नारे के साथ हमने जेल में अपना समय बिताया। उसके बाद आदेश हुआ तो हमें छोड़ा गया। फिर दिल्ली आकर भाजपा के कार्यालय गए। लेकिन हमें फिर से अयोध्या राम लाला के दर्शन के लिए जाना था। हमें वहां आदेश हुआ कि जब संदेश आएगा तब फिर जाना है।
वर्ष 1992 में फिर जाने का मौका मिला। 2 से 3 दिन रुके और जिस दिन कारसेवा थी और जिस दिन ढांचा गिरा हम बसों में आ रहे थे। हमें ये आदेश हुआ बसों में जो कार्यकर्ता आए हैं, रामसेवक आएं हैं वो सबसे आगे रहेंगे। लेकिन जिस प्रकार का वातावरण था जय श्री राम का उदघोष गुंजायमान हो रहा था और लोगों में उत्साह था। कुछ ही घंटों के अंदर वो ढांचा गिरा दिया गया। रात को जब तीनों गुंबद गिर गए। ये भी आदेश हुआ कि जब तक रामलला फिर से विराजमान नहीं हो जाते कोई भी कारसेवक यहां से नहीं जाएगा। लगभग 10 बजे वहां से चलने का समय हुआ।
फैजाबाद में लंगर खाया और उस वक्त कर्फ्यू लगा हुआ था। साथ ही खतरा भी था क्योंकि रास्ते में कुछ दूसरे पक्ष के लोग पत्थरबाजी कर रहे थे, लेकिन भगवान की कृपा से हम यमुनानगर से हरियाणा में एंटर हुए और हमें लगा कि रामलला के विराजमान होने का सपना साकार होगा। आज वो लगभग 32 वर्ष के पश्चात ये सपना साकार होने जा रहा है। वैसे तो ये 550 सालों का संघर्ष था। उसी का परिणाम है कि रामलला के मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ और 22 जनवरी को रामलला विराजमान होंगे।
बेटा बेहोश हो गया था...
घर वालों को भी चिंता थी, हालांकि घर वालों को बता कर गए थे। वर्ष 1992 को जब यहां सूचना मिली कि अयोध्या में गोली चली है। तब मेरे छोटे बेटे को सदमा लगा और कई घंटों तक बेहोश रहा। लेकिन उसके बाद जब यहां आए तो कुशल क्षेम का पता चला। परिवार वाले चिंतित थे कि अयोध्या में गोलियां चल रही हैं और मैं कहां हूं और किस हाल में। लेकिन रामलला की कृपा से मैं सुरक्षित था। आज ये मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि हम उस पल के साक्षी बनने जा रहे हैं, जिसका हमें 550 सालों से इंतजार था।