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हरियाणा विस चुनावः भाजपा ने आक्रामक बनाया मुकाबला और इस बार रण से बाहर हैं कई ‘युवराज’

Wed, 09 Oct 2019 12:16 PM IST
खुशबू गोयल मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Wed, 09 Oct 2019 12:16 PM IST
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haryana assembly elections 2019, Young Brigade Outside from Election War
फाइल फोटो
हरियाणा के चुनावी दंगल का मिजाज इस बार कुछ अलग है। भाजपा ने अबकी बार अपने लक्ष्य और अभियानों से माहौल को आक्रामक बना दिया है। दूसरे दलों को भी खासी मजबूत रणनीति के साथ लड़ना होगा। रण सज चुका है और दलों के योद्धा मैदान में है। लेकिन इस बार कई दलों के ‘युवराज’ मौजूदा मिजाज को देखते हुए सीधे युद्ध नहीं लड़ेंगे। वे रण से बाहर अलग भूमिका में रहकर मोर्चा संभालेंगे।
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हरियाणा के सियासी घरानों ने अपने इन युवराजों को इस बार विधानसभा के चुनावी समर से दूर ही रखने का फैसला किया है। ये सभी रण में डटे ‘अपनों’  को चुनाव जितवाने में मदद करेंगे। हरियाणा में कुछ राजनीतिक परिवार ऐसे हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने राजनीति सफर को आगे बढ़ा रहे हैं। इन सियासी घरानों की जड़े आज प्रदेश की राजनीति में काफी गहरी है। हर लोकसभा और प्रदेश के विधानसभा चुनावों में इन राजनीतिक परिवारों की अहम भूमिका रहती है।
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देखा जाए तो हरियाणा गठन यानी 1 नंवबर 1966 से लेकर आज तक के अंतराल में 43 साल 296 दिन तो सिर्फ इन्ही राजनीतिक घरानों ने हरियाणा की सत्ता पर राज किया है। इन्ही परिवारों के हाथ हरियाणा की कमान रही और इन्हीं घरानों के लोग प्रदेश के मुख्यमंत्री बनते रहे। इस विधानसभा चुनाव में भी प्रदेश के ये राजनीतिक परिवार मैदान में तो हैं, मगर इन परिवारों ने मौजूदा माहौल को भांपते हुए अबकी बार अपने ‘युवराजों’ को रण में उतारने से परहेज किया है।

पूर्व सीएम हुड्डा इस बार दीपेंद्र को नहीं लड़ा रहे चुनाव

संविधान सभा के सदस्य और संयुक्त पंजाब में पूर्व  मंत्री चौधरी रणबीर सिंह के पोते व पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह के पूर्व सांसद बेटे दीपेंद्र हुड्डा इस चुनाव में एक अलग भूमिका में हैं। पिता भूपेंद्र सिंह हुड्डा चाहते थे कि दीपेंद्र यह विधानसभा चुनाव लड़े। लेकिन अंतत: दीपेंद्र हुड्डा को रण से बाहर ही रखने का फैसला लिया गया।

दरअसल, जाटलैंड यानी रोहतक सीट से तीन बार से लगातार सांसद बनने वाले दीपेंद्र हुड्डा मई 2019 में हुए लोकसभा चुनाव पहली बार में शिकस्त खा गए थे। भाजपा प्रत्याशी अरविंद शर्मा से दीपेंद्र को मिली हार से हुड्डा परिवार सकते में था। परिवार को दूसरा झटका तब लगा जब पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा खुद भी इसी लोकसभा चुनाव में सोनीपत सीट से हार गए।

भाजपा प्रत्याशी रमेश कौशिक ने उन्हें हराया था। पिता-पुत्र की इस हार से उनके समर्थक भी स्तब्ध थे। उसके बाद दोनों पिता-पुत्र फिर से इस विधानसभा चुनाव में अगली पारी खेलने का मन बनाए हुए थे। दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा प्रदेश की सियासत में भी अब दीपेंद्र को आगे बढ़ाना चाहते थे।

लेकिन ऐन वक्त पर अचानक पूर्व सीएम हुड्डा ने अपने बेटे दीपेंद्र को विधानसभा चुनाव में न उतारने का फैसला लिया। मगर वे खुद अपनी परंपरागत सीट गढ़ी सांपला किलोई से मैदान में उतर गए। अब हुड्डा चुनाव लड़ रहे हैं और उनके बेटे दीपेंद्र इस चुनाव की कमान संभाले हुए हैं।

ताऊ का सिर्फ एक परपोता ही रण में

देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री और हरियाणा के सीएम रहे ताऊ देवीलाल का सिर्फएक परपोता दुष्यंत चौटाला ही इस बार विधानसभा चुनाव में ताल ठोक रहा है। दुष्यंत उचाना कलां से चुनाव लड़ रहे हैं। उनके तीन अन्य परपोते दिग्विजय चौटाला, करण चौटाला और अर्जुन चौटाला राजनीति में पूरी तरह सक्रिय होने के बावजूद इस बार रण से बाहर हैं। इन बच्चों के पिता पूर्व सांसद अजय चौटाला और  पूर्व नेता प्रतिपक्ष अभय चौटाला ने अपने इन ‘युवराजों’ को इस बार चुनाव में न उतारने का फैसला लिया है।

