हरियाणा में कांग्रेस की करारी हार, 5 कारण
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दस वर्षों तक हरियाणा पर राज करने वाली कांग्रेस को इस बार विधानसभा चुनाव में जनता ने नकार दिया। इसे सत्ता विरोधी लहर कहें अथवा मोदी का क्रेज कि वर्ष 2005 में 67 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत और फिर 2009 में 40 सीटें पाकर जोड़तोड़ से सरकार चलाने वाली कांग्रेस इस बार मात्र 15 सीटों पर सिमटकर रह गई।
जबकि राज्य में पहली बार 90 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने वाली भाजपा ने 47 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया। कांग्रेस के कई दिग्गज नेता अपने क्षेत्रों में प्रभाव खोते दिखे तो कुछ अपनी ही सीट नहीं बचा पाए।
सूबे में तीसरी बार सत्ता में आने का दावा करने वाले खुद मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा सिर्फ अपने गढ़ (रोहतक, सोनीपत, झज्जर) तक सीमित रह गए।
टिकट वितरण से शुरू हुआ विवाद
कांग्रेस की इस बड़ी हार के लिए एक तरफ जहां नेताओं में अहम की लड़ाई को प्रमुख माना जा रहा है वहीं मुख्यमंत्री पर लगे विकास में क्षेत्रवाद, नौकरी में भेदभाव के आरोप भी इससे अछूते नहीं हैं।
पूरे चुनाव में कांग्रेस अपने ही नेताओं से लड़ती नजर आई, कहीं संगठन की कमजोरी तो कहीं गुटबाजी खुलकर सामने आई। कोई नेता तवज्जो न मिलने के कारण पार्टी छोड़कर गया तो कोई पार्टी में रहकर ही भूपेंद्र सिंह हुड्डा की मुखालफत करता रहा।
मुख्यमंत्री पद के लिए मारामारी तो चुनाव की घोषणा से पहले ही शुरू हो गई थी, जिसमें कांग्रेस आलाकमान तक को हस्तक्षेप करना पड़ा। इसके बाद बड़ा विवाद टिकट वितरण को लेकर हुआ इसमें आलाकमान ने मुख्यमंत्री पर ही भरोसा जताया, जिसका अशोक तंवर ने खुलकर विरोध किया।
यही नहीं उन्होंने प्रचार वार में भी अपने आपको सिरसा तक ही सीमित कर लिया। दक्षिण हरियाणा में कैप्टन अजय यादव शुरू से ही जहां मुख्यमंत्री का विरोध करते रहे वहीं बीच-बीच में किरण चौधरी भी बगावती तेवर दिखाती रहीं।
पार्टी की इस घरेलू कलह का मतदाताओं के मूड पर असर पड़ा और साथ ही उन्हें मोदी के रूप में दिग्गज नेता भी मिला। इस प्रकार हरियाणा की जनता ने भाजपा को पूर्ण बहुमत देकर एक नया इतिहास रच दिया।
अपनों ने डुबोई कांग्रेस की कश्ती
उत्तर हरियाणा के दिग्गज नेता बीरेंद्र सिंह डूमर खां ने पार्टी में महत्व न मिलने पर जहां भाजपा का दामन थाम लिया वहीं अंबाला से कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने वाले दलित नेता राजकुमार वाल्मीकि ने इनेलो का साथ दिया।
यही नहीं उत्तर में बड़ा राजनीतिक कद रखने वाली कुमारी सैलजा भी खुलकर हुड्डा के समर्थन में नजर नहीं आईं वह शुरू से ही राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की बात करती रहीं।
इसी कारण उन्होंने खुलकर पार्टी प्रत्याशियों का प्रचार भी नहीं किया। दक्षिण हरियाणा में रेवाड़ी से प्रत्याशी कैप्टन अजय यादव लगातार सातवीं बार अपनी जीत का दावा कर चौधर अपने क्षेत्र में लाने की कोशिश में आलाकमान पर दबाव बना रहे थे।
