हरियाणा में अपनों की जंग: कहीं भाई-बहन तो कहीं चाचा-भतीजा मैदान में, जानें किसका पलड़ा भारी
हरियाणा विधानसभा चुनाव के रण में इस बार रिश्तों के बीच जंग देखने को मिल रही है।तोशाम, डबवाली और रानिया जैसी कुछ सीटों पर मुकाबला कड़ा है।
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डबवाली
राजस्थान और पंजाब से सटे डबवाली में पूर्व उप प्रधानमंत्री ताऊ देवीलाल के कुनबे के तीन सदस्यों में टक्कर है। कांग्रेस से अमित सिहाग, इनेलो से आदित्य देवीलाल और जजपा से दिग्विजय चौटाला एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोक रहे हैं। यहां इनेलो, कांग्रेस और जजपा तीनों का वोट बैंक है। बागड़ी बेल्ट में इनेलो के प्रत्याशी आदित्य की स्थिति मजबूत है, लेकिन उन्हें कांग्रेस-जजपा से कड़ी टक्कर मिल रही है।
डबवाली में कांग्रेस के प्रत्याशी को यूं तो हुड्डा और सैलजा दोनों का आशीर्वाद प्राप्त है, लेकिन सैलजा और उनके समर्थकों की सक्रियता अब भी कम है। शहर में मजबूत कांग्रेस प्रत्याशी को चचेरे भाई और भतीजे से कड़ी टक्कर मिल रही है। मौजूदा विधायक के सारथी उनके पिता डाॅ. केवी सिंह व पंजाब के सांसद राजा वड़िंग बने हुए हैं, तो इनेलो प्रत्याशी को पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला व अभय चौटाला का साथ है। दिग्विजय चौटाला को दादा चौधरी रणजीत सिंह के अलावा माता-पिता और भाई का साथ मिल रहा है।
एक्स फैक्टर : मतदाताओं का एक वर्ग साइलेंट है। शहरी वोटर ही खुलकर बात नहीं कर रहे। वे दोनों ही तय करेंगे कि इस बार किस लाल के सिर पर अपना हाथ रखेंगे।
तोशाम
पूर्व मुख्यमंत्री चौ. बंसीलाल के गढ़ तोशाम में उनके ही पोते व पोती कांग्रेस प्रत्याशी अनिरुद्ध चौधरी और भाजपा प्रत्याशी श्रुति चौधरी पर एक दूसरे के खिलाफ डटे हैं। 26 साल बाद दोनों परिवार एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में उतरे हैं। तोशाम में दोनों ही खुद को बंसीलाल का वारिस साबित करने की जंग भी लड़ रहे हैं। इन दोनों की इस लड़ाई को रोचक बनाया है भाजपा के बागी शशिरंजन परमार ने। निर्दलीय उतरे परमार ही दोनों की हार-जीत तय करेंगे। वे जितने वोट ले जाएंगे, उतनी ही राह श्रुति व अनिरुद्ध की मुश्किल होती जाएगी। मैदान में 15 उम्मीदवार डटे हैं, लेकिन मुकाबला कांग्रेस-भाजपा में ही है। परमार भाजपा को ही ज्यादा नुकसान पहुंचाते नजर आ रहे हैं। इस सीट पर अनिरुद्ध के लिए अभिनेता राज बब्बर, पूर्व क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग, पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा, दीपेंद्र हुड्डा ने प्रचार किया। भाजपा से केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी प्रचार अभियान में शामिल हुए।एक्स फैक्टर : अब तक इस सीट पर श्रुति व किरण चौधरी ही जीतती आई हैं, लेकिन इस बार हार-जीत का अंतर 10 से 15 हजार मत का रह सकता है। परिवार से ही दोनों प्रत्याशी होने से यह स्थिति है।
रानियां
रानियां के रण में शुरुआती दौर में मैदान में निर्दलीय उतरे दादा चौधरी रणजीत सिंह और उनके पोते इनेलो प्रत्याशी अर्जुन चौटाला में सीधी टक्कर नजर आ रही थी, लेकिन फिर मुकाबला बहुकोणीय हो गया। कांग्रेस के सर्वमित्र कांबोज भी मुख्य मुकाबले में आ गए। भाजपा प्रत्याशी शीशपाल कांबोज को भी लोग कमजोर नहीं मान रहे हैं। इनके अलावा आप प्रत्याशी हरपिन्द्र कांबोज भी असर डाल रहे हैं। शुरुआत में कांग्रेस की आपसी खींचतान के कारण पार्टी को नुकसान होने की आशंका थी, लेकिन हुड्डा पिता-पुत्र के दौरे के बाद माहौल बदल गया। इस सीट पर सांसद कुमारी सैलजा के करीबी नेता भी अब कांग्रेस प्रत्याशी को मजबूत करने में लगे हुए हैं। पहले कांग्रेस की कमजोरी का निर्दलीय चुनाव लड़ रहे चौधरी रणजीत सिंह को फायदा हो रहा था। बदले समीकरण से उनको झटका लगता दिख रहा है।एक्स फैक्टर : रानियां पंजाबी और बागड़ी बेल्ट में बंटा हुआ है। यहां कुम्हार व कांबोज समाज का वोट बैंक सबसे ज्यादा है। हार-जीत का निर्णय यही दोनों बिरादरी करती हैं।
बहादुरगढ़ में रोचक मुकाबला, चाचा-भतीजे आमने-सामने
बहादुरगढ़ विधानसभा क्षेत्र का चुनावी दंगल इस बार काफी दिलचस्प हो गया है, जहां कई प्रमुख प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। कांग्रेस ने यहां से राजेंद्र सिंह जून को टिकट दिया है, वहीं भाजपा से दिनेश कौशिक मैदान में हैं। इनेलो-बसपा गठबंधन ने शीला नफे सिंह राठी को अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि आम आदमी पार्टी से कुलदीप छिकारा ने चुनावी मैदान में कदम रखा है। इसके अलावा निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में राजेश जून और पंचायती उम्मीदवार रमेश दलाल भी मुकाबले को त्रिकोणीय से चौकोणीय बना रहे हैं।
इस चुनाव की एक प्रमुख खासियत यह है कि कांग्रेस प्रत्याशी राजेंद्र सिंह जून और निर्दलीय उम्मीदवार राजेश जून आपस में चाचा-भतीजे हैं। यह पारिवारिक समीकरण चुनाव को और अधिक रोचक बना रहा है, क्योंकि चाचा-भतीजे के बीच का यह मुकाबला स्थानीय राजनीति में काफी चर्चा का विषय बन गया है।
चुनाव प्रचार के दौरान हर उम्मीदवार ने अपने-अपने तरीके से मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि जनता किसे अपना प्रतिनिधि चुनती है और क्या राजेंद्र सिंह जून और राजेश जून के बीच का यह पारिवारिक मुकाबला किसी नए मोड़ पर ले जाता है।