दरअसल, अजय चौटाला के बेटे दिग्विजय चौटाला पहले तो लंबे समय तक छात्र राजनीति में सक्रिय रहे। लेकिन जनवरी 2019 में चौटाला परिवार ने दिग्विजय को जींद उपचुनाव में बतौर प्रत्याशी पहली बार मैदान में उतारा, लेकिन दिग्विजय हार गए। करीब चार माह बाद मई 2019 के लोकसभा चुनाव में फिर से दिग्विजय चौटाला को टिकट देकर सोनीपत सीट से चुनाव लड़वाया गया। मगर यह चुनाव भी दिग्विजय हार गए। इस बार दिग्विजय चौटाला विधानसभा के दंगल से बाहर हैं। उधर, अभय चौटाला के दोनों बेटे करण और अर्जुन छात्र राजनीति में सक्रिय रहे।

मगर मई 2019 के लोकसभा चुनाव मे पहली बार अर्जुन चौटाला को भी कुरूक्षेत्र से टिकट देकर मैदान में उतारा गया। लेकिन चुनाव के  इस कुरूक्षेत्र में अर्जुन हार गए। इस बार भी अभय चौटाला अपने दोनों बेटों करण और अर्जुन को विधानसभा चुनाव लड़ाने का विचार कर रहे थे, मगर आखिरी वक्त में अभय ने वर्तमान राजनीतिक हालात देखते हुए अपना यह विचार टालना ही बेहतर समझा। बहरहाल, इस विधानसभा चुनाव में चौटाला परिवार से ताऊ के दो पोते अभय चौटाला और आदित्य चौटाला, एक परपोता दुष्यंत चौटाला और पूर्व सांसद अजय चौटाला की पत्नी नैना चौटाला चुनावी समर में लड़ रहे हैं।

पूर्व सीएम भजनलाल के पोते ने भी बनाई दूरी

पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल के पोते भव्य बिश्नोई ने भी इस बार विधानसभा चुनाव से दूरी बनाई है। भव्य बिश्नोई भजनलाल के बड़े बेटे विधायक कुलदीप बिश्नोई के पुत्र हैं। कुलदीप ने कांग्रेस हाईकमान से अड़कर मई 2019 के लोकसभा चुनाव में भव्य के लिए हिसार से टिकट ली थी। भव्य ने हिसार से बतौर कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव लड़ा था। लेकिन अपना पहला ही चुनाव भव्य हार गए। दीनबंधु सर छोटूराम के नाती राज्यसभा सदस्य चौधरी बीरेंद्र सिंह के बेटे भाजपा प्रत्याशी बृजेंद्र सिंह ने भव्य को परास्त किया था।

इस हार के बाद भव्य के पिता कुलदीप बिश्नोई हैरत में थे। भव्य को इस विधानसभा चुनाव में फिर से उतारा जाए या नहीं, यह कश्मकश चलती रही, लेकिन अंत में पिता कुलदीप ने भव्य को फिलहाल चुनाव से दूर रखने का ही निर्णय लिया। इस बार कुलदीप ने अपनी पत्नी विधायक रेणुका बिश्नोई को भी चुनावी रण से दूर रखा है। लेकिन अपने छोटे भाई पूर्व उप मुख्यमंत्री चंद्रमोहन बिश्नोई को लंबे अरसे बाद फिर से रण में उतारा है। कुलदीप खुद भी विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं और उनके बेटे भव्य व पत्नी रेणुका ने उनके चुनाव की कमान संभाल रखी है।

कुछ मायूसी भी
इनके अलावा दो केंद्रीय राज्यमंत्री इसलिए भी मायूस हैं कि वे अपने ‘युवराज’ और ‘राजकुमारी’ को हरियाणा के चुनावी रण में नहीं उतार पाए। दरअसल, केंद्रीय राज्यमंत्री कृष्णपाल गुर्जर अपने बेटे देवेंद्र चौधरी और केंद्रीय राज्यमंत्री राव इंद्रजीत सिंह अपनी बेटी आरती राव के लिए भाजपा हाईकमान से टिकट मांगे रहे थे। लेकिन परिवारवाद के पेच की वजह से दोनों मंत्रियों के बच्चों को टिकट नहीं मिल पाई। लेकिन हां, पूर्व मंत्री कैप्टन अजय यादव इस बार कांग्रेस हाईकमान से टिकट लेकर अपने युवराज चिरंजीव राव को रेवाड़ी से मैदान में उतारने में कामयाब रहे। राव चिरंजीव बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव के दामाद भी हैं। जबकि कैप्टन खुद इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं।
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