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प्राचीन कला केंद्र में शुरू हुई गुरु-शिष्य परंपरा, देश-विदेश के छात्र लेंगे तालीम

Sun, 02 Oct 2022 02:15 AM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Sun, 02 Oct 2022 02:15 AM IST
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Guru-disciple tradition started in ancient art center, students from country and abroad will take training
चंडीगढ़। प्राचीन कला केंद्र की ओर से नवरात्रि में नई परंपरा का शुभारंभ हुआ है। केंद्र के मोहाली परिसर में गुरु शिष्य परंपरा के सानिध्य में शास्त्रीय शैलियों के गुरुओं के समक्ष मार्गदर्शन में विधिवत तालीम देने के लिए तीन वर्षीय कोर्स की शुरुआत की गई। केंद्र में शास्त्रीय कला के क्षेत्र में तालीम प्राप्त करने वाले भारत के और विदेश के छात्रों के लिए मेस सुविधाओं के साथ छात्रावास भी है। यह बात सेक्टर-35 में प्रेस वार्ता के दौरान प्राचीन कला केंद्र की रजिस्ट्रार डॉ. शोभा कौसर और सचिव सजल कौसर ने शनिवार को कही। उन्होंने बताया कि विभिन्न देशों से आईसीसीआर और प्राचीन कला केंद्र छात्रवृत्ति के माध्यम से कुछ छात्र 1 अक्तूबर से इस गहन शिक्षण कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं।
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इसी कार्यक्रम के परिचय के दौरान विदेशी छात्रों की ओर से अपने-अपने देश की लोक कला का बेहतरीन तरीके से प्रदर्शन किया गया। कजाकिस्तान और बांग्लादेश से आए इन छात्रों ने देश की पारंपरिक वेशभूषा में सजे इन छात्रों ने कला और संगीत की सुंदर झलकियां पेश कीं। प्राचीन कला केंद्र के तत्वावधान में छात्र विभिन्न गुरुओं से संगीत की शिक्षा प्राप्त करेंगे। इन गुरुओं में शोभा कौसर, गुरु सौभाग्य वर्धन, गुरु बृजमोहन गंगानी, डॉ. समीरा कौसर, परवेश और योगी आशु प्रताप शामिल हैं।
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कजाकिस्तान की दो बहनें सीखेंगी कथक
कजाकिस्तान की दो चचेरी बहनें लुनारा और रमीना ने अपने देश की लोकनृत्य की प्रस्तुति पारंपरिक परिधानों में सजकर दी। दोनों बहनें कथक नृत्य सीखेंगी। लूनारा ने बताया कि वह पेशे से इंजीनियर हैं। कथक सीखने के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी है। नृत्य सीखने के बाद कुछ सोचेंगी। उन्होंने कहा कि मैंने प्राचीन कला केंद्र का चुनाव किया। यह पूछे जाने पर कि दूसरे देश में आए हो माता पिता को डर नहीं लगा। इसके जवाब में लुनारा ने कहा कि मेरे मम्मी और पापा सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। आते के समय वे दोनों भावुक हो रहे थे। छोटी बहन रमीना ने अभी स्कूल की पढ़ाई पूरी की है। दोनों बहनों ने कहा कि वे सबसे पहले हिंदी सीखेंगी क्योंकि हिंदी सीखने के बाद कथक सीखना और आसान होगा।
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बांग्लादेश की शौरीन शास्त्रीय संगीत सीखने के लिए आई हैं। उन्होंने बंगला में रविंद्र नाथ टैगोर की लिखी गीत भाषा का एक लोक गीत पेश किया। इसके बाद केंद्र की रजिस्ट्रार डॉ. शोभा कौसर ने कथक सीखने वाली छात्राओं को मंच पर माथे पर तिलक के साथ अक्षत लगाया। पुष्प वर्षा कर उन्हें घुंघरू प्रदान किया। बंग्लादेश की शौरीन को पुष्प प्रदान किया। इस दौरान केंद्र में कथक सीख रही राधिका भारद्वाज को भी तिलक लगाकर घुंघरू प्रदान किया। बांग्लादेश के नाहियां और मौशीन किसी कारण नहीं पहुंच पाए लेकिन उन्होंने ऑनलाइन प्रदर्शन किया।
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