इस मामले में बंसीलाल की पुत्रवधू और तोशाम से प्रत्याशी किरण चौधरी भी पीछे नहीं रहीं पिछले कुछ दिनों से वह भी चौधर के लिए दावेदारी करती नजर आ रहीं थीं।
मुख्यमंत्री हुड्डा की कार्यशैली
पार्टी की हार का बड़ा कारण टिकट वितरण भी बना, इसमें सिर्फ मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की ही चली। इससे पार्टी के युवा चेहरा और प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर नाराज हुए। इसके साथ सीएम के गढ़ सोनीपत, रोहतक और झज्जर में कई प्रत्याशियों का विरोध हुआ लेकिन सीएम ने अपना फैसला नहीं बदला।
राज्य में जिला इकाइयां भंग रहीं इसलिए संगठन स्तर पर भी कोई खास मदद नहीं मिली, जिसका खामियाजा हार के रूप में भुगतना पड़ा।
नौकरी हरियाणा में आज भी सबसे बड़ा मुद्दा है। यहां इस बार भी यह मुद्दा छाया रहा। उत्तर और दक्षिण हरियाणा के नेताओं ने सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर आरोप लगाया कि उन्होंने नौकरी सिर्फ झज्जर और रोहतक वालों को ही दी है। साथ ही विकास के कार्य भी सिर्फ रोहतक और झज्जर तक ही सीमित रहे। इस मामले को विपक्ष ने तूल दिया।
इनेलो प्रमुख चौधरी ओम प्रकाश चौटाला ने नौकरी बांटने के विषय को ही उठाया। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि ‘नौकरी देना पाप है तो मैं अगली बार तीन लाख युवाओं को नौकरी दूंगा भले ही मुझे इसके लिए फांसी हो जाए।’ उधर, भाजपा ने भी समान विकास और समान नौकरी के विषय को उठाया।
इसके साथ वर्ष 2005 में मुख्यमंत्री हुड्डा द्वारा राज्य में समान पानी के बंटवारे की घोषणा आज तक पूरी नहीं हो पाई, जिससे लोगों में आक्रोश बढ़ा।
भूमि अधिग्रहण बना बड़ा मुद्दा
पूरे राज्य में भूमि अधिग्रहण ज्वलंत मुद्दा रहा। इस मामले में मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर गंभीर आरोप लगे। कभी वाड्रा और डीएलएफ को जमीन देने तो कभी किसानों की जमीन कौड़ियों के भाव लेकर अन्य बिल्डरों को बेचने का मामला सामने आया।
इसके साथ ही कई अन्य जिलों में सेक्टर विकसित करने के लिए अधिग्रहित की गई जमीन का भी किसानों ने विरोध किया और आरोप लगाया कि उन्हें जमीन का उचित मूल्य नहीं मिला। झज्जर में एसईजेड के लिए ली गई जमीन पर अभी तक कोई कार्य नहीं हुए जबकि किसानों से यह जमीन बहुत सस्ते में ली गई, इसका किसान लगातार विरोध करते रहे।
लोकसभा चुनाव से ही पड़ गई थी हार की नींव
लोकसभा चुनाव में सात सीटों पर भाजपा और दो लोकसभा सीटों पर इनेलो की जीत ने यह तय कर दिया था कि कांग्रेस के लिए आगे राह अब आसान नहीं है। उस समय राव इंद्रजीत जैसे दिग्गज नेता पार्टी को अलविदा कह गए थे और उन्होंने दक्षिण हरियाणा में कांग्रेस को कमजोर किया।
इसके बाद भी पार्टी नहीं जागी और गुटबाजी पर कोई नियंत्रण नहीं किया जबकि भाजपा मोदी की लहर पर सवार हुई और अपने छोटे-बड़े सभी कार्यकर्ताओं को जोड़ती चली गई।