हरियाणा विधानसभा चुनाव के रुझानों से रोमांचक हुआ भाजपा-कांग्रेस का मैच, जजपा ने चौंकाया
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मतगणना में जिस तरह के रुझान सामने आ रहे हैं, वह हरियाणा के राजनीतिक घरानों के लिए एक कड़े इम्तिहान से कम नहीं है। मतदान के बाद आए एग्जिट पोल में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलता दिखाई दे रहा था, लेकिन रुझानों से कांग्रेस भी टक्कर में दिखाई दे रही है । जजपा ने सबसे ज्यादा हरियाणा चुनाव में सभी को चौंकाया। दोपहर करीब डेढ़ बजे तक के रुझानों पर नजर दौड़ाई जाए तो हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों की मतगणना के दौरान भाजपा 36, कांग्रेस 34, जजपा 10 और 10 सीटों पर अन्य दलों के उम्मीदवार आगे चल रहे हैं ।
हरियाणा के इस चुनावी रण में भाजपा ने भी प्रदेश के राजनीतिक घरानों की घेराबंदी जबरदस्त ढंग से की थी। इनके हलकों में भाजपा दिग्गजों की हुंकार के साथ जहां परिवारवाद के मसले पर इन घरानों को निशाने पर रखा गया, वहीं इनके दुर्ग में सेंधमारी के लिए खूब जोर आजमाइश की गई।
खासकर, हरियाणा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की रैलियों का शेड्यूल ही पूरी तरह कूटनीतिक ढंग से बनाया गया था। भाजपा के ये मुख्य स्टार प्रचार पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के गढ़ में भी गरजे और चौटाला परिवार के इलाके में भी। पूर्व सीएम भजन लाल, पूर्व सीएम बंसीलाल के क्षेत्र के साथ-साथ अहीरवाल बेल्ट में भी पीएम मोदी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में सियासी घरानों को घेरते हुए हरियाणा के मतदाताओं की नब्ज को पकड़ने का प्रयास किया। इसके बावजूद भी भाजपा अपनी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है।
देश की पहली संविधान सभा के सदस्य और संयुक्त पंजाब में मंत्री रहे रणबीर सिंह हुड्डा के बेटे पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने इस बार फिर चुनाव लड़ा है। भूपेंद्र सिंह हुड्डा दो बार लगातार हरियाणा के मुख्यमंत्री (2005-14) भी रह चुके हैं। 2014 का विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में ही लड़ा गया था मगर प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा और कांग्रेस 15 सीटों पर सिमट गई थी।
कांग्रेस सदन में मुख्य विपक्षी दल भी न बन सकी थी। इस बार अक्टूबर 2019 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस की कमान भूपेंद्र हुड्डा को सौंपी गई। इतने कम समय में हरियाणा में कांग्रेस ने कमबैक कर सियासी गलियारों में हलचल मचा थी। मगर इससे पहले इसी साल मई 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भी भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके तीन बार के सांसद बेटे दीपेंद्र हुड्डा ने किस्मत आजमाई थी। दुर्भाग्य यह रहा कि दोनों पिता-पुत्र लोकसभा चुनाव हार गए। बावजूद इसके कांग्रेस ने विधानसभा की जंग में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा को ही आगे बढ़ाते हुए चुनावी कमान सौंपी।
हुड्डा की चौधर और कांग्रेस की मजबूती का सवाल
मोदी ने हर इलाके में मतदाताओं को प्रभावित करने वाले मुद्दों को मंच से प्रभावशाली ढंग से उछाला और प्रदेश की जनता को यह बताने का प्रयास किया कि अब वक्त बदल चुका है, प्रदेश की जनता अब हरियाणा की राजनीति सिर्फ कुछ घरानों तक ही सीमित नहीं रखना चाहती। उधर, रही-सही कसर गृहमंत्री अमित शाह समेत भाजपा के अन्य स्टार प्रचारकों ने पूरी कर दी। इन नेताओं के निशाने पर भी हरियाणा में परिवारवाद की राजनीति ही रही।
भाजपा के इस आक्रामक चुनाव प्रचार और घेराबंदी के बावजूद इन घरानों के लिए सियासत की विरासत बढ़ती रहे, इसके लिए इन घरानों को बेहतरहीन प्रदर्शन की दरकार है। विधानसभा की इस चुनावी जंग में यदि देखें, तो इन घरानों ने जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। इन घरानों के सदस्य जिस सीट से खड़े थे, वहां इन प्रत्याशियों की ओर से जी-तोड़ मेहनत भी की गई।
चौटाला कुनबे के लिए ‘वर्चस्व’की लड़ाई
वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में मुख्य विपक्षी दल रहे इनेलो के लिए इस बार डगर आसान नहीं है और अभय चौटाला, दुष्यंत चौटाला व नैना सिंह चौटाला के लिए यह चुनाव बड़ी प्रतिष्ठा का भी सवाल है। जजपा ने हरियाणा विधानसभा चुनाव में दमदार मौजूदगी दर्ज कराई है। अब वह किंगमेकर की भूमिका पर है। वहीं इनेलो हरियाणा में अपने अस्तित्व से लड़ रही है।
पूर्व सीएम भजन व बंसीलाल घराने की प्रतिष्ठा दांव पर
इसी तरह पूर्व सीएम भजनलाल व पूर्व सीएम बंसीलाल के घराने की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले भजनलाल के दोनों बेटे कुलदीप बिश्नोई व चंद्रमोहन बिश्नोई मैदान में है। पुत्रवधु रेणुका बिश्नोई ने इस बार चुनाव नहीं लड़ा। जबकि लोकसभा चुनाव हारने के बाद पौत्र भव्य बिश्नोई नई पारी के लिए सही समय व प्लेटफार्म का इंतजार कर रहे हैं। कुलदीप बिश्नोई आदमपुर लोकसभा सीटों से बढ़त बनाए हुए हैं।
ऐसे में कुलदीप और बिश्नोई की जीत अपने सियासी घराने की प्रतिष्ठा और भविष्य से जुड़ी है। इसी तरह पूर्व सीएम बंसीलाल की पुत्रवधु किरण चौधरी, उनके बेटे रणबीर महेंद्र व दामाद सोमबीर सिंह भी इस चुनावी रण में है। बंसीलाल घराने की यह पीढ़ी घराने की सियासी विरासत को आगे बढ़ाने में जुटी हुई है।
हालांकि बंसीलाल की पौत्री पूर्व सांसद श्रुति चौाधरी इस साल लोकसभा चुनाव हार चुकी हैं। मगर परिवार की सियासत को आगे बढ़ाने के लिए अब किरण, रणबीर और सोमबीर को जीतना जरूरी होगा।
ये घरानों भी जीत की आस पर टिके
अहीरवाल बेल्ट से विधायक रहे राव अभय सिंह की सियासी विरासत उनके बेटे कैप्टन अजय यादव आगे बढ़ा रहे हैं। हरियाणा के पूर्व मंत्री रहे कैप्टन अजय यादव ने इस बार लोकसभा चुनाव लड़ा था, मगर हार का मुंह देखना पड़ा। इसके बाद उन्होंने इस बार विधानसभा चुनाव से किनारा कर अपनी अगली पीढ़ी अपने बेटे राव चिरंजीव यादव (लालू प्रसाद यादव के दामाद) को लांच किया है।
चिरंजीव पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं, इसलिए घराने की सियासत को आगे बढ़ाने केलिए चिरंजीव का जीतना जरूरी है। इसी तरह किसानाें का मसीहा रहे सर छोटू राम के नाती राज्यसभा सदस्य चौधरी बीरेंद्र सिंह उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे है।
उन्होंने अपनी अगली पीढ़ी यानी अपने बेटे पूर्व आईएएस बृजेंद्र सिंह को लोकसभा चुनाव जितवाकर सांसद बना दिया है और अब उनकी पत्नी प्रेमलता फिर से मैदान में हैं। प्रेमलता का मुकाबला बेहद कड़ा है, लिहाजा उन्हें भी जीत की प्रबल आस है।
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